महाशिवरात्रि / टांगीनाथ धाम, भगवान शिव ने जिस त्रिशूल से शनि देव पर किया था प्रहार... वो यहां पर है

महाशिवरात्रि के दिन यहां झारखंड समेत छत्तीसगढ़, ओडिशा, बिहार, प. बंगाल से हजारों भक्त आते हैं। महाशिवरात्रि के दिन यहां झारखंड समेत छत्तीसगढ़, ओडिशा, बिहार, प. बंगाल से हजारों भक्त आते हैं।
श्रीराम ने सीता स्वयंवर में भगवान शिव का धनुष दिया था तब वहां गुस्से में ऋषि परशुराम पहुंचे थे। श्रीराम ने सीता स्वयंवर में भगवान शिव का धनुष दिया था तब वहां गुस्से में ऋषि परशुराम पहुंचे थे।
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महाशिवरात्रि के दिन यहां झारखंड समेत छत्तीसगढ़, ओडिशा, बिहार, प. बंगाल से हजारों भक्त आते हैं।महाशिवरात्रि के दिन यहां झारखंड समेत छत्तीसगढ़, ओडिशा, बिहार, प. बंगाल से हजारों भक्त आते हैं।
श्रीराम ने सीता स्वयंवर में भगवान शिव का धनुष दिया था तब वहां गुस्से में ऋषि परशुराम पहुंचे थे।श्रीराम ने सीता स्वयंवर में भगवान शिव का धनुष दिया था तब वहां गुस्से में ऋषि परशुराम पहुंचे थे।

  • टांगीनाथ धाम वही जगह है जहां परशुृराम ने फरसा रखकर भगवान शिव की तपस्या की थी

दैनिक भास्कर

Feb 21, 2020, 10:54 AM IST

गुमला. शहर से 75 किमी दूर जंगल में अवस्थित टांगीनाथ धाम। मान्यता है कि यहां भगवान शिव का त्रिशूल है। स्थानीय लोग उसे टांगी कहते हैं इसलिए टांगीनाथ धाम के नाम से जाना जाता है। महाशिवरात्रि के दिन यहां झारखंड समेत छत्तीसगढ़, ओडिशा, बिहार, प. बंगाल से हजारों भक्त आते हैं। चार दिनों तक मेला लगता है। सैकड़ों साधु-संत पहुंचते हैं।

भगवान शिव के त्रिशूल से संबंध 
पुराणों में एक कथा के अनुसार भगवान शिव किसी बात पर शनि देव पर क्रोधित हो गए थे। गुस्से में उन्होंने त्रिशूल से शनि देव पर प्रहार किया था। शनि देव को बचा लिया गया था, लेकिन शिवजी का त्रिशूल पहाड़ की चोटी पर धंस गया था। कहा जाता है कि गुमला के टांगीनाथ धाम में भगवान का वही त्रिशूल आज भी यथावत है। त्रिशूल कितना लंबा है, यह जानने के लिए 10 फीट तक खुदाई हुई, लेकिन पता नहीं लग पाया। 

परशुराम ने की थी घोर तपस्या
श्रीराम ने सीता स्वयंवर में भगवान शिव का धनुष दिया था तब वहां गुस्से में ऋषि परशुराम पहुंचे थे। उन्होंने राम को धनुष तोड़ने पर भला-बुरा कहा था। सबकुछ सुनकर राम मौन रहते हैं। जब परशुराम को पता चला कि राम भगवान विष्णु के अवतार हैं तो वे लज्जित महसूस करते हैं और पश्चाताप करने घने जंगलों में चले जाते हैं। टांगीनाथ धाम वही जगह है जहां परशुृराम ने फरसा रखकर भगवान शिव की तपस्या की थी।

खुदाई में मिली थी मूर्तियां-आभूषण
टांगीनाथ धाम में सैकड़ों की संख्या में प्राचीन शिवलिंग और दुर्लभ मूर्तियां हैं। पुरातत्वविद संतोष हेगड़े के अनुसार, यहां मिली प्रतिमाएं उत्कल के भुवनेश्वर, मुक्तेश्वर और गौरी केदार में मिली मूर्तियों से मेल खाती हैं। 1989 में पुरातत्व विभाग ने खुदाई की थी। इसमें सोने, चांदी के आभूषण सहित मूल्यवान मूर्तियां मिली थीं।


देवघर: बैद्यनाथधाम भगवान शंकर की दीवानी और बासुकीनाथ धाम उनकी फौजदारी अदालत है
बैद्यनाथ धाम का ज्योतिर्लिंगों में विशेष स्थान है। देवघर के रावणेश्वर महादेव के यहां की गई अपील पर तब तक सुनवाई नहीं होती है, जब तक बाबा बासुकीनाथ की अनुशंसा नहीं हो जाती। इस शिवरात्रि 2 कहानियों से जानते हैं कैसे बाबाधाम और बासुकीनाथ लिंग की स्थापना हुई।

बासुकी की कुदाल पड़ते ही दूध की धारा निकल पड़ी...
प्राचीन काल में बासुकीनाथ घने जंगलों से घिरा था। उन दिनों यह क्षेत्र दारूक-वन कहलाता था। पौराणिक कथा के अनुसार इसी दारूक-वन में द्वादश ज्योतिर्लिंग स्वरूप नागेश्वर ज्योतिर्लिंग का निवास था। शिव पुराण में वर्णित है कि दारूक-वन दारूक नाम के असुर के अधीन था। कहते हैं, इसी दारूक-वन के नाम पर संथाल परगना प्रमंडल के मुख्यालय दुमका का नाम पड़ा है। एक बार बासुकी नाम का एक व्यक्ति कंद की खोज में भूमि खोद रहा था। उसी दौरान बासुकी की कुदाल भूमि में दबे शिवलिंग से टकरा गई और वहां से दूध की धारा बहने लगी। बासुकी यह देखकर भयभीत हो गया और भागने लगा। उसी समय आकाशवाणी हुई, ‘भागो मत, यह मेरा निवास स्थान है। तुम पूजा करो।’ आकाशवाणी के बाद बासुकी वहां पूजा-अर्चना करने लगा और तभी से शिवलिंग की पूजा होने लगी जो आज भी जारी है। बासुकी के नाम पर ही इस स्थल का नाम बासुकीनाथ पड़ा।

लाठी बरसाने वाले भक्त के नाम पर बैजनाथधाम
जंगल में रहने वाला युवक बैजू ने प्रण किया कि वह भोजन करने के पूर्व प्रतिदिन शिवलिंग को लाठी से वार करेगा। एक दिन बैजू के पशु जंगल में भटक गए। दोपहर में थका-मांदा घर आकर कौर उठाया, सहसा प्रण की बात याद आई। जैसे ही लाठी से शिवलिंग पर प्रहार किया, दैवीय आकृति प्रकट हुई और बैजू से कहा, ‘भूख-प्यास भूल कर मुझ पर लाठी बरसाने वाले आज से तुम्हारे नाम पर मेरे मंदिर का नाम बैजनाथधाम कहलाएगा।

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