कटाक्ष / बजट समझाने सरकार खर्च करेगी करोड़ों



humour on government budget 2019 india
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humour on government budget 2019 india

डर लगता है कि कोई पत्रकार या जिज्ञासु पड़ोसी यह न पूछ ले कि बजट कैसा लगा?

Dainik Bhaskar

Jul 06, 2019, 05:49 PM IST

देवाशीष. ज्यों ही आम बजट आने की बात हुई त्यों ही आम आदमी में घबराहट बढ़नी शुरू हो गई। बजट आम आदमी के लिए चुनौतियां लेकर आता है, बजट समझने की चुनौतियां। उसे डर लगता है कि कोई माइकधारी पत्रकार या जिज्ञासु पड़ोसी उससे 'बजट कैसा लगा?' न पूछ ले। हर साल बजट के बाद फटके खाकर आम आदमी बजट मेंटेन करना सीख चुका है, लेकिन वो ये नहीं सीख सका कि नासमझ दिखना कैसे मेंटेन करें?

 

लेकिन कमाल देखिए कि आम आदमी हर बार जान लेता है कि बजट अच्छा है या बुरा। दरअसल बजट पेश होने के 24 घंटे के भीतर अगर उसे ये समझ आ जाए कि चायपत्ती, ब्लेड, घड़ियां और जूते-चप्पल सस्ते हुए हैं तो बजट अच्छा मान लिया जाता है। वहीं अगर कान में ये बात पड़ जाए कि लाइटर, मोमबत्ती, काजू, सोया प्रोटीन और डियोड्रेंट महंगे हुए हैं तो आम आदमी मान लेता है, इस बार बजट खराब निकल गया है। बजट में जब हर कोई मेहनत कर रहा हो, उस समय सबसे आसान काम विपक्ष का हो जाता है। उसे रटी-रटाई दो बातें कहनी होती हैं। अव्वल तो माइक देखते ही बजट को निराशाजनक बताना होता है, अब बात में वजन डालने के लिए उसे उद्देश्यहीन बता देना होता है। ये फ़ॉर्मूला कई बार काम कर जाता है।

 

आम आदमी भी सोचता है, 'हां भाई, उद्देश्य तो हमें भी समझ न आया।' फिर कहना होता है, बजट में सिर्फ बड़ी-बड़ी बातें की गई हैं। मामले को थोड़ा और संगीन बनाना है तो ये भी कहा जा सकता है कि बजट में सिर्फ जुमलेबाजी है। विपक्ष अगर बहुत हमलावर है, यदि बजट को सिरे से ही नकार डालना है तो विपक्ष को कहना होता है कि सरकार ने बजट में युवाओं, किसानों का ध्यान नहीं रखा। छोटे और मझौले उद्यमों को कोई राहत नहीं दी। यकीन मानिए कि इन वर्गों के लोग अपनी परेशानियों से इतने भरे बैठे हैं कि खुद के लिए कही गई इस एक लाइन से ही इमोशनल हो पड़ेंगे। और अगर कि बजट की बहुत तारीफ़ हो रही हो तो विपक्ष को बस दूसरी बात कह देनी होती है कि ये बजट हमारी नीतियों की नक़ल है।

 

हर साल आम आदमी में कन्फ्यूजन को देख सरकार बजट में विशेष प्रावधान लाई है। जनता को बजट समझाने के लिए सरकार 100 करोड़ खर्च करने जा रही है। ये खर्च छुपा हुआ होगा और समझाइश भी, ताकि किसी को भी हेय महसूस न हो। सूत्र बताते हैं कि समझाने का दौर तब तक जारी रहेगा जब तक चौराहे पर आदमी फिस्कल डेफिसिट, फिस्कल पॉलिसी और योजनागत व्यय जैसी टर्म्स पर बात न करने लग जाए। 

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