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राष्ट्रीय एकता के प्रमुख कारकों में हिंदी

कामेश्वर श्रीवास्तव ‘निरंकुश’, अध्यक्ष, हिंदी साहित्य संस्कृति मंच, रांची भारत जैसे विशाल राष्ट्र में सामाजिक...

Danik Bhaskar | Sep 13, 2018, 04:10 AM IST
कामेश्वर श्रीवास्तव ‘निरंकुश’, अध्यक्ष, हिंदी साहित्य संस्कृति मंच, रांची

भारत जैसे विशाल राष्ट्र में सामाजिक जीवन में उन तत्वों की आवश्यकता अधिक प्रबल हो जाती है, जिन तत्वों के कारण देश के विभिन्न हिस्सों में रहनेवाले लोग भावनात्मक तौर पर एक-दूसरे को परस्पर संबद्ध महसूस करें। एक भाषा के तौर पर हिंदी इस देश में यही भूमिका निभा रही है। लेकिन हाल ही में यह देखने मे आया है कि किस तरह हिंदी के संवर्धन के लिए जिम्मेदार लोगों का लापरवाही भरा रवैया सबसे वैज्ञानिक कही जाने वाली भाषा के सम्मान के साथ खिलवाड़ कर रहा है।

आंकड़ों के अनुसार हिंदी दुनिया मे सर्वाधिक बोली जाने वाली भाषाओं में दूसरे स्थान पर है। हिंदी के प्रति विदेशियों में आकर्षण या आसक्ति भाव नया नहीं है। हमारे संविधान निर्माताओं ने हिंदी को राजभाषा का दर्जा तो दिया लेकिन अभिजात्य कहे जाने वाले वर्ग में अंग्रेजी के प्रति प्रेम उसकी ठसक का सार्थवाह बना रहा। इसी पर साहित्य अकादमी पुरस्कार प्राप्त अतुल कनक का कहना है कि ‘हिंदी दुनिया की सबसे शक्तिशाली भाषाओं में से एक होने के बावजूद न तो रोजगार की भाषा हो सकी और न ही समाज मे संभ्रांतों की। इसीलिए भावनात्मक तौर पर युवा हिंदी की शुचिता के प्रति लापरवाह होता जा रहा है।’

हो सकता है अभिजात्य वर्ग अपनी ठसक के लिए अंग्रेजी का आश्रय ले ले, लेकिन हिंदी के महत्व को अनदेखा कर पाना शायद ही किसी की सामर्थ्य में होगा। हिंदी न केवल हमारी सांस्कृतिक समृद्धि की वाहक है बल्कि राष्ट्रीय एकता के प्रमुख कारकों में भी एक है।