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टुंडी में मजदूरों को नहीं मिल रहा है रोजगार, लगातार पलायन जारी

उमेश माहथा

Dainik Bhaskar

Feb 01, 2018, 02:30 PM IST
टुंडी में मजदूरों को नहीं मिल रहा है रोजगार, लगातार पलायन जारी
उमेश माहथा
इन दिनों पूर्वी टुंडी एवं टुंडी प्रखंड इलाके से काम के अभाव में बड़ी संख्या में ग्रामीणों का अंधाधुंध पलायन जारी है। इलाके में स्थिति इतनी भयावह हो रही है की एक तरफ जहां युवाओं का पलायन अन्य प्रदेशों में हो रहा है, तो बाल-बच्चे वाले ग्रामीण मजदूर काम के अभाव में दर-दर भटक रहे हैं।

पूर्वी टुंडी के चुड़रिया, उकमा, मोहलीडीह, रामपुर, लटानी, मैरानवांटांड, रघुनाथपुर, रुपण पंडुआ, बेजरा तथा टुंडी प्रखंड के बरवाटांड, कमारडीह, लछुरायडीह, लुकैया, कदैया, कटनियां, बेगनरिया, राजाभीट्ठा, पूर्णाडीह, जीतपुर, मनियाडीह, जांताखूंटी, फतेहपुर, कोल्हर, रतनपुर, टुंडी पंचायत की आबादी दो लाख से अधिक है। यहां की कुल आबादी का लगभग आधे लोगों की रोजी-रोटी के लिए साल भर में एक मात्र कमाई का जरिया यूं तो धान की खेती है। पर यहां खेती के लिए पानी के अभाव के कारण हमेशा भगवान पर निर्भर रहना पड़ता है। उसके बाद का समय में गरीब ग्रामीण एक मात्र कमाई का जरिया मजदूरी पर निर्भर करता है।

पूर्वी टुंडी एवं टुंडी प्रखंड में वर्तमान समय में अरबों की लागत से कई सड़कों का काम चल रहा है किंतु सड़क निर्माण कार्य का 95% हिस्सा मशीन द्वारा किया जा रहा है। शेष हिस्से का काम बाहरी मजदूरों से कराया जा रहा है जिसका जीता जागता उदाहरण है टुंडी-गिरिडीह सड़क निर्माण कार्य हो या टुंडी बरवाअड्डा पथ निर्माण? इसी तरह टुंडी में अरबों की लागत से पेयजलापूर्ति योजना का काम भी मशीन एवं बाहरी मजदूरों द्वारा कराया जा रहा हैं। जिससे मुख्य रूप से पश्चिम बंगाल एवं बंगलादेशी मजदूर शामिल हैं। कई योजनाओं के संविदाकर्ता के लोगों द्वारा यह कह के डांट दिया जाता है की तुमलोगों से काम नहीं होगा, भागों यहां से। ऐसे में विरोध जताने वाले मजदूरों को माओवादियों के नाम से फंसा देने का हथकंडा अपनाते हैं। ऐसे में स्थानीय भोले-भाले मजदूर कानूनी दांव-पेंच के सामने बेबस साबित होते हैं।

पूर्वी टुंडी एवं टुंडी प्रखंड में मनरेगा भी राशि के अभाव एवं कई जटिल प्रक्रियाओं की वजह से योजनाएं दम तोड़ रही हैं। प्रखंड में प्रधानमंत्री आवास निर्माण एवं शौचालय निर्माण कार्य चल रहा है जो की मजदूर के रूप में लाभुकों को ही काम करना है। ऐसे में अन्य मजदूरों को कैसे काम मिले इसको लेकर भी कई सवाल खड़े हो रहे हैं?

मजदूरों का कहना है की वन विभाग से भी पहले काम पूरा मिलता था जैसे पौधरोपण, खुदाई एवं ट्रेंच खुदाई वगैरह काम वह भी अब मशीन के माध्यम से कराया जा रहा है। ऐसे में स्थानीय युवा शिक्षित बेरोजगार मजदूर अन्य प्रदेशों में से मुंबई, राजस्थान, सूरत, बंगलौर, उड़ीसा, छत्तीसगढ़, गुजरात, महाराष्ट्र, दिल्ली आदि क्षेत्रों में पलायन कर रहें हैं। बाल-बच्चेदार मजदूरों की हालत बेहद ही खराब है। वे न बाहर जा पाते हैं ना ही यहां उन्हें काम मिल पा रहा है। जिस कारण वे दर-दर भटकने को मजबूर हैं ऐसे में चुनावी माहौल में केंद्र एवं राज्य सरकार सबका साथ सबका विकास की बातें अब ग्रामीण मजदूरों को महज एक कोरा कागज साबित हो रहा है।

रोजगार के लिए पलायन करते टुंडी के युवकों की टोली।

मजदूरों की शिकायत नहीं आई


पूंजिपतियों की सरकार है, गरीब हंै लाचार


उमेश माहथा
इन दिनों पूर्वी टुंडी एवं टुंडी प्रखंड इलाके से काम के अभाव में बड़ी संख्या में ग्रामीणों का अंधाधुंध पलायन जारी है। इलाके में स्थिति इतनी भयावह हो रही है की एक तरफ जहां युवाओं का पलायन अन्य प्रदेशों में हो रहा है, तो बाल-बच्चे वाले ग्रामीण मजदूर काम के अभाव में दर-दर भटक रहे हैं।

पूर्वी टुंडी के चुड़रिया, उकमा, मोहलीडीह, रामपुर, लटानी, मैरानवांटांड, रघुनाथपुर, रुपण पंडुआ, बेजरा तथा टुंडी प्रखंड के बरवाटांड, कमारडीह, लछुरायडीह, लुकैया, कदैया, कटनियां, बेगनरिया, राजाभीट्ठा, पूर्णाडीह, जीतपुर, मनियाडीह, जांताखूंटी, फतेहपुर, कोल्हर, रतनपुर, टुंडी पंचायत की आबादी दो लाख से अधिक है। यहां की कुल आबादी का लगभग आधे लोगों की रोजी-रोटी के लिए साल भर में एक मात्र कमाई का जरिया यूं तो धान की खेती है। पर यहां खेती के लिए पानी के अभाव के कारण हमेशा भगवान पर निर्भर रहना पड़ता है। उसके बाद का समय में गरीब ग्रामीण एक मात्र कमाई का जरिया मजदूरी पर निर्भर करता है।

पूर्वी टुंडी एवं टुंडी प्रखंड में वर्तमान समय में अरबों की लागत से कई सड़कों का काम चल रहा है किंतु सड़क निर्माण कार्य का 95% हिस्सा मशीन द्वारा किया जा रहा है। शेष हिस्से का काम बाहरी मजदूरों से कराया जा रहा है जिसका जीता जागता उदाहरण है टुंडी-गिरिडीह सड़क निर्माण कार्य हो या टुंडी बरवाअड्डा पथ निर्माण? इसी तरह टुंडी में अरबों की लागत से पेयजलापूर्ति योजना का काम भी मशीन एवं बाहरी मजदूरों द्वारा कराया जा रहा हैं। जिससे मुख्य रूप से पश्चिम बंगाल एवं बंगलादेशी मजदूर शामिल हैं। कई योजनाओं के संविदाकर्ता के लोगों द्वारा यह कह के डांट दिया जाता है की तुमलोगों से काम नहीं होगा, भागों यहां से। ऐसे में विरोध जताने वाले मजदूरों को माओवादियों के नाम से फंसा देने का हथकंडा अपनाते हैं। ऐसे में स्थानीय भोले-भाले मजदूर कानूनी दांव-पेंच के सामने बेबस साबित होते हैं।

पूर्वी टुंडी एवं टुंडी प्रखंड में मनरेगा भी राशि के अभाव एवं कई जटिल प्रक्रियाओं की वजह से योजनाएं दम तोड़ रही हैं। प्रखंड में प्रधानमंत्री आवास निर्माण एवं शौचालय निर्माण कार्य चल रहा है जो की मजदूर के रूप में लाभुकों को ही काम करना है। ऐसे में अन्य मजदूरों को कैसे काम मिले इसको लेकर भी कई सवाल खड़े हो रहे हैं?

मजदूरों का कहना है की वन विभाग से भी पहले काम पूरा मिलता था जैसे पौधरोपण, खुदाई एवं ट्रेंच खुदाई वगैरह काम वह भी अब मशीन के माध्यम से कराया जा रहा है। ऐसे में स्थानीय युवा शिक्षित बेरोजगार मजदूर अन्य प्रदेशों में से मुंबई, राजस्थान, सूरत, बंगलौर, उड़ीसा, छत्तीसगढ़, गुजरात, महाराष्ट्र, दिल्ली आदि क्षेत्रों में पलायन कर रहें हैं। बाल-बच्चेदार मजदूरों की हालत बेहद ही खराब है। वे न बाहर जा पाते हैं ना ही यहां उन्हें काम मिल पा रहा है। जिस कारण वे दर-दर भटकने को मजबूर हैं ऐसे में चुनावी माहौल में केंद्र एवं राज्य सरकार सबका साथ सबका विकास की बातें अब ग्रामीण मजदूरों को महज एक कोरा कागज साबित हो रहा है।

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