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जयंती पर नमन / धर्म आधारित बंटवारे के खिलाफ थे मौलाना आजाद



Maulana Azad was against religious partition
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Maulana Azad was against religious partition

  • भारत की आजादी में पहले शिक्षा मंत्री की भरपूर हिस्सेदारी थी
  • साझा संस्कृति और राष्ट्रीय एकता के प्रतीक के रूप में पहचान

Dainik Bhaskar

Nov 11, 2018, 05:12 AM IST

रांची. मौलाना आजाद की यौमे पैदाइश के मौके पर जब उनकी शख्सियत और कामों को याद किया जाता है तो इनकी बेपनाह जहानत (बेहद अक्लमंद), इल्मी सलाहियत (शिक्षा में महारत), बेखौफ सहाफत (निडर पत्रकारिता) और साफ सुथरी सियासत (राजनीति) का भी जिक्र आता है। भारत की आजादी में उनकी भरपूर हिस्सेदारी, भारत के पहले शिक्षा मंत्री के हैसियत से उनके कारनामों की चर्चा की जाती है।

 

साझा संस्कृति और राष्ट्रीय एकता के प्रतीक के रूप में भी उन्हें जाना जाता है। धर्म, राष्ट्र और संस्कृति एवं उनके आपसी संबंधों पर उन्होंने जो रोशनी डाली है, वह आज भी प्रासंगिक है। मौलाना आजाद राष्ट्र और राष्ट्रीयता को भौगोलिक क्षेत्र के बजाय धर्म से जोड़ने के सख्त खिलाफ थे। जब मुस्लिम लीग ने धर्म की बुनियाद पर मुल्क के बंटवारे की बात की और द्विराष्ट्रीय सिद्धांत दिया तो मौलाना आजाद ने इसका पुरजोर विरोध किया और मिसाके मदीना का हवाला भी दिया।

 

मिसाके मदीना (पैगंबर-ए- इस्लाम (सल.) द्वारा दूसरे धार्मिक समूहों एवं कबीलों के साथ की गई एक लिखित संधि) जिसमें कहा गया था कि मदीना पर अगर हमला होता है तो मदीना के तमाम जाति और धर्म के लोग बहैसियत एक कौम के उसका मुकाबला करेंगे। लेकिन कुछ लोगों ने मौलाना की इस दलील को भी नहीं माना। उन्होंने धर्म के नाम पर देश के टुकड़े कर दिए। इससे मौलाना आजाद दुखी थे। 

 

पहले ही पाकिस्तान के बिखरने की कर दी थी भविष्यवाणी : 1946 ई0 में शोरिस कश्मीरी को दिए एक इंटरव्यू में मौलाना आजाद ने जो पेशनगोई (भविष्यवाणी) की वह आज सही साबित हो रही है। उन्होंने कहा था कि मजहब पूर्वी और पश्चिमी पाकिस्तान को एक नहीं रख सकता है। क्योंकि मजहब के अलावा दोनों में कोई समानता नहीं है। उनका यह भी ख्याल था कि मजहब का इस्तेमाल लोगों को बांटने के लिए किया जाएगा तो इसकी कोई सीमा नहीं रह जाएगी।

 

इबरार अहमद, लेखक मौलाना अबुल कलाम आजाद द्वारा स्थापित संस्था अंजुमन इस्लामिया रांची के अध्यक्ष हैं

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