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विश्व में हीमोफीलिया के 4 लाख मरीज, 1 साल में रिम्स में 200 भर्ती

हीमोफीलिया एक जेनेटिक बीमारी है। यह रोग जब मनुष्य को होता है तो जख्म के बाद जब ब्लड निकलता है तो रुकता नहीं है, जो...

Dainik Bhaskar

Apr 17, 2018, 03:20 AM IST
विश्व में हीमोफीलिया के 4 लाख मरीज, 1 साल में रिम्स में 200 भर्ती
हीमोफीलिया एक जेनेटिक बीमारी है। यह रोग जब मनुष्य को होता है तो जख्म के बाद जब ब्लड निकलता है तो रुकता नहीं है, जो जानलेवा साबित हो सकता है। यह बीमारी युवाओं में और बच्चों में ज्यादा देखी जा रही है। कई बार इसके बारे में जानकारी न होने के कारण मरीज की मृत्यु भी हो जाती है। हीमोफीलिया के विश्व फेडरेशन के अनुसार, विश्वभर के लगभग 4 लाख व्यक्ति इससे ग्रस्त हैं। रांची के रिम्स में स्थित हीमोफीलिया सेंटर में पिछले एक साल में लगभग 200 मरीजों का इलाज किया गया है। इसमें से दो की मृत्यु भी हो चुकी है।

कई बार इस बीमारी की जानकारी नहीं होने से मरीज की मृत्यु भी हो जाती है

मां वाहक है और पिता नार्मल है, तो बेटा हीमोफीलिक होगा। एक बेटी वाहक होगी और एक बेटी नार्मल।

वहीं, बेटे को हीमोफीलिया है और जिससे उसकी शादी होगी, वह नॉर्मल है तो उसके बेटा नार्मल होगा, जबकि बेटियां वाहक होंगी।

ऐसे जेनेटिक है हिमोफिलिया

इस बीमारी के लक्षण पुरुषों में दिखाई देते हैं। जबकि, महिलाएं इसकी वाहक होती हैं। यह बीमारी पुरुषों में ज्यादा होती है। रेयर केस में महिलाओं में भी यह बीमारी दिखाई देती है।

हीमोफीलिया के लक्षण

किसी प्रकार की दुर्घटना या दूसरी चोट से खून बह रहा हो और लंबे समय तक न रुके तो यह हीमोफीलिया के लक्षण हैं। जोड़ों में दर्द व सूजन, घुटने व कोहनी में दर्द का रहना, मुंह व मसूड़ों में रक्तस्त्राव आदि शामिल है।

2.5 लाख यूनिट फैक्टर-8 दिए गए : हीमोफीलिया का इलाज फैक्टर 8 और फैक्टर 9 देकर किया जाता है। रिम्स में स्थित हीमोफीलिया ट्रीटमेंट सेंटर में पिछले एक साल में 2 लाख 47 हजार यूनिट फैक्टर 8 दिए गए। मरीजों को 21250 यूनिट फैक्टर 9 दिए गए।

क्लॉटिंग फैक्टर की कमी से होती है यह बीमारी

डॉक्टरों के अनुसार, यह बीमारी क्लॉटिंग फैक्टर की कमी के कारण होती है। यह एक प्रकार का प्रोटीन होता है, जो खून का थक्का बना कर रक्तस्राव को रोकता है। हीमोफीलिया रक्त को जमने से रोकती है। हीमोफीलिया से ग्रस्त व्यक्ति के अंदर क्लॉटिंग फैक्टर नहीं होता है या कम हो जाता है। ब्लडिंग सामान्य से ज्यादा देर तक होती है।

प्रोफलैक्टिक ट्रीटमेंट से हो रहा है इलाज

डाॅ. गोविंद सहाय ने बताया कि इस बीमारी में मां कैरियर होती है। इससे बीमारी पीढ़ी दर पीढ़ी फैलती है।

इस बीमारी के लिए एक नया ट्रीटमेंट आया है, जिसे प्रोफलैक्टिक ट्रीटमेंट कहते हैं। इससे लोगों को लाभ होगा। बताया कि इसमें लो डोज में फैक्टर देते हैं, हफ्ते में तीन दिन। उसके कारण ब्लड में फैक्टर को मेनटेन करता है, जो ब्लीडिंग को कम कर देता है।

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