कटाक्ष / 'बॉयकाट चाइनीज प्रोडक्ट' कैम्पेन में फंसी पिचकारी!



satire and humour on bycott chinese product in india
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satire and humour on bycott chinese product in india

Dainik Bhaskar

Mar 16, 2019, 04:48 PM IST

जब-जब चीन ने आतंकवाद पर पाकिस्तान का समर्थन किया, इसका सबसे ज्यादा खामियाजा भारत के मध्यमवर्ग को ही भुगतना पड़ा है। सोशल मीडिया इसका साक्षी है। लेकिन इस बार दिक्कत यह हो गई कि होली ढंग से आई भी नहीं और चीन ने मसूद को वैश्विक आतंकी घोषित करने के प्रस्ताव में अड़ंगा लगा दिया। हमारी समस्या यह नहीं है कि मसूद इस बार भी बच गया। बचकर जाएगा कहां? उसे तो देर-सबेर हमारी सरकार देख ही लेगी। समस्या इससे कहीं अधिक विकट है। समस्या यह है कि सोशल मीडिया पर 'बॉयकाट चाइनीज प्रोडक्ट' या 'चीनी उत्पादों का बहिष्कार' जैसे कैम्पेन शुरू हो, उससे पहले ही कैसे भाग-दौड़कर चाइनीज पिचकारी और चाइनीज बलून खरीद लिए जाएं।

 

समस्या बड़ी इसलिए है कि क्योंकि इसमें हमारी नैतिकता आड़े आती है। ठीक है, हमारा पूरा घर चाइनीज चीजों से भरा है। सप्ताहांत में बच्चों को भले ही सोयाबड़ी वाली मंचुरियन खिलाते हैं, पर कहते तो उसे चाइनीज ही ना! समस्या यह नहीं है। समस्या नैतिकता की है। नैतिकता का तकाजा यही है कि अगर एक बार 'बॉयकाट चाइनीज प्रोडक्ट' कैम्पेन शुरू हो गया तो फिर बीच कैम्पेन में हम न तो चाइनीज पिचकारी खरीद सकते हैं और न ही चाइनीज बलून। और कैम्पेन खत्म कब हो, इसका क्या भरोसा। पता चले, इस चक्कर में होली ही बीत गई। 


हम पहले भी ऐसे ही संकट से गुजर चुके हैं। तो समझदारी का तकाजा यही है कि अगर पहले दूध के जले हो तो छाछ भी फूंक-फूंककर ही पी जाए। दिवाली के समय 'बॉयकाट चाइनीज प्रोडक्ट' कैम्पेन में फंस गए थे। चाहकर भी चीनी सीरीज और लाइट्स नहीं खरीद पाए। घटिया सीरीज से ही काम चलानी पड़ी। तो ऐसी रिस्क उठाना ही क्यों? कैम्पेन से पहले ही चाइनीज पिचकारी खरीद ली जाए। फिर शुरू हो जाए तो वेलकम। उसे फुल सपोर्ट!

 

खैर, इस बीच कैम्पेन शुरू भी हो जाए तो ऐसा कुछ यह कहकर बेनिफिट ऑफ डाउट ले सकते हैं, 'भैया अब तो मैंने खरीद ली। मैं अब कुछ नहीं जानती... और यह आप लोगों की गलत बात है। ऐसी चीजों के बारे में पहले बताया करो ना…?' यह ऑफ द रिकॉर्ड आइडिया है इस नैतिकता से बचने का! 
 

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