हैप्पीक्रेसी / प्यार से शुरू, प्याज पर अटकी...

Starting with love, stuck on onions ...
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Starting with love, stuck on onions ...

  • मुंह से आ रही प्याज की गंध अब बदबू की तरह परेशान नहीं करती, बल्कि एक स्टेटस सिंबल की तरह मन को गौरव प्रदान करने लगी है।

Dainik Bhaskar

Dec 07, 2019, 03:44 PM IST

अतुल कनक. जवानी में किसी के प्यार का जादू सिर चढ़कर बोल रहा था और अब प्याज की कीमतें सिर चढ़ गई प्रतीत होती हैं। हालत यह है कि जब रेडियो पर 'इक प्यार का नग़मा है मौजों की रवानी है' गाना बजता है तो कान उसे 'इक प्याज का नग़मा है, कीमत की कहानी है' सुनने में आता है। प्यार के ढाई आखर पर प्याज के ढाई आखर हावी होने लगे हैं। हालत यह है कि प्यार से शुरू हुई गृहस्थी प्याज पर आकर ठिठक गई है। श्रीमती जी ताना देने लगी हैं कि इतने पैसे जोड़ रखे हैं तो या तो मुझे सोने का हार दिलवा दो या फिर घर में कुछ किलो प्याज लेकर आ जाओ। तो मैं सोच रहा हूं कि सोने का हार ही दिलवा दूं। प्याज ले आया तो इनकम टैक्स वालों को जवाब कौन देता फिरेगा।

हालत यह है कि जब से प्याज महंगा हुआ है, सब्जियों में रोज़ प्याज का छोंक लगने लगा है। श्रीमती जी प्याज की खुशबू फैलाकर अपनी उस पड़ोसन से बदला लेना चाहती हैं, जो अब तक आए दिन महंगी-महंगी साड़ियां दिखाकर उनका दिल दुखी किया करती थीं। उधर पड़ोसन ने भी कहीं से प्याज के कुछ छिलके इकट्ठे कर लिए हैं और वो जान बूझकर कुछ प्याज के छिलके इस तरह से सड़क पर फेंकती है कि सारे लोग उसे प्याज के छिलके फेंकते हुए देख लें। इस तरह मोहल्ले में एक अजीब किस्म का प्याज युद्ध शुरू हो गया है। मुंह से आ रही प्याज की गंध अब बदबू की तरह परेशान नहीं करती, बल्कि एक स्टेटस सिंबल की तरह मन को गौरव प्रदान करने लगी है।

पिछले दिनों शहर के एक संगठन ने एक बड़े नेता के सार्वजनिक अभिनंदन का कार्यक्रम बनाया। पहली बैठक में तय हुआ था कि नेताजी को नोटों की माला पहनाई जाएगी और बाद में उस माला के नोट गरीबों की किसी संस्था को दान कर दिए जाएंगे। लेकिन कल विवाद हो गया। कुछ लोग चाहते थे कि नेताजी को प्याज की माला पहनाई जाए और माला में गूंथे प्याज को बेचकर उस संस्था की मदद की जाए। इस प्रस्ताव का विरोध करने वाले लोगों का कहना था कि ऐसा करने से अव्वल तो समारोह पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ पड़ेगा और दूसरा ऐसा करना लोकतंत्र विरोधी होगा क्योंकि इन दिनों आम आदमी प्याज नहीं खरीद पा रहा है और नेता जी को प्याज की माला पहनाने से भावनात्मक तौर पर आम आदमी कार्यक्रम से दूर हो जाएगा।

मेरी बेटी कहती है कि कभी सर्वहारा का सहारा रहा प्याज अब पूंजीवाद का गुलाम हो गया है। बैंक में काम करने वाली मेरी बहन की सलाह है कि मुझे बचत की आदत डालनी चाहिए और इस दृष्टि से कुछ किलो प्याज खरीदकर लॉकर में रख देने चाहिए। वहीं कुछ रिश्तेदार कहने लगे हैं कि मुझे अपनी ज़रा-सी सम्पन्नता पर बहुत घमंड हो गया है और इसीलिए मैं डायनिंग टेबल पर प्याज सजाने लगा हूं।

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