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यंग जेनेरेश को जेंडर इक्वेलिटी समझाने रांची पहुंचे राकेश

इस फोटो में साइकिल पर दिख रहे शख्स का नाम है राकेश। उम्र करीब 40 साल। इन दिनों रांची में हैं। एक मिशन पर। यह मिशन है...

Dainik Bhaskar

Apr 17, 2018, 02:40 AM IST
यंग जेनेरेश को जेंडर इक्वेलिटी समझाने रांची पहुंचे राकेश
इस फोटो में साइकिल पर दिख रहे शख्स का नाम है राकेश। उम्र करीब 40 साल। इन दिनों रांची में हैं। एक मिशन पर। यह मिशन है जेंडर इक्वेलिटी का। आधी आबादी की आजादी का। जेंडर बेस्ड वॉयलेंस खत्म करने के लिए युवाओं को जागरूक करने का। 15 मार्च 2014 से राकेश इस मिशन पर निकले हुए हैं। अब तक देश के 17 राज्य घूम चुके हैं। इस सफर में उनका साथ देती है उनकी साइकिल। वह इसी साइकिल से चार वर्षों में करीब 25 हजार किलोमीटर चल चुके हैं। इसी क्रम में रविवार को वह रांची पहुंचे।

For Good Cause

22 दिसंबर को पूरा होगा अभियान : राकेश के अनुसार, वह झारखंड के बाद उत्तर-पूर्वी राज्यों का रुख करेंगे। वहां से लौटकर बिहार में अपने गांव तराइनवी में इस अभियान का समापन करेंगे। उन्होंने इसके लिए 22 दिसंबर 2018 का टारगेट रखा है।

झारखंड में बिताएंगे 15 दिन, रांची के बाद जाएंगे जमशेदपुर

रांची के स्कूल-कॉलेजों में जाकर युवाओं से करेंगे बात

राकेश ने बताया कि वह झारखंड में करीब 15 दिन बिताएंगे। इसकी शुरुआत उन्होंने रांची से की है। राजधानी में वह रांची यूनिवर्सिटी, सेंट्रल यूनिवर्सिटी ऑफ झारखंड समेत कुछ अन्य स्कूल कॉलेजों में जाएंगे। वहां के स्टूडेंट्स से मिलेंगे और उन्हें दहेज, रेप, भ्रूण हत्या, घरेलू हिंसा, छेड़खानी जैसी चीजों के बारे में बातें करेंगे। उन्हें समझाएंगे कि वे जेंडर बेस्ड वॉयलेंस के खिलाफ एकजुट होकर लड़ें। आपस में बिना भेदभाव गलत के खिलाफ आवाज उठाएं। इसके लिए वह शहर के संस्थानों से बात कर रहे हैं।

नौकरी छोड़ कर शुरू किया यह काम

राकेश बिहार में छपरा जिले के रहने वाले हैं। चेन्नई में एक मल्टी नेशनल कंपनी में कॉर्पोरेट कम्युनिकेशन मैनेजर की नौकरी करते थे। उन्होंने बताया कि इस मिशन का ख्याल तब आया जब वह चेन्नई में कुछ एसिड अटैक सर्वाइवर्स से मिले। उनसे मिलकर और उनकी कहानियां सुनकर राकेश के मन में एक आग जल उठी। यह आग थी यंग जेनरेशन को यह समझाने की कि लड़के और लड़कियां बराबर हैं। दोनों को अपनी जिंदगी अपने तरीके से और अपनी शर्तों पर जीने का बराबर अधिकार है। लड़कियां लड़कों की जागीर नहीं जो उनकी हर बात मानने को मजबूर हों। इसलिए राकेश अपनी नौकरी छोड़ी। साइकिल उठाई और निकल पड़े अपने देश के युवाओं को हकीकत समझाने के अभियान पर।

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