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आदिवासियों को सुरक्षा देने वाली परंपरा है पत्थलगड़ी; 2017 में पुलिस ने अफीम की खेती नष्ट की थी, उसके बाद हुई विवादित

7 महीने पहले
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फाइल फोटो।
  • आदिवासी इलाकों में लगाए जाते हैं पत्थर, लिखते हैं- गांव में ग्रामसभा का चलेगा शासन
  • पत्थलगड़ी आदिवासियों की सैकड़ों साल पुरानी परंपरा है, जो उन्हें तमाम अधिकार देती है

रांची. आदिवासियों को सुरक्षा और आजादी का हक देने वाली परंपरा पत्थलगड़ी यूं तो सैकड़ों साल पुरानी है। लेकिन, 2017 में पहली बार ये विवादित हुई थी। रांची से पास एक गांव के ग्रामीणों ने पुलिस की कार्रवाई का विरोध किया था और कथित रूप से इससे बचने के लिए अपराधियों के संरक्षण में गांव में पत्थलगड़ी की थी। पत्थलगड़ी के बाद गांव में बाहरी लोगों के बिना ग्राम सभा के इजाजत के घुसने पर रोक लगा दी गई थी। अगर कोई ग्राम सभा की इजाजत के बाद गांव में आता था तो उसे बंधक बना लिया जाता था और फिर ग्राम सभा जो भी सजा सुनाती थी, उसे भुगतना पड़ता था। 

कब और कैसे हुई विवादित हुई पत्थलगड़ी
झारखंड में पत्थलगड़ी का विवाद सबसे पहले मार्च 2017 में उस वक्त आया जब रांची से करीब 10 किलोमीटर दूर तुपुदाना ओपी के नामकुम प्रखंड के सोहड़ा गांव में पुलिस अफीम की खेती नष्ट करने पहुंची थी। साल 2017 में दक्षिण कोरिया की ऑटोमोबाइल कंपनी गांव के करीब 200 एकड़ जमीन पर प्लांट लगाना चाहती थी। कंपनी के प्रतिनिधियों ने तीन बार गांव का दौरा किया और फिर काम शुरू किया गया। लेकिन, काम शुरू होने के कुछ दिनों बाद ग्रामीणों ने गांव में पत्थलगड़ी कर दी। ऐलान किया गया कि बाहर का कोई भी आदमी गांव में दाखिल नहीं हो सकता है। इसके बाद ऑटोमोबाइल कंपनी को काम बंद करना पड़ा। प्रशासन ने दावा किया कि जनवरी 2017 से अगस्त 2017 के बीच खूंटी, अड़की व मुरहू इलाके में करीब 50 किलो अफीम बरामद हुई थी और प्रशासन ने इन गांवों में हो रही अफीम की खेती को बर्बाद किया था। प्रशासन के कदम से बौखलाए अपराधियों की शह पर ग्रामीणों ने पत्थलगड़ी कर प्रशासनिक अधिकारियों को गांव में जाने से रोका।

पारंपरिक हथियार भारी पड़ गए थे अधुनिक हथियारों पर
कुछ महीने के बाद 25 अगस्त 2017 को पुलिस को सूचना मिली की खूंटी जिले के सिलादोन गांव में अफीम की खेती हो रही है। सूचना पर डिप्टी एसपी रणवीर कुमार के नेतृत्व में पुलिस की टीम मौके पर पहुंची, जिसके बाद ग्रामीण नाराज हो गए और उन्होंने पारंपरिक हथियार के दम पर अत्याधुनिक हथियार से लैस पुलिसकर्मियों को बंधक बना लिया। बाद में जब पुलिस के बड़े अधिकारी मौके पर पहुंचे तब पुलिस की टीम को मुक्त कराया गया।

पुलिस को बंधक बनाकर ग्रामीणों ने प्रधान को मुक्त कराया
करीब छह महीने बाद फरवरी 2018 में पुलिस नक्सलियों के खिलाफ खूंटी के कोचांग इलाके से सर्च अभियान के बाद लौट रही थी। इस दौरान 2017 में पुलिस की टीम को बंधक बनाने का आरोपी कुरुंगा गांव प्रधान सागर मुंडा पुलिस को मिल गया। पुलिस की टीम ने सागर मुंडा को हिरासत में लेकर थाना पहुंची। बाद में पुलिस को पता चला कि सर्च अभियान से लौट रही टीम के कुछ जवानों को ग्रामीणों ने बंधक बना लिया है। फिर जब पुलिस ने सागर मुंडा को रिहा किया, तब जाकर बंधक बनाए पुलिसकर्मियों को ग्रामीणों ने मुक्त किया। 

क्या होती है पत्थलगड़ी?
पत्थलगड़ी आदिवासी समाज की परंपरा है, जिसके जरिए गांव का सीमांकन किया जाता है। इसके अलावा आदिवासी इलाके में कोई भी काम होता है तो गांव में बड़ा पत्थर लगाकर उस काम को पत्थर पर दर्ज किया जाता है। आदिवासी इलाके में किसी की मौत होने, जन्म होने, शहीद होने को भी पत्थल (पत्थर) पर दर्ज किया जाता है। कभी-कभी कुछ आदिवासी मिलकर कोई नया गांव बसाना चाहते हैं, तो वे गांव की सीमा निर्धारित करते हैं और सीमा पर ही पत्थर लगाकर गांव का नाम, उसकी सीमा और उसकी जनसंख्या जैसी चीजें पत्थर पर लिखते हैं। ये प्रथा सैकड़ों सालों से चली आ रही है। लेकिन, अब इसी की आड़ में गांव के बाहर अवैध ढंग से पत्थलगड़ी की जा रही है।

संविधान से छेड़छाड़ कर ग्रामीणों को उकसा रहे
पत्थर पर ग्राम सभा का अधिकार दिलाने वाले भारतीय संविधान के अनुच्छेदों (आर्टिकल) की गलत व्याख्या करते हुए ग्रामीणों को आंदोलन के लिए उकसाया जा रहा है। फिलहाल हो ये रहा है कि अगर पत्थलगड़ी करके किसी गांव की सीमा निर्धारित कर दी गई है, तो उसका नियम ये है कि उस गांव की ग्रामसभा की इजाजत के बिना कोई भी शख्स उस गांव में दाखिल नहीं हो सकता। बाहर से आए किसी भी शख्स को पहले ग्रामसभा से इजाजत लेनी पड़ती है, तभी उसे गांव में घुसने की इजाजत मिलती है। अगर कोई बिना इजाजत के गांव में आता है, तो उसे बंधक बना लिया जाता है। फिर ग्रामसभा जो सजा तय करती है, उसे उस शख्स को भुगतना पड़ता है।

पत्थलगड़ी और संविधान का कनेक्शन
आदिवासी समाज गैर आदिवासियों को दीकू कहते हैं जिसका मतलब विदेशी या बाहरी होता है। जिन इलाकों में पत्थलगड़ी होती है वहां के आदिवासियों का कहना होता है कि उनके इलाकों में विकास के काम नहीं हुए हैं, मूलभूत सुविधाएं नहीं हैं। राज्य की सरकार उनके लिए कुछ नहीं कर रही है, इसलिए हम गांवों में संविधान की ओर से दी गई शक्ति का इस्तेमाल करते हैं और पत्थलगड़ी करते हैं। पत्थलगड़ी करने के बाद उनके गांव में ग्रामसभा का राज चलेगा। उनका नारा होता है ‘अबुआ धरती, अबुआ राज (अपनी धरती, अपना राज) अब चलेगा ग्राम सभा का राज’।

पत्थलगड़ी के दौरान पत्थर पर लिखे जाते हैं भारतीय संविधान के गलत बिंदु

  • भारत का संविधान अनुच्छेद - 13(3) (क) के तहत रूढ़ी या प्रथा ही विधि का बल है। यानि संविधान है।
  • अनुच्छेद (19) 5 के तहत पांचवीं अनुसूचित जिलों या क्षेत्रों में कोई बाहरी गैर रूढ़ी प्रथा व्यक्तियों को स्वतंत्र रूप से भ्रमण करना, निवास करना, बस जाना, घूमना वर्जित करता है।
  • पत्थलगड़ी पर लिखा गया है कि भारत का संविधान अनुच्छेद 19 (6) के तहत कोई भी बाहरी व्यक्तियों को पांचवी अनुसूचित क्षेत्रों में व्यवसाय कारोबार रोजगार पर प्रतिबंध है।
  • पांचवी अनुसूचित जिलों या क्षेत्रों में भारत का संविधान अनुच्छेद 244 (1) भाग (ख) धारा (5) (1) के तहत संसद या विधान मंडल का कोई भी सामान्य कानून लागू नहीं है।

भारतीय संविधान में लिखे सही बिंदु है

  • किसी राज्य या स्थान विशेष में अगर पशु की बलि देने की प्रथा या रूढ़ी है तो वह भारतीय कानून के अनुसार दंडनीय अपराध है। संविधान के मुताबिक ऐसी कोई भी प्रथा या रूढ़ी सर्वोच्च नहीं है।
  • अनुच्छेद (19) 5 के (उपखंड घ और ड) में प्रावधान है कि सभी नागरिकों को भारत के राज्य क्षेत्र में बिना किसी बाधा के आने-जाने, निवास करने, बसने का अधिकार है। इसमें यह प्रावधान नहीं हैं कि अनुसूचित क्षेत्रों में गैर अनुसूचित जनजाति के लोग भ्रमण नहीं कर सकते या बस नहीं सकते हैं।
  • अनुच्छेद 19 (6) उक्त खंड के उपखंड (छ) में सभी नागरिकों को कोई भी पेशा, व्यापार, रोजगार करने, उपजीविका चलाने का अधिकार है। इस प्रावधान में अनुसूचित जनजाति का उल्लेख नहीं है। बल्कि साधारण जनता का उल्लेख है। गैर अनुसूचित जनजाति को अनुसूचित क्षेत्रों में पेशा करने पर कोई प्रतिबंध नहीं है।
  • भारत के संविधान की 5वीं अनुसूची असम, मेघालय, त्रिपुरा, मिजोरम को छोड़कर अन्य राज्यों में अनुसूचित क्षेत्रों, अनुसूचित जातियों के प्रशासन व नियंत्रण के बारे में प्रावधान करता है। अनुसूची के पारा-2 के अनुसार किसी राज्य में कार्यपालिका शक्ति का विस्तार अनुसूचित क्षेत्रों पर, इस अनुसूची में दिए गए प्रावधानों के तहत होगा।

आदिवासियों का है कहना
झारखंड के आदिवासी पत्थलगड़ी को जायज ठहराते हुए कहते हैं कि ये प्रथा तो अंग्रेजों के जमाने में भी थी। उनका कहना है कि पूर्व में जब ब्रिटिश अधिकारियों ने आदिवासी समुदाय से पूछा था कि वो कैसे साबित कर सकते हैं कि जमीन उनकी है। जवाब में आदिवासियों ने ब्रिटिश अधिकारियों को कुछ पत्थर दिखाए थे, जिनपर उनकी जमीनों के सीमांकन के बारे में लिखा गया था। उस वक्त ब्रिटिश साम्राज्य ने इन पत्थरों को मान्यता दी थी।

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