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फर्जी सरेंडर / मुख्य आरोपी ने कहा- डीजीपी डीके पांडेय और पूर्व गृह सचिव जेबी तुबिद के कहने पर कराया सरेंडर

Dainik Bhaskar

Jan 12, 2019, 06:21 AM IST


hearing on February 18 in fake surrender case
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hearing on February 18 in fake surrender case

  • मुख्य आरोपी रवि ने हाईकोर्ट में दायर की हस्तक्षेप याचिका
  • चीफ जस्टिस की खंडपीठ ने केस को दूसरे कोर्ट में भेजा

रांची. 514 आदिवासी युवकों को फर्जी तरीके से नक्सली बताकर सरेंडर कराने के मामले को हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस अनिरुद्ध बोस व जस्टिस एचसी मिश्रा की खंडपीठ ने जस्टिस अपरेश सिंह की खंडपीठ में स्थानांतरित कर दिया। अब 18 फरवरी को सुनवाई होगी।

 

सरकारी वकील बोले- कोई गड़बड़ी नहीं हुई

सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता के वकील ने कहा-पुलिस के आला अफसरों ने पैसा और नाम कमाने के लिए भोले-भाले आदिवासियों को नक्सली बताकर सरेंडर कराने की तैयारी की। ओल्ड जेल कैंप में इन्हें सरकारी खर्च पर प्रशिक्षण दिया जा रहा था। इसलिए मामले की सीबीआई जांच कराने का निर्देश दिया जाए। वहीं सरकार की ओर से महाधिवक्ता अजीत कुमार ने बताया कि जस्टिस अपरेश सिंह की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने इसकी विस्तृत सुनवाई की थी। सरकार ने जवाब भी दिया था। इसमें कुछ गड़बड़ी नहीं हुई। 

 

हस्तक्षेप याचिका दायर की
उधर, मुख्य आरोपी रवि बोदरा ने हस्तक्षेप याचिका दायर की है। इसमें कहा है कि वह मामूली आदमी है। तत्कालीन गृह सचिव जेबी तुबिद, सीआरपीएफ के तत्कालीन आईजी डीके पांडेय (अभी डीजीपी), रांची के तत्कालीन एसएसपी साकेत कुमार सिंह, कोबरा बटालियन के तत्कालीन डिप्टी कमांडेंट पीआर मिश्रा और कंपनी कमांडर लखेंदर सिंह के कहने पर भटके युवाओं को सरेंडर कराया था। अब ये पहचानने से भी इनकार कर रहे हैं। मामले की सीबीआई जांच होनी चाहिए।

 

आला अफसरों ने कहा था-सरेंडर करवाएं

बोदरा ने याचिका में कहा-मैं रिटायर्ड सैन्यकर्मी और सामाजिक कार्यकर्ता हूं। मुझसे आला पुलिस अफसरों ने संपर्क किया। कहा कि जो युवक नक्सलियों की शरण में जा चुके हैं, उन्हें मुख्यधारा में शामिल कराएं। इनके कहने पर मैंने इन युवाओं से संपर्क किया। सरेंडर के लिए तैयार होने की जानकारी अफसरों को दी। फिर 500 से अधिक नक्सलियों ने हथियार के साथ सरेंडर कर दिया। पुलिस अफसर उन्हें साथ ले गए। अब कहने लगे कि सरेंडर से उनका कोई संबंध नहीं है। मुझे अपराधी बना दिया।

 

फर्जी था तो पुलिस को करनी चाहिए थी जांच

बोदरा ने कहा है कि मैंने वास्तविक नक्सलियों को सरेंडर कराने का प्रयास किया था। उनमें कोई फर्जी था तो इसकी जांच पुलिस अफसरों को करनी चाहिए थी। लेकिन सरकार ढाई साल तक सरेंडर करनेवाले सभी युवाओं का पूरा खर्च (खाने और रहने) वहन करती रही, और सारा दोष मुझ पर मढ़ दिया। बोदरा ने कहा है कि सरेंडर करने वाले नक्सलियों के अधिकारों की रक्षा के लिए अपना पक्ष कोर्ट में रखा है। मैं प्रतिवादी के रूप में पक्ष रखने की अनुमति चाहता हूं।

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