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विद्या-बुद्धि और समस्त सिद्धियों के दाता श्रीगणेश

13 सितंबर से शुरू होगा, डेढ़, तीन, नौ दिनों तक मनेगा भारतीय वाङ्मय में भगवान गणेश का उल्लेख गणपति का प्रथम...

Danik Bhaskar | Sep 11, 2018, 04:15 AM IST
13 सितंबर से शुरू होगा, डेढ़, तीन, नौ दिनों तक मनेगा

भारतीय वाङ्मय में भगवान गणेश का उल्लेख

गणपति का प्रथम उल्लेख ऋग्वेद (2.23.1) में प्राप्त होता है। शुक्ल यजुर्वेद के अश्वमेधाध्याय में भी गणपति शब्द आया है। तैत्तिरीय आरण्यक भी में इनका नामोल्लेख हुआ है। आदिकवि वाल्मीकि उन्हें ज्ञानांद स्वरूप बतलाते हैं। गणपति शिव के पुत्र कहे गए हैं। तुलसीदास ने भी गणेश की वंदना की है। अन्य भाषाओं के ग्रंथों में भी गणेश का उल्लेख है।

सनातन वैदिक हिंदूधर्म के उपास्य देवताओं में भगवान् गणेश अग्रगण्य हैं। किसी भी धार्मिक या मांगलिक कार्य का आरंभ बिना उनकी पूजा के प्रारंभ नहीं होता। किसी भी देवता के पूजन और उत्सव-महोत्सव का प्रारंभ करते ही महागणपति का स्मरण और पूजन अनिवार्य है। यह परंपरा शास्त्रीय है। इतना महत्त्व अन्य किसी देवता को नहीं प्राप्त होता। गृह के प्रधान द्वार पर इनकी आकृति तैयार की जाती है। ब्रह्मवैवर्तपुराण में देवताओं द्वारा उनकी स्तुति एवं उपहार देने का प्रसंग है। भगवान् विष्णु ने उनकी स्तुति करते हुए कहा- हे सुरोत्तम! पहले मैंने तुम्हारी पूजा की है, अतः तुम सबके पूज्य एवं योगिराज होगे-

‘सर्वाग्रे तव पूजा च मया दत्ता सुरोत्तम।

सर्वपूज्यश्च योगीन्द्रो भव वत्सेत्युवाच तम्।।’

उपहार देने के क्रम में धर्म से सिंहासन, ब्रह्मा ने कमण्डलु, शंकर ने योगवस्त्र, इन्द्र ने र|सिंहासन, सूर्य ने मणियुक्त कुंडल, चन्द्र ने माणिक्यमाला, कुबेर ने किरीट, अग्नि ने विशुद्ध वस्त्र, वरुण ने र| का छत्र, वायु ने र|ों की अंगूठी, लक्ष्मी ने क्षीरसागर से उत्पन्न र|ों का कड़ा, सावित्री ने कंठा तथा भारती ने उज्ज्वल हार प्रदान किया।

गणपति का स्वरूप : एकदंत और चतुर्बाहु रूप मनोहर व मंगलदायक है

भगवान् गणपति का स्वरूप अत्यंत मनोहर और मंगलदायक है। वे एकदंत और चतुर्बाहु हैं। वे अपने चारों हाथों में पाश, अंकुश, दंत और वरमुद्रा धारण करते हैं। उनके ध्वज में मूषक का चिह्न है। वे रक्तवर्ण, लंबोदर, शूर्पकर्ण तथा रक्तवस्त्रधारी हैं। रक्तचंदन के द्वारा उनके अंग अनुलिप्त रहते हैं। वे रक्तवर्ण के पुष्पों द्वारा सुपूजित होते हैं। अपने स्वजनों, उपासकों पर कृपा करने के लिए वे साकार हो जाते हैं। भक्तों की कामना पूरी करने वाले, ज्योतिर्मय, जगत् के कारण, अच्युत तथा प्रकृति और पुरुष से परे हैं। वे पुरुषोत्तम सृष्टि के आदि में उत्पन्न हुए। उनके वक्षस्थल पर नागयज्ञोपवीत शोभित रहता है। उनके कंठ में र| और मणिजटित मालाएं तथा पुष्पों की मालाएं शोभित रहती हैं। श्रीगणेशजी का मस्तक सिंदूर से अरुण तथा मुकुट से विभूषित रहता है। एकदंत गणपति प्रकृति-पुरुष की एकता के प्रतीक हैं।

‘उपासकानां कार्यार्थं ब्रह्मणो रूपकल्पना’ अर्थात् उपासना करने वालों को अभीष्ट सिद्धि प्रदान करने के लिए परब्रह्म के बहुविध रूपों की परिकल्पना होती है। तदनुसार आगमशास्त्रों में श्रीमन्नारायण पंचतत्त्वों के अधिष्ठाता के रूप में पंचविध वर्णित हुए हैं-

‘आकाशस्याधिपो विष्णुरग्नेश्चैव महेश्वरी।

वायोः सूर्यः क्षितेरीशो जीवनस्य गणाधिपः।।’



अर्थात् आकाश तत्त्व के अधिष्ठाता विष्णु, अग्नितत्त्व की अधिष्ठात्री देवी दुर्गा, वायुतत्त्व के अधिष्ठाता देव सूर्य, पृथिवीतत्त्व के शिव तथा जलतत्त्व के अधिष्ठाता गणेश हैं।

प्रथम पूजनीय

चित्रांकन : पंकज प्रजापति

वस्तुतः परिगणित पंचदेवों में भगवान् गणेश का असाधारण महत्त्व है। गणेश शब्द का अर्थ है- गणों का स्वामी। हमारे शरीर में पांच ज्ञानेंद्रियां, पांच कर्मेंद्रियां और चार अंतःकरण हैं, इनके पीछे जो शक्तियां हैं, उन्हीं को 14 देवता कहते हैं। इन देवताओं के मूल प्रेरक हैं भगवान् श्रीगणेश। वस्तुतः भगवान् गणपति शब्दब्रह्म अर्थात् ओंकार के प्रतीक हैंष श्रीगणपत्यथर्वशीर्ष में कहा गया है कि ओंकार का ही व्यक्त स्वरूप गणपति देवता है।

महत्त्व

गणेश चतुर्थी : व्रत से धन-धान्य और आरोग्य की प्राप्ति होती है

भाद्रपद शुक्लपक्ष की चतुर्थी को गणेश चतुर्थी की पूजा का विधान है। इस व्रतोपवास में तिथि मध्याह्नव्यापिनी लेनी चाहिए। तृतीया और चतुर्थी दोनों दिन मध्याह्न में चतुर्थी हो या दोनों दिन ही मध्याह्न में चतुर्थी न हो, तो तृतीया को करनी चाहिए, तृतीया के दिन किंचित भी मध्याह्न का स्पर्श न हो अथवा तृतीया के दिन मध्याह्न में थोड़ी हो और चतुर्थी के दिन पूरे मध्याह्न में हो तभी चतुर्थी को करना चाहिए। इस दिन रविवार अथवा मंगलवार हो, तो प्रशस्त है। इस दिन नक्तव्रत का विधान है, अतः भोजन सायंकाल करना चाहिए। ऐसी मान्यता है कि भाद्रपद शुक्लपक्ष में सिद्धिविनायक का व्रत वर्षा ऋतु की फसल के परिपाक को दृष्टि में रखकर ही रखा गया है। गणेश चतुर्थी के व्रत अशेष भारत में मान्य हैं। भविष्यपुराण में कहा गया है कि उमा और महेश के पुत्र जिसके अनुकूल हों उसके समस्त कार्यों में सारा संसार सहायक होता है। भाद्रपद शुक्लपक्ष की चतुर्थी को शिवा चतुर्थी के नाम से भी जाना जाता है। इसमें किया गया स्नान, दान, उपवास तथा जप भगवान् गणेश की कृपा से सौ गुना अधिक फलदायी होता है। इस व्रत के प्रभाव से धन-धान्य और आरोग्यं की प्राप्ति होती है, समस्त आपदाएं नष्ट हो जाती हैं तथा भगवान् गणेश की कृपा से परमार्थ की भी सिद्धि होती है।

वस्तुतः देवों में प्रथम पूज्य एवं महिमाश‌ाली भगवान् गणेश को अन्तर्हृदय की विशुद्ध प्रीति अभीष्ट है। श्रद्धा और भक्तिपूर्वक त्रयतापनिवारक दयानिधान मोदकप्रिय सर्वेश्वर गजमुख कपित्थ, जम्बू और वन्यफलों से ही नहीं, दूर्वा के दो दलों से भी प्रसन्न हो जाते हैं और मुदित होकर समस्त कामनाओं की पूर्ति तो करते ही हैं, जन्म-जरा-मृत्यु का सुदृढ पाश नष्ट कर अपना दुर्लभतम परमानन्दपूरित दिव्यधाम भी प्रदान करते हैं।

भगवान गणेश के 12 नाम : स्मरण करने वाला विद्यार्थी विद्या को सहज प्राप्त कर लेता है

वक्रतुण्ड, एकदंत, कृष्णपिङ्गाक्ष, गजवक्त्र, लम्बोदर, विकट, विघ्नराज, धूम्रवर्ण, भालचन्द्र, विनायक, गणपति और गजानन का नाम स्मरण करने वाला विद्यार्थी विद्या को सहज ही प्राप्त कर लेता है। ब्रह्मवैवर्तपुराण में कहा गया है कि को व्यक्ति नियम और निष्ठा से ‘ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं गणेशाय ब्रह्मरूपाय चारवे सर्वसिद्धिप्रदेशाय विघ्नेशाय नमो नमः’ का पांच लाख बार जप करने है उसकी समस्त कामनाएं पूर्ण हो जाती हैं।

विघ्ननाशक गणेश : श्रीगणेशजी विघ्नों का नाश करने वाले हैं। प्रधानरूप से उनके 10 आयुध हैं- वज्र, शक्ति, खड्ग, पाश, अंकुश, गदा, त्रिशूल, पद्म और चक्र। ‘विद्यारम्भे विवाहे च प्रवेशे निर्गमे तथा। संग्रामे संकटे चैव विघ्नस्तस्य न जायते।।’

अर्थात् जो व्यक्ति विद्यार्जन के आरंभ में, विवाहकाल में, नूतन गृहप्रवेश में, कार्यसिद्धि के लिए श्रीगणेश का स्मरण करता है उसके समक्ष विघ्न उपस्थित नहीं होते।

विद्या प्राप्ति के लिए सरस्वती के साथ पूजन

मोदकप्रिय भगवान् गणेश विद्या-बुद्धि और समस्त सिद्धियों के दाता कहे जाते हैं। वे साक्षात प्रणवरूप हैं। उनके विग्रह का ध्यान, उनके मंगलमय नाम का जप और उनकी आराधना मेधाशक्ति को तीव्र करती है। संस्कृत स्त्रोत साहित्य में अनेक स्थलों पर उनको विद्या वारिधि तथा बुद्धिविधाता कहा गया है। अतः उनकी आराधना विद्या और बुद्धि को प्रदान करने वाली है। विद्याप्राप्ति के लिए इनकी पूजा विद्या की अधिष्ठात्री देवी सरस्वती के साथ की जाती है। गोस्वामी तुलसीदास ने कहा है-

‘वर्णानामर्थसंघानां रसानां छन्दसामपि। मङ्गलानां च कर्तारौ वन्दे वाणी विनायकौ।।’

अक्षरों, अर्थसमूहों, रसों, छंदों और मंगलों की करने वाली सरस्वतीजी और गणेशजी की मैं वंदना करता हूं।

डॉ. धनंजय वासुदेव द्विवेदी, संस्कृत विभाग, डीएसपीएमयू, रांची