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डॉ. फादर कामिल बुल्के का अवशेष लाया गया रांची, रखा जाएगा संत जेवियर कॉलेज परिसर में

डॉ. फादर कामिल बुल्के का अवशेष और पवित्र मिट्‌टी मंगलवार को नई दिल्ली से झारखंड लाई गई।

शशि तिग्गा | Last Modified - Mar 13, 2018, 01:38 PM IST

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    डॉ. फादर कामिल बुल्के का अवशेष रांची एयरपोर्ट लाया गया।

    रांची। संत जेवियर कॉलेज के हिंदी-संस्कृत के विभागाध्यक्ष रहे डॉ. फादर कामिल बुल्के का अवशेष और पवित्र मिट्‌टी मंगलवार को नई दिल्ली से झारखंड लाई गई। बिरसा मुंडा एयरपोर्ट से फादर डॉ. कामिल बुल्के के अवशेष को सम्मान के साथ लेकर डॉ. कामिल बुल्के पथ स्थित मनरेसा हाउस लाया गया। इनकी हिंदी-अंग्रेजी व अंग्रेजी-हिंदी शब्दकोश काफी प्रसिद्ध हैं।


    -इधर, मनरेसा हाउस को डॉ. फादर कामिल बुल्के के अवशेष के आगमन पर 14 मार्च को होने वाले कार्यक्रम और समारोह को लेकर जेसुइट ब्रदर्स व फादर्स सजाने और संवारने में लगे हैं। 14 अप्रैल को संत जेवियर काॅलेज परिसर में पवित्र मिस्सा आराधना होगी। इसके बाद संत जेवियर कॉलेज परिसर में उनका पवित्र पार्थिव अवशेष और पवित्र मिट्‌टी को स्थापित किया जाएगा।

    -यहां डॉ. फादर कामिल बुल्के की जीवनी और उससे संबंधित अन्य जानकारियों का फ्लेक्स तैयार किया गया है, जिन्हें लगाया जा रहा है।

    रांची के लोग फादर कामिल को बाबा के नाम से पुकारते थे
    -1909 में बेल्जियम में जन्मे, 1935 में भारत आए, रांची के लोग फादर कामिल को बाबा के नाम से पुकारते थे
    फादर अजीत कुमार खेस ने बताया कि फादर कामिल बुल्के का जन्म बेल्जियम के फ्लैंडस में एक सितंबर 1909 को हुआ था।
    -अपने जीवन में ईश्वरीय बुलाहट को सुन कामिल बुल्के 1930 में येसु धर्मसमाज में प्रवेश किए। 1932 में जर्मनी के जेसुईट कॉलेज में दर्शनशास्त्र मेंं एमए किया। 1935 में वह भारत आए। 1939 में कर्सियोंग कॉलेज से उन्होंने कर्सियोंग से ईशशास्त्र किया।
    -1941 में पवित्र पुरोहिताभिषेक संस्कार लिया। 1947 में एमए और डी फिल इलाहाबाद विश्वविद्यालय से किया। 1951 में उन्होंने भारत की नागरिकता प्राप्त की। 1950-1977 तक 27 साल संत जेवियर कॉलेज के हिंदी-संस्कृत के विभागाध्यक्ष रहे।
    -1955 में उन्होंने ए टेक्निकल इंग्लिश-हिंदी ग्लोसरी प्रकाशन किया। 1968 में लोकप्रिय कोश अंग्रेजी-हिंदी तैयार किया। 1973 में बेल्जियम की राय अकादमी के सदस्य बने, 1974 में उनकी हिंदी सेवाओं के लिए पद्मभूषण से सम्मानित किया गया। 17 अगस्त 1982 को फादर बुल्के का निधन हो गया।

    फादर की यादें झारखंड के लिए अमूल्य धरोहर हैं
    -वर्ष 1982 में फादर का स्वास्थ्य गिरने लगा था। उनके पैर के अंगूठे में एक घाव हो गया था। डायबिटीज के कारण जल्दी ठीक होने के बजाए वह लगातार उग्र रूप लेता जा रहा था। इसके इलाज के लिए उनको एम्स ले जाया गया।

    -वहां पता चला कि उनको गैंगरीन हो गया है, उनका पैर काटा जाना था, इस क्रम में इलाज के दौरान 17 अगस्त को उनकी मृत्यु हो गई। उनके पार्थिव शरीर को दिल्ली में भी दफना दिया गया था।

    फोटो: शशि तिग्गा।

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    बिरसा मुंडा एयरपोर्ट से फादर डॉ. कामिल बुल्के के अवशेष को सम्मान के साथ लेकर डॉ. कामिल बुल्के पथ स्थित मनरेसा हाउस लाया गया।
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    डॉ. फादर कामिल बुल्के। (फाइल)
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    डॉ. फादर कामिल बुल्के के अवशेष के आगमन पर 14 मार्च को होने वाले कार्यक्रम और समारोह को लेकर जेसुइट ब्रदर्स व फादर्स सजाने और संवारने में लगे हैं।
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Web Title: Father Camille Bulcke Ranchi St Xaviers
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