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परंपरागत पत्थलगड़ी सही, इसके नाम पर स्कूल बंद कराने की राजनीति गलत : सचिव

पर्यावरणविद सुनीता नारायण ने कहा कि प्राकृतिक संसाधनों पर अपना अधिकार सुनिश्चित करने के लिए देश में कई आंदोलन और...

Dainik Bhaskar

May 01, 2018, 03:35 AM IST
परंपरागत पत्थलगड़ी सही, इसके नाम पर स्कूल बंद कराने की राजनीति गलत : सचिव
पर्यावरणविद सुनीता नारायण ने कहा कि प्राकृतिक संसाधनों पर अपना अधिकार सुनिश्चित करने के लिए देश में कई आंदोलन और अभियान चल रहे हैं। झारखंड और छत्तीसगढ़ में चल रहा पत्थलगड़ी आंदोलन भी इनमें से एक है। इस आंदोलन का आधार आदिवासी क्षेत्रों में ग्रामसभा का संविधान प्रदत्त अधिकार है। पत्थरगड़ी पर अंकित किया जा रहा है कि बाहरी लोगों का ग्रामसभा की अनुमति के बिना गांव में प्रवेश निषेध है। सारी बहस इसी बात को लेकर है, पर इसे समझने की जरूरत है। इसे आदिवासियों के बीच जाकर ही समझा जा सकता है। इसे बिना सोचे-समझे राज्य विरोधी नहीं कहा जा सकता है। पंचायती राज में ग्राम सभा को मिले अधिकार का क्रियान्वयन न होना भी कहीं न कहीं पत्थलगड़ी से जुड़े सवाल हैं। सुनीता नारायण सोमवार को रांची के एक होटल में में आजादी की दूसरी लड़ाई के नाम से से हुई संगोष्ठी में बोल रही थी। आयोजन सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट ( सीएसई) ने किया था।

राज्य के पर्यटन सचिव मनीष रंजन ने कहा कि प्रशासन पत्थलगड़ी परंपरा का विरोधी नहीं है। बाहरी लोगों के हस्तक्षेप के कारण यह परंपरा बदनाम हो गई। वे बच्चों का स्कूल बंद कर रहे हैं। जबकि उनके बच्चे शहरों में अच्छे स्कूलों में पढ़ रहे हैं। यह कैसी राजनीति है। सरकार ने आदिवासी विकास समिति और आदिवासी ग्राम विकास समिति का गठन किया है। प्रखंड और जिला स्तर पर मुंडारी कक्षाएं चलाई जा रही हैं। योजना बनाओ अभियान चलाया जा रहा है। प्रभावित इलाके में 25 दिनों में 35 हजार शौचालय बनाए गए हैं। सरकार अपने स्तर से ग्राम सभा को मजबूत करने की कोशिश कर रही है। पत्रकार सुनील कुमार ने कहा कि मीडिया में दलित, आदिवासी और अल्पसंख्यकों की उपस्थिति कम है, इसलिए उनकी बात सामने नहीं आ पाती है। पत्रकार मनोज प्रसाद और रिचर्ड महापात्रा आदि ने भी अपनी बात रखी।

तीन सत्र में हुई संगोष्ठी में सीएसई की मदद से प्रकाशित पत्रिका डाउन टू अर्थ के हिंदी संस्करण का लोकार्पण भी किया गया। इस विशेष अंक में पत्थरगड़ी के आंदोलन पर आवरण कथा छपी है। मौके पर जेवियर कुजूर, अलोका, तीर्थनाथ आकाश, सुनील मिंज, जेरोम जेराल्ड, ग्लैडसंग डुंगडुंग और प्रवीर पीटर समेत कई लोग मौजूद थे।

सोशल एक्टीविस्ट दयामनी बारला ने कहा कि जिन आदिवासियों ने अपने गांव बसाए। उन्हें उनके गांव से ही बेदखल किया जा रहा है। न एसपीटी और न ही सीएनटी सही ढंग से लागू हो सका। बिना ग्राम सभा की सहमति से लैंड बैंक के लिए अनपढ़ आदिवासियों की जमीन ऑनलाइन ली जा रही है। आदिवासी विकास विरोधी नहीं है। हमने टाटा कारखाना और एचईसी के लिए भूमि दी। संजय बसु मल्लिक ने बताया कि आज सरकार ही कानून का पालन नहीं कर रही है। जबकि आदिवासी संविधान में दर्ज हक चाहते हैं।

संगोष्ठी में पत्रिका डाउन टू अर्थ के हिंदी संस्करण का लोकार्पण करते पर्यावरणविद सुनीता नाराेयण, पर्यटन सचिव मनीष रंजन, पूर्व सचिव संतोष सत्पथी व अन्य।

राज्यपाल के पूर्व सचिव संतोष सत्पथी बोले- ग्राम सभा को नहीं मिले अधिकार का आक्रोश है पत्थलगड़ी

राज्यपाल के पूर्व सचिव संतोष सत्पथी ने कहा कि तेजी के साथ आदिवासी गांवों में बढ़े पत्थलगड़ी आंदोलन के कारणों को समझने की जरूरत है। बिना मर्ज को समझे इलाज संभव ही नहीं। सरकार ने पंचायती राज लाया। ग्राम सभा भी बनी। संविधान ने उसे कई अधिकार भी दिए। लेकिन सरकार की ओर से अधिकार को लागू करने के लिए कोई संसाधान नहीं दिए गए। सुदूर अंचलों में न स्कूल है, न ही अस्पताल। न सड़कें हैं, न ही बिजली। खनन बिना ग्राम सभा की अनुमति के कई जगहों पर हो रहे हैं। इन सब के आक्रोश का नतीजा पत्थलगड़ी है।

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