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नई जमीन, नए तेवर, नए आस्वाद की कहानियां हकीकत को दिखाती हैं

लेखक राकेश कु सिंह मूल्य 350 रुपए प्रकाशक शिल्पायन दिल्ली समीक्ष्य पुस्तक, और कुछ नहीं तो, तीन चार...

Danik Bhaskar | Sep 13, 2018, 04:10 AM IST

लेखक

राकेश कु सिंह

मूल्य

350 रुपए

प्रकाशक

शिल्पायन

दिल्ली

समीक्ष्य पुस्तक, और कुछ नहीं तो, तीन चार महीने से मेरे सामने थी। राकेश कुमार सिंह एक विशाल पाठक-वर्ग के साथ मेरे भी अत्यंत प्रिय लेखक हैं। मैं अलसा रहा था कि वही पलामू के दर्द-दर्प को उकेरती कहानियां होंगी, पढूंगा फुरसत से। और जब एक दिन एक-एक कर इन कहानियों को पढ़ता गया तो आनंदित होने के साथ चौंकता गया। मैं राकेश कुमार सिंह की प्रशस्ति में यह कहा करता था कि इनकी हर कहानी, इनका हर उपन्यास या तो पलामू की जमीन से जुड़ा है, या झारखंड के ही अन्य क्षेत्र से। इस कथन में प्रशंसा के साथ थोड़े संकोच का भाव भी झलकता है क्या? तो चौंका मैं इसलिए कि संकलन की 15 कहानियों में सिर्फ पहली में पलामू या झारखंड है, इनके किसी उपन्यास के अंश-सा, लेकिन उनके बाद सभी कहानियों के कथानक चौंकानेवाले हैं, देश के किसी भी सिद्ध कहानीकार की कहानियों से होड़ लेती। और दो कहानियां तो शुद्ध वैज्ञानिक फंतासी। ऐसी कहानियां कोई विज्ञानवेत्ता ही लिख सकता था। उसमें भी वह जो ‘नासा’ की गतिविधियों को सचेत निगाहों से देखता-पढ़ता रहा हो (ज्ञातव्य है कि राकेश जी रसायन विज्ञानी हैं) विज्ञान की जमीन वाली पहली कहानी है ‘रक्तबीज’, क्लोनिंग के अभिशाप की कल्पना पर आधारित। वैज्ञानिक फंतासी सी दूसरी कहानी है ‘ऑपरेशन हेली’। मंगल ग्रह की परिक्रमा के क्रम में हेली तारे टकराता है नील का यान। नील जीर्ण-शरीर होकर धरती पर वापस अाता तो है, लेकिन अपनी मंगेतर जेन का स्वाभाविक अलगाव झेलता है। नील मौत को गले लगाता है। वह अंतरिक्ष से विजयी होकर लौटा है, पृथ्वी पर हार जाता है। विज्ञान की पृष्ठभूमि में नाजुक प्रेम कथा। कहानी ‘कन्फेशन’ रांची-डाल्टनगंज रेल मार्ग पर चलनेवाली मालगाड़ियों का धुर शराबी ड्राइवर लोबो और मारिया के निश्छल स्नेह-संबंध की त्रासद कहानी है। बांधनेवाली, निहायत रोचक। चौथी कहानी है ‘ध्वंसावशेष’। कथाभूमि है बोधगया। और यहां कहानी के नैरेटर की मुलाकात एक दल्ले से होती है। वह बहला-फुसलाकर लाई गई लड़कियों का रखवाला सह दलाल नैरेटर का सहपारी है, अपने समय का अच्छा विद्यार्थी...। तीर्थभूमि में यह कथा एक कंट्रास्ट-सा रचती है और बेकारी को एक नए कोण से रेखांकित करती है।

‘अंधेरे में’ है तो कथित अवैध गर्भपात कराने को बाध्य दिव्या की कहानी, लेकिन इसका एक संवाद देखें- ‘पति-प|ी का रिश्ता भले सबसे अधिक बेपर्द हो, पर यह खून का रिश्ता तो नहीं होता न? रक्त संबंध तो मेरा ‘इस’ से है। कहानी न नैरेशन भिंगोता है मन को। ‘ग्लेशियर’ एक विवाहिता के कथित अवैध संबंध की कहानी है। अतृप्ता की भाषा देखें-‘इतनी जल्दी फिर दोबारा?...’

‘रहस्य की एक रात’ रहस्य-रोमांच की कहानी है। उस तूफानी रात को घोष दा को हुआ क्या था? अनुकंपा पर नौकरी की तलाश की घृण्य कथा, सत्यकथा जैसी। और ‘महासमर’ बरसाती रात में प्लेटफॉर्म पर रात गुजारते बंजारा परिवार की कहानी के बहाने कहता है कि सबसे जरूरी भूख से लड़ना है।

और अंत में ‘तमस कोहरा और...’। दिल्ली में कोहरे की समस्या आम है। यह कोहरा अनजाने में पुरुष के ‘कॉल ब्वॉय’ बनने, चूस कर सड़क में फेंक दिए जाने की कथा है। लेकिन वाह रे पुरुष! वह इस तमस में ही और ठौर की तलाश में है। दुहराता हूं, राकेश कुमार सिंह इस संकलन में पुष्ट नए तेवर और नए अंदाज में हैं। ये कहानियां देश की पत्रिकाओं में पहले ही प्रकाशित और प्रशंसित हो चुकी हैं। इनके एकत्र आनंद का क्या कहना।

डॉ. अशोक प्रियदर्शी