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रांची. राज्य में कुल 24 जिले हैं। इनमें से सात जिलों के मिडिल स्कूलों में एक भी स्थायी प्राचार्य कार्यरत नहीं हैं। इनमें हजारीबाग, चतरा, सरायकेला, लोहरदगा, रामगढ़, साहेबगंज और पाकुड़ शामिल हैं। वहीं, पांच जिलों के लिए सिर्फ एक-एक परमानेंट प्रिंसिपल हैं, जिनमें रामगढ़, कोडरमा, पश्चिमी सिंहभूम, सिमडेगा, जामताड़ा जिले शामिल हैं। इसी प्रकार पांच जिलों में पांच से भी कम परमानेंट प्रिंसिपल हैं।
झारखंड के मध्य विद्यालयों में प्रिंसिपल के कुल 3226 पद सृजित हैं। इनमें से 3096 पद खाली हैं। सिर्फ 130 प्रिंसिपल के भरोसे प्राइमरी व मध्य विद्यालयों को चलाया जा रहा है। इसकी मुख्य वजह रिटायर होने के बाद प्रिंसिपल के रिक्त पदों पर नियुक्ति या प्रोन्नति नहीं होना है। प्रत्येक माह प्रिंसिपल रिटायर हो रहे हैं, लेकिन उनके स्थान पर नियुक्ति-प्रोन्नति नहीं हो रही है। राज्य के मिडिल स्कूलों में प्रिंसिपल के कुल पदों में से वर्तमान में सिर्फ पांच प्रतिशत पद पर कार्यरत हैं, वहीं 95 प्रतिशत पद खाली हैं। इसका सीधा असर स्कूलों के शैक्षणिक और प्रशासनिक कार्यों पर पड़ रहा है।
प्रमोशन नियमावली- 1993 में हो संशोधन...
अखिल झारखंड प्राथमिक शिक्षक संघ ने कहा है कि 93 प्रतिशत रिक्तियां शिक्षकों को प्रमोशन देकर भरी जा सकती हैं। संघ के अध्यक्ष बृजेंद्र चौबे, महासचिव राममूर्ति ठाकुर और मुख्य प्रवक्ता नसीम अहमद ने कहा कि प्रोन्नति नियमावली-1993 में संशोधन करना एक मात्र विकल्प है। इससे 13 वर्षों की सेवा पूरी करने वाले शिक्षकों को प्रिंसिपल के पद प्रमोशन दिया जा सकेगा।
इसलिए नहीं हो रहा प्रमोशन
बिहार की प्रमोशन नियमावली-1993 झारखंड में लागू है। इस नियम के अनुसार, शिक्षकों को ग्रेड फोर में सात वर्ष कार्य करने का अनुभव होना चाहिए। प्राथमिक शिक्षकों का कहना है कि यहां निर्धारित समय पर उनको प्रमोशन नहीं मिला है। जिसके कारण ग्रेड फोर में रहते हुए पांच-सात साल का अनुभव नहीं है।
क्या पड़ रहा प्रभाव...
स्कूलों में प्रिंसिपल नहीं रहने से शैक्षणिक के साथ प्रशासनिक कार्यों पर सीधे तौर पर प्रभाव पड़ रहा है। इसके अलावा प्रत्येक माह शिक्षकों को वेतन भुगतान में भी परेशानी होती है। प्रिंसिपल पद पर प्रमोशन या नई नियुक्ति से ही समस्या का समाधान हो सकता है।




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