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स्वास्थ्य विभाग ने पूछा- किस रिम्स निदेशक ने दिए 18 लाख रुपए

डॉ. करुणा झा को वेतन भुगतान की जांच शुरू

Danik Bhaskar | May 18, 2018, 03:33 AM IST
  • विभाग ने पत्र लिखकर कहा- सरकार से पूछा नहीं, 1 साल बाद भी दायर नहीं की अपील याचिका
  • डॉ. करुणा झा को किया गया था बर्खास्त- कोर्ट के ऑर्डर के बाद दिया था पांच साल का वेतन

रांची. रिम्स के स्त्री रोग विभाग की पूर्व प्रोफेसर डॉ. करुणा झा को वेतन के रूप में करीब 18 लाख रुपए देने की जांच शुरू हो गई है। स्वास्थ्य विभाग ने रिम्स निदेशक डॉ. आरके श्रीवास्तव को पत्र लिखकर पूछा है कि ये 18 लाख रुपए किस निदेशक के समय में भुगतान किए गए? हाईकोर्ट के आदेश के बाद किस निदेशक ने रीजेंट ऑर्डर पास नहीं किया? विभाग ने स्पष्ट किया है कि सरकार से आदेश लिए बिना रिम्स पदाधिकारियों ने खुद वेतन का भुगतान कर दिया। यह मामला 2008 का है। लेकिन 2011 में जब डॉ. करुणा को वेतन भुगतान किया गया, रिम्स निदेशक पद पर डॉ. तुलसी महतो पदस्थापित थे।


मामले को लटकाने का है प्रयास
- इस मामले में पूछे जाने पर डॉ. करुणा झा की ओर से उनके पति सीबी चौधरी ने पक्ष रखते हुए कहा कि यह पूरी तरह से मामले को लटकाने का प्रयास है। डॉ. करुणा कभी भी रिम्स की स्टाफ नहीं रहीं। उन्होंने वीआरएस ले लिया है। उन्हें पेंशन मिलनी चाहिए।

ये है केस हिस्ट्री: बिना रीजेंट ऑर्डर पास किए हो गया वेतन का भुगतान

- रिम्स के तत्कालीन निदेशक ने डॉ. करुणा झा काे प्राइवेट प्रैक्टिस करने और ड्यूटी से लगातार अनुपस्थित रहने के आरोप में 18 अगस्त 2006 को 7 अक्टूबर 2005 की तिथि से बर्खास्त कर दिया था। बाद में डॉ. झा ने हाईकोर्ट में इसे चुनौती दी। कोर्ट ने 7 जुलाई 2011 को रिम्स निदेशक का आदेश निरस्त कर दिया। लेकिन इस मामले में रिम्स या सरकार की ओर से अपील याचिका दायर नहीं की गई। तत्कालीन रिम्स निदेशक ने विभाग से सुविवेचित आदेश (रीजेंट ऑर्डर) लिए बिना डाॅ. झा को बर्खास्तगी की अवधि पांच साल के वेतन के रूप में 18 लाख रुपए का भुगतान कर दिया।

- इधर, डॉ. करुणा झा के खिलाफ विभागीय कार्रवाई चलती रही। स्वास्थ्य विभाग ने समीक्षा में पाया कि डाॅ. झा ने कभी स्वत: प्रभार ग्रहण किया तो कभी स्वत: प्रभार त्याग दिया, जो अनुशासनहीनता है। वर्ष 2012 में डॉ. करुणा झा ने विभागीय कार्रवाई खत्म करने के लिए कोर्ट में फिर केस कर दिया। इस पर वर्ष 2017 में कोर्ट ऑर्डर आया। इस ऑर्डर के विरुद्ध भी समय से अपील याचिका दायर नहीं की गई।