कटाक्ष / नेटफ्लिक्स का याद रखूं, तो प्राइम का भूल जाता हूं

netflix and amazon prime password confusion
X
netflix and amazon prime password confusion

  • युवाओं की नई विडंबना है, 'ये दो दुश्मन हैं ऐसे, दोनों राज़ी हों कैसे?'

दैनिक भास्कर

Sep 28, 2019, 06:51 PM IST

देवाशीष. मनुष्य के जीवन में बड़ी चुनौतियां हैं। उन चुनौतियों में एक ये जुड़ गई कि उसे तमाम स्ट्रीमिंग वेबसाइट्स और ऐप्स के पासवर्ड याद रखने होते हैं। आनंद बक्षी इस विडंबना को देखते तो लिखते - 'ये दो दुश्मन हैं ऐसे, दोनों राज़ी हों कैसे, नेटफ्लिक्स का याद रखूं, तो प्राइम का भूल जाता है।'

 

इस विडंबना के पार भी कई चुनौतियां हैं। युवावर्ग भटका हुआ है। समझ नहीं पाता, किस ऐप पर कौन सी सीरीज चुने और कौन सी सीरीज छोड़े? जीवन बहुत छोटा है और सीरीजें बहुत ज़्यादा। समय का पता ही नहीं चलता। युवावर्ग नेताओं से जलन रखता है। उन नेताओं के बारे में सुनता है, जो दिन में 18 घंटे काम करते हैं। युवा खुद को उलाहना देता है, "इतना ही मैं जाग पाता तो मुखौटे में डकैती वाली सीरीज का दूसरा सीजन एक दिन में खत्म कर सकता था।alt39 रहा होगा कोई समय जब अख़बारों में 'सिरिंज में नशा तलाश रहा युवावर्ग' जैसी ख़बरें छपा करती थीं। समय बदला और सिरिंज की जगह इन वेब सीरीज ने ले ली।

 

हर नशे के दुष्प्रभाव होते हैं, जो मानव शरीर पर बुरे असर डालते हैं। सीरीजों से जुड़ा दुष्प्रभाव हैं स्पॉइलर। टीवी पर चलने वाले सीरियल्स में स्पॉइलर का खतरा नहीं होता, उन्हें लिखने वाले कार्यक्रम को खुद ही स्पॉइल कर चुके होते हैं। वेब सीरीज से स्पॉइलर का ख़तरा जुड़ा होता है। जो दोस्त पहले ही सीरीज निबटा चुका है, वो स्पॉइलर-मैन बन जाता है। वो कहानी बताने लग जाता है। युवाओं के धर्मग्रंथों में इस पाप की सजा लिखी जा रही है। स्पॉइलर देने वाले दोस्त को मृत्योपरांत नर्क में नहीं खटना पड़ेगा। उसे बिना वाई-फाई और नेट कनेक्शन के जीना पड़ेगा। फेवरेट सीरीज के आते ही उसका सब्सक्रिप्शन ख़त्म हो जाएगा। विदेशी सीरीज देखते हुए उसके सबटाइटल्स साथ छोड़ देंगे। इससे भयंकर शाप क्या होगा।

 

यह बात समझ नहीं आती कि राजनीतिक दल युवाओं की इस पसंद का फायदा क्यों नहीं उठा रहे? इन्हें फेवरेट सीरीज का अगला सीजन एक साल की बजाय छह महीने में दिलाने का वादा कर वोट बटोरे जा सकते हैं। सत्ता में बैठी पार्टी स्ट्रीमिंग वेबसाइट्स के सब्सक्रिप्शन के दाम घटाकर वोट लूट सकती है। अपोजिशन पार्टियां ये वादा कर सकती हैं कि सत्ता में आने पर वो स्पॉइलर फ्री सीरीज दिखाने की व्यवस्था करेगी। कोई जुमला पसंद पार्टी हर सीरीज पर पैसे देने की बात भी कह सकती है। अगर ये आइडिया रास न आए और ध्रुवीकरण वाली राजनीति पर लौटना हो तो पार्टियां युवाओं को इस बात पर भी लड़वा सकती हैं कि जाति-धर्म की तरह ही कौन-सी सीरीज बेस्ट है।

आज का राशिफल

पाएं अपना तीनों तरह का राशिफल, रोजाना