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निर्माण एवं संपूर्ण शिल्प विद्या के ज्ञाता हैं भगवान विश्वकर्मा

विश्वकर्मा पूजा 17 सितंबर को मनाई जाती है। पौराणिक मान्यता के अनुसार इस दिन भगवान विश्वकर्मा ने सृष्टि की रचना की...

Danik Bhaskar | Sep 11, 2018, 04:15 AM IST
विश्वकर्मा पूजा 17 सितंबर को मनाई जाती है। पौराणिक मान्यता के अनुसार इस दिन भगवान विश्वकर्मा ने सृष्टि की रचना की थी। इसे सृष्टि रचना दिवस भी कहा जाता है। ऋग्वेद में विश्वकर्मा सूक्त के नाम से 11 ऋचाएं हैं, जिनके प्रत्येक मंत्र पर ऋषि विश्वकर्मा देवता आदि का उल्लेख है। ऋग्वेद में विश्वकर्मा शब्द का उल्लेख एक बार इंद्र एवं सूर्य के विशेषण के रूप में भी प्रयुक्त हुआ है। परवर्ती वेदों में भी इसका अनेक बार प्रयोग है और यह प्रजापति का विशेषण बनकर आया है। महर्षि अंगिरा के जेष्ठ पुत्र बृहस्पति की बहन भुवना जो ब्रम्हविद्या को जानने वाली थी। वह अष्टम वसु महर्षि प्रभास की प|ी बनी, उससे संपूर्ण शिल्प विद्या के ज्ञाता प्रजापति विश्वकर्मा का जन्म हुआ।

पुराणों में बृहस्पति की बहन का नाम कहीं योग सिद्धा, वरस्त्री भी उल्लिखित है। इस प्रकार विश्वकर्मा देवताओं के आचार्य संपूर्ण सिद्धियों के जनक प्रभाष ऋषि के पुत्र और महर्षि अंगिरा के जेष्ठ पुत्र के भांजा है अर्थात अंगिरा के दौहित्र (दोहिता) हैं। अंगिरा कुल से विश्वकर्मा का संबंध सभी विद्वान स्वीकार करते हैं। इस प्रकार प्रभास पुत्र भुवना से उत्पन्न विश्वकर्मा को ही आदि विश्वकर्मा मानते हैं। विश्वकर्मा ने इंद्रपुरी, कुबेरपुरी, पांडवपुरी आदि का निर्माण करके अपनी वास्तुशिल्प को स्थापित करने के साथ ही दुष्टों के दमन तथा देवताओं की सुरक्षा के लिए सुदर्शन चक्र, त्रिशूल, वज्र आदि की रचना करके देवताओं को अजेय शक्ति से संपन्न किया। कई तरह के कृषि उपकरणों का भी निर्माण उन्होंने ही किया।


कन्या संक्रांति के दिन पूजा

पहले वास्तुकार और इंजीनियर विश्वकर्मा जी थे। विश्वकर्मा जयंती हर साल कन्या संक्रांति के दिन 17 सितंबर को मनाई जाती है। इस साल भगवान विश्वकर्मा जयंती सोमवार के दिन मनाई जाएगी।

श्री जगतगुरु विश्वकर्मा मंदिर, रांची

88 साल पहले मौनी बाबा ने बनवाया था विश्वकर्मा मंदिर

विश्व का निर्माण करने वाले आराध्य देव भगवान विश्वकर्मा मंदिर की शुरुआत 1928 में एक संत मौनी बाबा (जो बोलते नहीं थे) ने मेन रोड के पास विश्वकर्मा लेन में की। यहां पर वे विश्वकर्मा भगवान का फोटो रखकर पूजा करते थे। दो वर्ष उपरांत 1930 में विश्वकर्मा समाज ने विश्वकर्मा मंदिर बनवाया और उनकी मूर्ति स्थापित की। इस मंदिर को बनवाने में अध्यक्ष स्व. बलदेव प्रसाद विश्वकर्मा तथा सदस्य स्व. बाबूलाल विश्वकर्मा का महत्वपूर्ण योगदान रहा। समय अंतराल में पूरे झारखंड-बिहार में इतना भव्य विश्वकर्मा मंदिर कहीं नहीं है। झारखंड का यह पहला विश्वकर्मा मंदिर माना जाता है।

मंदिर का कुल परिसर 7 कट्ठा है। मंदिर परिसर में दो अन्य मंदिर भी बनाए गए, जिसमें शिव मंदिर तथा बजरंगबली मंदिर शामिल हंै। शिव मंदिर की स्थापना 1960 में हुई। बजरंगबली का मंदिर 1975 में स्थापित किया गया। 2008 से मंदिर में पूजा-अर्चना का काम पंडित राजाराम शास्त्री करा रहे हैं। मंदिर के अलावा एक सभागार है जो सांस्कृतिक-सामाजिक कार्यक्रमों के लिए समाज के लोगों को कम खर्च में उपलब्ध कराया जाता है।

प्रत्येक वर्ष विश्वकर्मा मंदिर में 17 सितंबर को विश्वकर्मा पूजा भव्य रूप से मनाई जाती है। पूजा सुबह 10 बजे से 1 बजे तक की जाती है। मां तारा जागरण मंडली द्वारा 2 बजे से जागरण कार्यक्रम किया जाता है। भंडारा खाने 5 से 6 हजार श्रद्धालु यहां आते हैं। 1995 में कमेटी का नाम बदलकर ‘श्री जगतगुरु विश्वकर्मा मंदिर न्यास समिति’ रखा गया है। यही मंदिर का संचालन करती है।


नई गाड़ियों की पूजा जरूरी

आस-पास के जो भी लोग नई गाड़ियां खरीदते हैं, वे पूजा के लिए यहां जरूर आते हैं। विश्वकर्मा पूजा के दिन लोग नई-पुरानी गाड़ियों को लेकर भी यहां पूजा कराते हैं। नई दुकानों के लिए भी यहां संकल्प लेते हैं।