गुड न्यूज / डाइक्लोफिनेक दवा पर प्रतिबंध का सुखद परिणाम, सीतागढ़ में दिख रहे 50 से अधिक गिद्ध



Increase in number of vultures
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Increase in number of vultures

  • हजारीबाग जिले में धीरे-धीरे बढ़ रही है गिद्धों की संख्या, झुंड में युवा गिद्ध की संतोषजनक संख्या
  • गिद्धों की लगातार मौत के चलते डाइक्लोफिनेक पर लगाया गया था प्रतिबंध

Dainik Bhaskar

Nov 09, 2019, 02:02 AM IST

हजारीबाग (मुरारी सिंह). देश में डाइक्लोफिनेक सोडियम नाम की दवा को जानवरों के इलाज में प्रतिबंधित करने का सुखद परिणाम मिलने लगा है। हजारीबाग में अब विलुप्तप्राय  गिद्ध (वल्चर) आसानी से दिखने लगे हैं। शहर से मात्र 10 किलोमीटर दूर हजारीबाग-चुरचू मार्ग पर स्थित पिंजरापोल गोशाला के मृत जानवरों के फेंकने का स्थान (कार्केस डिस्पोजल साइट) में मृत गाय, बैल को फेंकने के चार से पांच घंटों के बाद कई दर्जन गिद्ध उन्हें खाने के लिए पहुंच रहे हैं।

 

पिछले दिनाें हजारीबाग के वाइल्ड लाइफ फोटोग्राफर अमित जैन ने सीतागढ़ कार्केस साइट पर 50 से अधिक की संख्या में पहुंचे गिद्धों की फोटो खींचकर वीडियो बनाया। इनमें अधिकतर एक से दो साल के गिद्ध थे। दर्द और सूजन निवारक डाइक्लोफिनेक सोडियम ही गिद्धों के मरने की मुख्य वजह थी। 2006 तक यह दवा जानवरों के इलाज में इस्तेमाल की जाती रहीं। जानवरों में इस्तेमाल के दौरान जानवर मर जाय और उसे फेंक देने के बाद उसे जितने भी गिद्ध खाते थे, 70 से 80 घंटों के भीतर विसरल गाउट के कारण दम तोड़ दे रहे थे।

 

डाइक्लोफिनेक दवा पर 2012 में लगा था प्रतिबंध

भारत सरकार ने 2006 में जानवरों वाले डाइक्लोफिनेक के उत्पादन और वितरण पर रोक लगा दी थी। विकल्प के तौर पर बाजार में मेलॉक्सीकेम नाम की दवा को लांच किया गया था। पुरानी दवा की तुलना में नई दवा महंगी और कम असरकारक थी। इसके दुष्परिणाम के रूप में यह सामने आया कि मनुष्यों में इस्तेमाल होनेवाले डाइक्लोफिनेक की मल्टी डोज वाइल कई वर्षों तक जानवरों में इस्तेमाल होती रही। 2012 में सरकार ने पुन: मनुष्यों के मल्टी डोज वाइल को भी प्रतिबंधित कर दिया। अब बाजार में मनुष्यों में इस्तेमाल होनेवाले डाइक्लोफिनेक की सिंगल डोज वाइल ही उपलब्ध है। इसका जानवरों में इस्तेमाल करना काफी महंगा हो गया। अब इसका इस्तेमाल जानवरों में नहीं होता है।

 

हजारीबाग बन रहा है वल्चर सेफ जोन

हजारीबाग जिले में पिछले चार साल से गिद्धों के असामयिक मौत की रिपोर्ट नहीं है। गिद्ध संरक्षण पर काम करनेवाली अंतरराष्ट्रीय संस्था आरएसपीबी ने हजारीबाग जिले को प्रोविजनल वल्चर सेफ जोन घोषित कर रखा है। यहां गिद्ध प्राकृतिक अवस्था में अपने कुनबे को बढ़ा रहे हैं। कार्केस साइट में युवा गिद्ध दिखना अच्छे संकेत हैं। जल्द ही गिद्दों की संख्या पुराने दौर में पहुंचने का अनुमान है।

 

काफी कम है गिद्धाें की प्रजनन दर

झारखंड के गिद्धों के संरक्षण पर पीएचडी करनेवाले डॉ सत्य प्रकाश के अनुसार एक गिद्ध को प्रजनन के लायक होने में न्यूनतम चार से पांच साल लगते हैं। एक वर्ष में मादा गिद्ध एक या दो अंडे ही देती है। अधिकतर घोंसले में दूसरा अंडा बेकार हो जाता है। यही वजह है गिद्ध तेजी से घटे हैं, लेकिन इनके बढ़ने में काफी समय लगेगा।

 

हजारीबाग में बचे थे 300 गिद्ध
हजारीबाग से 10 मरे हुए गिद्धों को अंत्य परीक्षण के लिए वल्चर कंजर्वेशन सेंटर पिंजौर भेजा गया था। अधिकतर गिद्ध डाइक्लोफिनेक के कारण मरे थे। पिछले चार साल में गिद्धों के मरने की सूचना नहीं है। यह अच्छा संकेत है। हजारीबाग 300 से अधिक गिद्ध बचे हुए थे। अब उनकी संख्या बढ़ रही है। जैव विविधता संरक्षण की दिशा में यह अच्छा संकेत है। -  डॉ सत्य प्रकाश, स्टेट को-ऑडिनेटर, बर्ड कंजर्वेशन नेटवर्क

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