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जब भी सरहदों की चीख सुनकर घर से निकलता हूं, मुझे मां सौंप देती है, खुदा की निगहबानी में

डॉ. खगेंद्र ठाकुर की पहचान वरिष्ठ आलोचक के नाते हैं। लेकिन रचनाकर्म की शुरआत उन्होंने भी कविता से ही की थी।...

Bhaskar News Network | Last Modified - Apr 17, 2018, 03:15 AM IST

जब भी सरहदों की चीख सुनकर घर से निकलता हूं, मुझे मां सौंप देती है, खुदा की निगहबानी में
डॉ. खगेंद्र ठाकुर की पहचान वरिष्ठ आलोचक के नाते हैं। लेकिन रचनाकर्म की शुरआत उन्होंने भी कविता से ही की थी। कालांतर में उनका झुकाव आलोचना की ओर हो गया। सोमवार शाम जब वे शब्दकार की गोष्ठी में अपने सुधी पाठकों से रूबरू हुए, तो उनके आग्रह पर उन्होंने कविता सुनाई भी। ‘मैंने घोड़े का कहा घोड़ा और वो हिनहिनाने लगा, मैंने कुत्ते को कहा कुत्ता और वो भौंकने लगा, मैंने आदमी को कहा आदमी और उसकी आंखें लाल हो गईं’ उनकी ऐसी कई काव्य पंक्तियां श्रीराम गार्डेन स्थित वीना श्रीवास्तव के आवास पर खूब गूंजी।

डॉ. खगेंद्र ठाकुर की अध्यक्षता में हुई देर रात तक चली काव्य गंगा की रसधारा की शुरुआत सूरज श्रीवास्तव ने ‘आईल गवनवां की साड़ी’ और प्रवीण परिमल के गीत ‘जय हो गुरु घंटाल की’ से की। नंदा पांडेय ने ‘हां, अब दर्द नहीं होता’ सुनाकर सबको भावविभोर कर दिया। डॉ. माया प्रसाद ने ‘मैं जब भी सरहदों की चीख सुनकर घर से निकलता हूं/ मुझे मां सौंप देती है, खुदा की निगहबानी में’ सुनाकर वाहवाही लूटी। डॉ. अशोक प्रियदर्शी ने व्यंग्यबाण छोड़ा ‘कुछ लोग गांथते कपड़ों में कला बत्तू/ भोजन की चिंता में त्रस्त मियां भत्तू/ क्या खाएं क्या पीयें, क्या लें परदेस जाएं/ डेढ़ सौ का किलो है समाजवादी सत्तू’। हास्य कवि विश्वनाथ वर्मा ने ‘मैं न फंसता हूं न फंसाता हूं/ न जलता हू न जलाता हूं/ बस हंसता हूं हंसाता हूं/ इस तरह गम को धत्ता बताता हूं सुनाया।’ नीरज नीर ने अपनी सद्य प्रकाशित काव्य संग्रह से ‘बुधवा’ नामक रचना सुनाई। नन्हीं कवयित्री ईशा श्रीवास्तव और समायरा शेखर ने भी गीतों की प्रस्तुति दी। संगीता कुजारा टाक ने स्वागत वक्तव्य दिया। संचालन राजीव थेपड़ा ने किया। काव्य संध्या का लुत्फ जस्टिस विक्रमादित्य प्रसाद, शालिनी नायक, नंदा पांडेय, संध्या चौधरी, अंशुमिता और शालू ने भी उठाया।

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