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गुरु व ईश्वर की कृपा से मिलता है आत्मबल

मनुष्य को गुरु और भागवत कृपा से ही आत्मबल मिलता है, जिसके सहारे वह जीवन का बड़े से बड़ा संकट पार कर पाता है। मां...

Bhaskar News Network | Last Modified - Apr 17, 2018, 03:25 AM IST

मनुष्य को गुरु और भागवत कृपा से ही आत्मबल मिलता है, जिसके सहारे वह जीवन का बड़े से बड़ा संकट पार कर पाता है। मां आनंदमयी आश्रम में चिन्मय मिशन आश्रम के आचार्य स्वामी माधवानंद जी ने यह बात सोमवार को गीताज्ञान कथा के दूसरे दिन के प्रवचन में कही। उपस्थित श्रद्धालुओं और भक्तों को श्रीमद््भागवत गीता के श्लोकों का निहितार्थ बताया।

कुरुक्षेत्र में पांडवों और कौरवों की सेना सज जाने के बाद अर्जुन तथा दुर्योधन की मन:स्थिति का विश्लेषण करते हुए स्वामी माधवानंद ने कहा- इच्छा मृत्यु का वर प्राप्त भीष्म द्वारा संरक्षित होने के बावजूद दुर्योधन अज्ञात आशंका और भय से ग्रसित था, जबकि साक्षात श्रीकृष्ण का संरक्षण मिलने के बावजूद अर्जुन की भी वही हालत थी। दोनों में आत्मविश्वास की कमी थी, जबकि सफलता का रहस्य पूर्ण समर्पण और आत्मविश्वास में निहित होता है। महाभारत का अंत बताते हुए कहा कि श्रीकृष्ण द्वारा उत्साहित किए जाने पर अर्जुन का आत्मबल बढ़ा। कृष्ण जैसा गुरु न होता, तो पांडव यह युद्ध कतई नहीं जीत पाते। दुर्योधन को कृष्ण जैसा कोई गुरु नहीं मिल सका, इसलिए सारे संसाधनों के बावजूद कौरव हार गए।

उत्साह से जीवन में आई जटिलतम समस्याओं का भी समाधान संभव

दुर्योधन की मन:स्थिति भांपकर ही भीष्म ने शंखनाद किया और युद्ध करने का संकेत दिया था। इसके बाद कृष्ण, अर्जुन और उधर, कौरव सेना के महारथियों ने शंख नाद किए थे। चूंकि पहला शंखनाद भीष्म ने किया था, इससे स्पष्ट होता है कि युद्ध की शुरुआत कौरवों ने की थी। उनके शंखनाद का एक निहितार्थ यह भी है कि जीवन में जटिल से जटिल समस्याएं आती हैं, लेकिन उत्साह से उनका समाधान संभव है। गीता के प्रथम अध्याय के चौदहवें श्लोक की व्याख्या करते हुए स्वामी माधवानंद ने कहा कि इसमें रथारूढ़ श्रीकृष्ण व अर्जुन का अद््भुत वर्णन है। श्रीकृष्ण ने अर्जुन के युद्ध करने से मना करने पर जिस तरह उनका मार्गदर्शन किया, उसे गहराई से समझने की जरूरत है। इस स्वरूप का ध्यान कर मनुष्य अपना उत्साहवर्धन और कल्याण कर सकता है।

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