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आत्म शुद्धि और संयम का महापर्व है पर्युषण

जैन धर्म में पर्युषण पर्व का सर्वाधिक महत्व है। धर्म को 10 भागों में विस्तृत कर उसे आचरण में लाने की प्रेरणा देने के...

Dainik Bhaskar

Sep 11, 2018, 04:15 AM IST
Ranchi - आत्म शुद्धि और संयम का महापर्व है पर्युषण
जैन धर्म में पर्युषण पर्व का सर्वाधिक महत्व है। धर्म को 10 भागों में विस्तृत कर उसे आचरण में लाने की प्रेरणा देने के लिए पर्युषण पर्व मनाए जाने की परंपरा जैन समाज में विद्यमान है। पर्युषण पर्व जैन धर्मावलंबियों को आत्मशुद्धि एवं आत्मचिंतन का महत्वपूर्ण स्थान प्रदान करता है। भारत पर्वों का देश है जहां वर्ष में शायद ही कोई महीना रहता हो जिसमें किसी जाति या संप्रदाय का पर्व न पड़ता हो। इसमें से अधिकांश पर्व किसी व्यक्ति विशेष की स्मृति में या किसी घटना विशेष पर होते हैं। जैसे महावीर जयंती, स्वतंत्रता दिवस, रामनवमी, रक्षाबंधन, दिवाली आदि। इन पर्वों में आमोद-प्रमोद का वातावरण व्याप्त रहता है। इसके विपरीत संसार में शरीर एवं भोगों से विरक्ति का पर्व मात्र जैन समाज में ही मनाया जाता है वह है पर्युषण पर्व।

उत्तम क्षमा, उत्तम मार्दव, उत्तम आर्जव, उत्तम शौच, उत्तम सत्य, उत्तम संयम, उत्तम तय, उत्तम त्याग, उत्तम आकिंचन्य एवं उत्तम ब्रह्मचर्य। ये ही दस धर्म हैं। इन पर्वों को मनसा, वाचा, कर्मणा जीवन में पालन करना ही दस लक्षण धर्म है। ये पर्व प्रतिवर्ष भाद्रपद शुक्ल पंचमी से आरंभ होकर अनंत चतुर्दशी तक मनाए जाते हैं। दिगंबर एवं श्वेतांबर समाज दोनों में इस पर्व को मनाने की परंपरा है। विशेष यह है कि श्वेतांबर समाज भाद्रपद कृष्ण त्रयोदशी से भाद्रपद शुक्ल पंचमी तक सिर्फ 8 दिनों तक मनाते हैं, जबकि दिगंबर जैन समाज इसे 10 दिनों तक मनाते हैं।

इस वर्ष पर्युषण पर्व 14 सितंबर से 23 सितंबर तक धूमधाम से मनाया जाएगा। पर्युषण पर्व जैन संस्कृति का जगमगाता पर्व है, यह एक ऐसा पर्व है जिसमें साधक अपनी साधना में द्रुतगति से प्रगति करता हुआ। अंत स्थान चिंतन-मनन के मंथन एवं चित्र प्रवृत्तियों के गुंथन के दोषों का परिष्कार कर सद्गुणों को स्वीकार करने का संकल्प लेता है। यह महापर्व हमारे संयम पालन खानपान दर्शन स्तवन पूजा भजन चिंतन मनन करने के लिए आता है।

पर्युषण पर्व संयम योग साधना का पर्व है। ये योग नहीं त्याग का पर्व है। यह शक्ति नहीं शांति का पर्व है। संयम एवं त्याग के अंतर्गत व्रतों की इन पर्वों में विशेष मान्यता रहती है। कई श्रद्धालु तो दस दिन निराहार व्रत करते हैं, जिन्हें दस लक्षण व्रत कहा जाता है। पर्युषण पर्व हमारे जीवन के परिवर्तन के कारण बन सकते हैं। यह एक ऐसा पर्व है जो हमारी आत्मा की कालिमा को धोने का काम करता है। विकृति का विनाश और विशुद्ध का विकास इस पर्व का ध्येय है। पर्युषण पर्व व्यक्ति और समाज की आध्यात्मिक चेतना को जगाने वाला विलक्षण पर्व है। विशिष्ट तप, साधना, स्वाध्याय के द्वारा इन पर्वों की आराधना की जाती है। इसमें सरलता, कोमलता, सहिष्णुता आदि मानवीय मूल्यों का विकास का प्रय| किया जाता है।

पर्युषण पर्व की अवधि में देशभर के जैन मंदिरों को भव्य रूप से सजाया जाता है। सामूहिक पूजन, अभिषेक, सायंकाल आरती, प्रवचन एवं सांस्कृतिक कार्यक्रमों की झड़ी लगी रहती है।

सुरेश कुमार जैन काशलीवाल, रांची

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