भक्त को भगवान से मिलाता है ग्रंथों व संतों का सत्कर्म : देवकीनंदन

Ranchi News - हरमू मैदान में चल रही श्रीमद्भागवत कथा के सातवें दिन शुक्रवार को श्री देवकीनंदन ठाकुर महाराज ने श्रीकृष्ण और...

Bhaskar News Network

May 18, 2019, 07:35 AM IST
Ranchi News - devotees the devotee to god satkam of texts and saints devkindran
हरमू मैदान में चल रही श्रीमद्भागवत कथा के सातवें दिन शुक्रवार को श्री देवकीनंदन ठाकुर महाराज ने श्रीकृष्ण और सुदामा की मित्रता का वर्णन किया। कहा कि भक्त को भगवान से ग्रंथों और संतों का सत्कर्म ही मिलता है। जीवन जन्म-मरन के बीच की यात्रा है। उन्होंने कहा कि सनातन धर्म का सम्मान करना होगा। सनातन धर्म कम हुआ, तो पूरा देश संकट में आ जाएगा। सब अपने-अपने धर्म का पालन करंे। धर्म व्यापार नहीं, श्रद्धा का विषय है। उन्होंने कहा कि ब्राह्मण, साधु व भक्त से अपराध न करो। ये तीनों भगवान के स्नेही हंै। जनसंख्या पर नियंत्रण का कानून बनना चाहिए। उन्होंने श्रीकृष्ण और सुदामा की कथा सुनाई। यहां कृष्ण सुदामा की झांकी का लोगों ने दर्शन किया। आज पूरे पंडाल में भक्तों ने भजनों पर नृत्य किया। इसके पूर्व कथा स्थल पर सुबह 9:30 बजे भक्तों ने काफी संख्या में भक्तों ने गुरुदीक्षा ली। आरती में मुख्य यजमान अंजू सिन्हा, अनिल सिन्हा, मनोज निराला, सीताराम प्रसाद, डॉ. शशिभूषण प्रसाद सिंह, साधना किशोरी, प्रमोद सारस्वत, श्याम गोयल, मिट्ठू बजाज, राजू, दिलराम सिंह, उमाशंकर, अर्चना सिन्हा, सुखदा रानी, अनीता बजाज, मुकेश काबरा आदि शामिल हुए। मीडिया प्रभारी प्रमोद सारस्वत ने बताया कि शनिवार को दोपहर साढ़े तीन से शाम 7 बजे तक भजन संध्या का आयोजन होगा। साथ ही युवाओं के लिए भी खास प्रोग्राम रखा गया है। शनिवार को ही कथा व्यास पीठ पर गुरुजी का समिति की तरफ से स्वागत, अभिनंदन व विदाई भी होगा। सायं आरती के बाद भक्तों के बीच प्रसाद बांटे जाएंगे।

असली मित्र बिना बताए मदद करते हैं

देवकीनंदन ठाकुर ने कहा कि असली मित्र अपने मित्र की कभी बता कर मदद नहीं करता है। उदाहरण के तौर पर उन्होंने कहा कि सुदामा की के पहुंचने की सूचना पर भगवान श्रीकृष्ण नंगे पांव उनसे मिलने दौड़ पड़े। दोनों ने एक-दूसरे को गले से लगा लिया। दोनों के नेत्रों से खुशी के आंसू निकल पड़े। श्रीकृष्ण सुदामा को आदर-सत्कार के साथ महल में ले गए। उन्होंने खुद सुदामा के मैले पैर धोए। उन्हें अपने साथ सिंहासन पर बैठाया। दोनों मित्रों ने एक साथ भोजन किया तथा आश्रम में बिताए अपने बचपन के दिनों को याद किया। कुछ दिन बाद सुदामा ने कृष्ण से विदा होने की आज्ञा ली। इस दौरान सुदामा अपने मित्र को द्वारका आने का सही कारण न बता सक, परंतु जैसे ही अपनी टूटी झोंपड़ी के पास पहुंचे, देखा-वहां विशाल महल है। उनकी प|ी-बच्चे सुंदर वस्त्र व आभूषण पहन हुए हैं। वे तुरंत पूरा मामला समझ गए।

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