झारखंड / प्रदीप व बंधु एक साथ दूसरे दल में चले गए तो आसान हो सकती है बाबूलाल मरांडी की राह

झाविमो प्रमुख बाबूलाल मरांडी। (फाइल) झाविमो प्रमुख बाबूलाल मरांडी। (फाइल)
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झाविमो प्रमुख बाबूलाल मरांडी। (फाइल)झाविमो प्रमुख बाबूलाल मरांडी। (फाइल)

  • दल-बदल का पेंच : झाविमो अध्यक्ष बाबूलाल के भाजपा में जाने का रास्ता आसान नहीं

Dainik Bhaskar

Jan 14, 2020, 10:57 AM IST

रांची(जीतेंद्र कुमार).  झाविमो प्रमुख बाबूलाल मरांडी भाजपा के काफी नजदीक आ चुके हैं। उनकी गतिविधियां भी भाजपा में जाने की ओर ही इशारा कर रही हैं। भाजपा द्वारा विधायक दल का नेता पद खाली रखने से उनके इस पद पर जाने के भी संकेत मिलते हैं। संभव है भाजपा के सामने मरांडी के लिए दूसरे विकल्प भी हों। मरांडी भाजपा में जाएंगे, इसकी अनौपचारिक पुष्टि उनके दल के वरीय नेता भी कर रहे हैं। लेकिन बाबूलाल मरांडी भाजपा में जाएंगे या उनकी पार्टी का भाजपा में विलय होगा, यह कैसे संभव होगा, सबसे बड़ा सवाल है।

भाजपा में उनके जाने या झाविमो के भाजपा में विलय की राह में दल बदल कानून के भी रोड़े हैं। यह कानून उन्हें किस हद तक भाजपा में जाने का मार्ग सुलभ या दुरूह करता है, कहां-कहां और कौन-कौन से रोड़े हैं। इस प्रकरण का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि झाविमो के शेष दोनों विधायक प्रदीप यादव और बंधु तिर्की बाबूलाल मरांडी के साथ भाजपा में जाने को तैयार होते हैं या उससे पहले कोई अलग निर्णय लेते हैं। इन पहलुओं पर दैनिक भास्कर ने विधायी और कानूनी मामलों के विशेषज्ञों से बातचीत कर राय जानी है। हुई बातचीत के आधार पर प्रस्तुत है विस्तृत रिपोर्ट...

झाविमो के भाजपा में विलय की राह में भरे-पड़े हैं दल बदल के रोड़े
सीन-1. पार्टी प्रमुख बाबूलाल झाविमो का भाजपा में विलय का फैसला लेते हैं। इसमें उनका दोनों विधायक भी साथ देते हैं। हालांकि इसकी संभावना कम है।

सीन-2. बाबूलाल मरांडी झाविमो का भाजपा में विलय का फैसला लेते हैं और प्रदीप यादव भी उनके साथ देते हैं। कुछ कुछ संभावना इसकी भी है।

सीन-3. प्रदीप यादव और बंधु तिर्की, दोनों एक साथ पहले ही दूसरे किसी दल में चले जाते हैं। इसके बाद बाबूलाल मरांडी अकेले बचते हैं, जो स्वतंत्र रूप से फैसला ले सकते हैं। इसकी संभावना थोड़ी ज्यादा है।

सीन-4. बाबूलाल मरांडी खुद विधायकी से इस्तीफा देकर भाजपा में चले जाते हैं। फिर दल बदल का कोई चक्कर नहीं रहेगा। इसकी भी संभावना बन सकती है।

विवाद के जो बिंदू चल रहे हैं
यदि पार्टी प्रमुख के नाते बाबूलाल मरांडी भाजपा में पार्टी विलय की घोषणा करते हैं और झाविमो विधायक दल के नेता प्रदीप यादव कहते हैं कि पार्टी का पूरी तरह से विलय नहीं हुआ है। मैं और मेरे साथ के दूसरे सदस्य झाविमो के ही सदस्य बने रहेंगे, तब यह विषय दल बदल के तहत फिर स्पीकर के पास निर्णय के लिए आ जाएगा। यह आपत्ति विधानसभा के किसी दूसरे सदस्य द्वारा भी स्पीकर के सामने उठायी जा सकती है। फिर किसी पार्टी के विधायक दल के सभी सदस्य यदि विलय पर सहमत नहीं होते हैं, तो विभाजन की स्थिति में तीन में दो सदस्यों का एकमत होना आवश्यक हो जाएगा।

पूर्व में झाविमो के 6 विधायकों के भाजपा में जाने के महत्वपर्ण पहलू
2014 में झाविमो के आठ विधायक जीत कर आये। छह विधायक टूट कर भाजपा में शामिल हो गए। इसके बाद बाबूलाल मरांडी और प्रदीप यादव ने स्पीकर के कोर्ट में याचिका दायर की। उसमें उन्होंने कहा कि पार्टी ने विलय की सहमति नहीं दी है। कार्यकारिणी में भी कोई निर्णय नहीं हुआ है। जिस बैठक का छह विधायक हवाला दे रहे हैं, वह असंवैधानिक बैठक थी। इसलिए छह विधायकों का पार्टी छोड़ना माना जाएगा, न कि विलय माना जाएगा। स्वेच्छा से इनका पार्टी छोड़ना दल-बदल कानून के दायरे में आता है। वहीं छह विधायकों ने स्पीकर कोर्ट में सुनवाई के दौरान यह तर्क देते रहे कि बाबूलाल मरांडी की अध्यक्षता में कोई कार्यकारिणी थी ही नहीं। इसके लिए दलादली में आमसभा हुई। जानकी यादव को अध्यक्ष चुना गया। उनकी अध्यक्षता में हुई हजारों कार्यकर्ताओं की आमसभा में झाविमो के भाजपा में विलय का निर्णय लिया गया। 6 विधायकों ने भी समर्थन किया, इसलिए छह विधायक भाजपा के मेंबर हुए।

दल बदल कानून विधायक पर लागू होता है दल पर नहीं
विशेषज्ञों का यह भी मानना है कि दल बदल कानून के स्पिरिट में सदन के सदस्य हैं, न कि पार्टी। कोई सदस्य पार्टी के अनुशासन को मान रहा है अथवा नहीं, यह देखना स्पीकर के दायरे में नहीं है। स्पीकर के कोर्ट में मामला अाने पर उसे मुख्य रूप से यह देखना होता है कि विलय का उस दल का दो तिहाई सदस्य समर्थक हैं अथवा नहीं।

गुवाहाटी हाईकोर्ट के फैसले को स्पीकर ने बनाया था आधार
तत्कालीन स्पीकर दिनेश उरांव ने अपने फैसले में गुवाहाटी हाईकोर्ट के एक फैसले को आधार बनाया। जिसमें कहा गया है कि मर्जर में यह देखा जाना है कि सदन में उस पार्टी के दो तिहाई सदस्य तैयार हैं कि नहीं। चूंकि झाविमो के दो तिहाई सदस्य एक मत थे, इसलिए सदस्यता पर आंच नहीं आई।

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