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एक ओर सरकार बड़े-बड

सुरक्षित वन क्षेत्र से हटने के बाद मल्हार जाति के दस परिवारों की खुले में रहने की मजबूरी, सरकार के दावों के विपरीत...

Danik Bhaskar | Mar 01, 2018, 04:00 AM IST
सुरक्षित वन क्षेत्र से हटने के बाद मल्हार जाति के दस परिवारों की खुले में रहने की मजबूरी, सरकार के दावों के विपरीत नहीं मिल रहा है इन्हें रहने का ठिकाना


एक ओर सरकार बड़े-बड़े बैनर-पोस्टर लगाकर कह रही है कि अब न रहेगा कोई भूमिहीन और बेघर, हो रहे है सपने साकार ये है रघुवर सरकार। लेकिन इस दावों की पोल टुंडी में खुलती नजर आती है। जहां टुंडी प्रखंड के लुकैया पंचायत के दो मुंडा के डोबा पहाड़ में रह रहे मल्हार जाति के दस परिवारों को वन विभाग द्वारा सुरक्षित वन क्षेत्र से हटा दिए जाने के बाद सिर से छत हट गया है। फिलहाल सभी परिवार दुर्गारायडीह में खानाबदोश की जिंदगी गुजारने को विवश है। इनकी सुध लेने वाला कोई नहीं है।

पीडित परिवार मल्हार परिवार।

क्या है मामला : मल्हार समुदाय के विनोद मल्हार प|ी सुषमा देवी एवं चार बच्चे, इन्द्र मल्हार प|ी निमकी देवी एवं छ बच्चे नंदू मल्हार प|ी सुनीता देवी एवं दो बच्चे धोधो मल्हार कुंदनी देवी राजू मल्हार प|ी कुंती देवी अनिता मल्हारिन मुनि मल्हारिन, दिनेश मल्हार प|ी बुधनी देवी एवं तीन बच्चे आदि लंबे समय से सभी दो मुंडा पहाड़ के इलाके में रह रहे थे अब वे वहां धर बना रहे थे। इलाके के वन समितियों द्वारा इसकी सूचना वन विभाग को दिए जाने पर वन विभाग द्वारा वहां से हटा दिया गया। तब मौका भांपकर शरारती तत्वों ने घर, झोपड़ी भी तोड़ डाला।

शिकायत की वजह अंधविश्वास

टुंडी इलाका जनजातीय इलाका होने की वजह से आज भी यहां अशिक्षा एवं डायन भूत-प्रेत के भय से हमेशा समाए रहता है। यहां के किसी परिवार के ग्रामीण बीमार पड़ने पर ओझा-गुनी का ही सहारा लेते हैं एवं झाड़-फूंक के साथ तेल पात घिसते हैं। इसको लेकर कई परिवार बर्बाद भी हो गए एवं जेल की सजा काट रहे हैं। कहते हैं की कुछ दिनों से निकट के जनजातीय परिवार के लोग बीमार पड़ रहे थे। यहां के वाशिंदे का कहना है की यही मल्हार लोग पानी एवं अन्य बात को लेकर आते हैं एवं हमारे यहां जादू टोना कर जाते हैं? इन्हीं सब वजह से वन विभाग को की गई शिकायत।

कौन है मल्हार : ये मूलतः झारखंड के निवासी हैं। ये जाति में पिछड़ी समुदाय में आते हैं। सच पूछा जाए तो ये मूलतः: आदिम जनजाति की तरह रहन सहन है। ये समुदाय के लोग प्राचीन जमाने राजा-रजवाड़े के काल से गांव-देहातों में पइला, पाय, पोआ, आधा पौआ, छटाक मापक वस्तु बनाकर गांव देहातों में बेचकर गुजर बसर करते हैं। ये हमेशा बंजारों की भांति घूमने एवं इनकी आबादी कम रहने के साथ राजनीतिक पकड़ नहीं रहने की वजह से इन्हें कभी भी इन्हें अपना पहचान नहीं मिल पाई।