मणिका मोहिनी / इंटरनेट के दौर में उलझी एक प्रेम कहानी

Dainik Bhaskar

May 16, 2019, 08:11 PM IST

शब्दों के प्रवाह

shabdo ka pravaah story by manika mohini
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shabdo ka pravaah story by manika mohini

इस बार का भारत आना उसे वापस यू एस नहीं लौटने देगा, लगा उसे यही था. उसने मनु को लिखा भी था, ' दिल्ली पहली बार नहीं आ रहा हूँ, सिन्डी, पर इस बार, लगता है, तुमसे मिलने के बाद मैं वापस नहीं लौट पाऊंगा.'

( उसने मनु को कभी ' मनु ' नाम से नहीं बुलाया, जबकि सब उसे ' मनु ' नाम से ही जानते थे. मनु यानि मानसी, पूरा नाम मानसी जोशी. रोज़ नए-नए नामों से पुकारना उसे अच्छा लगता था. कई ई-मेल के आदान प्रदान के बाद जब पहली बार उसके मन में लगाव जागा तो उसने उसे नाम दिया- सिन्ड्रेला. और उसे छोटा करके ' सिन्डी ' वह उसे आम बुलाने लगा था. लेकिन कब उसकी उँगलियों से कौन सा नया नाम फिसल जाएगा, यह मनु नहीं जानती थी. पर वह जिस भी नाम से बुलाता, मनु को अच्छा ही लगता था.)

और उसका नाम था अनुपम, पूरा नाम अनुपम सरकार. वह नज़दीकी लोगों में ' अनु ' नाम से जाना जाता था. दोनों को दोस्ती की शुरुआत में नामों में साम्य, अनु, मनु, बड़ा अर्थपूर्ण लगा था. अनुपम ने लिखा भी था, ' सी द कनेक्शन. हमारे नामों में झंकार एक ही है.'

' वाह वाह. वॉट एन एक्सप्रेशन,' मनु ने उत्तर में लिखा था.

(ये थे उनकी ऑन लाइन दोस्ती के शुरूआती दिन.)

' क्यों ? मैं क्या तुम्हारे पांवों में बेड़ियाँ डाल दूँगी ? नहीं, मेरे दोस्त, एक बार आओ, दर्शन दो और वापस जाओ,' मनु ने लिखा था उसी सहजता से, जो सहजता उन दोनों के बीच में स्थाई भाव की तरह व्याप्त हो गई थी

' दर्शन दो घनश्याम श्याम मोरी अँखियाँ प्यासी रे ?' उसने मज़ाक किया था. यह उसका बात करने का अंदाज़ था, बातों को तोड़-मरोड़ कर पेश करना.

' चलो, चलो, ऐसा कुछ नहीं है. जब तुम मुझे देखोगे तो तुम खुद ही यहाँ से भागने की सोचोगे.'

' क्यों, मेरी चहकती हुई चिड़िया, ऐसा क्यों सोचती हो ? '

' क्योंकि...... क्योंकि मैं बहुत काली हूँ......'

अनुपम को यकीन नहीं आया. पहले भी मानसी ने यह लिखा था और उसने यकीन नहीं किया था.

' ओह हो, मेरी कोयल, कितना मीठा गुनगुनाती हो तुम......'

' मैं बहुत मोटी हूँ......'

अनुपम को फिर यकीन नहीं आया. पहले भी मानसी ने ऐसा लिखा था और उसने तब भी यकीन नहीं किया था.

' ओह हो, मेरी नूरजहाँ, मुझे ज़रा आने दो वहाँ......'

' मैं ज़रा भी सुन्दर नहीं हूँ......'

अनुपम को यकीन आना ही नहीं था. पहले भी मानसी ऐसा लिख चुकी थी लेकिन उसने यकीन क्यों करना था.

' ओह हो, मेरी लैला, तुम्हारा ह्रदय बहुत सुन्दर है......'

' मैं सच कह रही हूँ...... तुम देख कर मुझे बिलकुल पसंद नहीं करोगे......'

उसे मानसी के काली, मोटी, असुन्दर, सुन्दर होने से कुछ मतलब ही नहीं था.

' लिसेन माय प्रिंसेस, तुम देखने की चीज़ नहीं हो, महसूस करने की चीज़ हो......'

' यानि चीज़ हूँ मैं ? '

' देखो, मुझे शब्दों के जाल में न उलझाओ, मेरी शब्द-विशेषज्ञा...... और सुनो, हर समय यह असुन्दरता का राग आलापना छोडो. मुझे आने दो वहाँ, मैं तुम्हारा मानसी होना भुला दूंगा. मानसी हो इसीलिए सुन्दर नहीं हो न ? मेरी सिन्डी, तुम अपने को मेरी नज़रों से देखो, तब जानोगी कि तुम कितनी सुन्दर हो.'

' अरे रे रे, घबराओ नहीं. इतनी भी बुरी नहीं हूँ. आय'म वेरी स्मार्ट.'

' लेकिन मेरे सामने, मेहरबानी करके, अपनी कोई स्मार्टनेस मत दिखाना. मुझे तुम्हारा सहज, सरल व्यवहार चाहिए. जो तुम हो, अपने वास्तविक रूप में.'

वे दोनों ई मेल पर चैट कर रहे थे. यह सब कुछ मानसी उससे पहले भी कह चुकी थी लेकिन उसने इन बातों की तरफ कोई ध्यान नहीं दिया था. उसे हर बार लगा, या तो मानसी विनम्रतावश ऐसा लिख रही है या उसे खिजाने के लिए. वरना इतने सुन्दर, इतने आकर्षक, इतने बाँध लेने वाले पत्रों को लिखने वाली असुंदर कैसे हो सकती है ? वैसे भी, बाहरी सौन्दर्य से ज्यादा वह आंतरिक सौन्दर्य को महत्व देता था. वह मानसी से पत्र व्यवहार के बाद से स्वप्नलोक में रहने लगा था, जिसमें किसी भी बदसूरती की कोई गुंजाइश नहीं थी. धीरे धीरे मानसी एक स्वप्न सुंदरी के रूप में बदलती गई थी और उसकी कल्पना की उड़ान ऊंची से ऊंची होती गई थी. उसके ह्रदय में बरसों से दबी हुई प्रेम लहरियां झंकृत होने लगी थीं. इसी का परिणाम था कि उसकी उँगलियों से ई मेल पर मानसी के लिए हर क्षण नए नए नाम बिछलते रहते थे. मानसी के लिए भी शब्दों की दुनिया ने सपनों की दुनिया का रूप ले लिया था. कितना आसान है यूं मस्त होकर जीना, दोनों को लगता. एक बार मानसी ने अनुपम को लिखा था, ' हमारा यह स्वनिर्मित संसार कितना अच्छा है. किसी बाहर वाले का दखल नहीं.'

' सच सिन्डी, यह स्वप्नलोक अद्भुद है. अपनी पसंद के चरित्रों का निर्माण करो, अपनी पसंद के रूपाकार गढ़ो और उनके साथ रहो.'

' हाँ अनु, बाहर अपनी पसंद के लोग नहीं मिलते, अपनी पसंद के लोगों की रचना हम अपने स्वप्नलोक में करते हैं और उनके साथ पूरी ज़िन्दगी जीते हैं, पूरी शिद्दत के साथ. हम कभी साक्षात नहीं मिलेंगे अनु, वरना हमारा यह स्वप्नलोक टूट जाएगा, बिखर जाएगा.'

' हाँ सिन्ड्रेला, हम केवल अपने सपनों की दुनिया में मिलेंगे, मिलते रहेंगे. यहाँ हमारा अपना शासन चलता है. किसी को हमारे प्यार के बारे में कुछ नहीं पता. हम एकदम सुरक्षित हैं.'

लेकिन जैसे जैसे समय आगे बढ़ा और उनके लिखने की रफ़्तार तेज़ हुई, वे दोनों ही साक्षात मिलने के लिए विह्वल हो उठे.

मनु चुप रही तो अनुपम ने आगे लिखा, ' पाँवों में तो नहीं, मन में बेड़ियाँ ज़रूर डाल दोगी. मुझे लगता है क़ि तुम मेरे सारे निश्चय, सारे नियम, तप, सब भंग करने वाली हो.'

' शट अप. भारतीय कन्या का थोडा तो लिहाज करो. जो मुंह में आता है, बोल देते हो.'

' भारतीय कन्या यानि......'

' संकुचित......'

' यानि......'

' पुरातनपंथी......'

' यानि......'

' तुम्हारी तरह नहीं......'

' तो अब भारतीयता के नाम पर मुझे डरा रही हो ? माय ब्यूटीफुल सिन्ड्रेला, योर हार्ट इज सो ब्यूटीफुल, योर ब्रेन इज सो ब्यूटीफुल. मुझे तो ऐसा लग रहा है क़ि मेरे दिल्ली आते ही तुम कहीं मेरा अपहरण न कर लो. सच बताओ, कोई ऐसी योजना तो नहीं ? '

' और मुझे यह डर है क़ि मिलने के बाद हमारे बीच दोस्ती भी रहेगी या नहीं ? अनु, दोस्ती में शक्लोसूरत की तो कोई अहमियत नहीं होती ? बोलो, अनु, कहीं ऐसा तो नहीं कि तुम मिलने के बाद दोस्ती भी न रखो ? सच कहूं, मुझे देखने के बाद तुम्हारा दिल तो टूटने ही वाला है.'

' इस दिल के टुकड़े हज़ार हुए, ऐसे ही ना......'

' हाँ......'

' मेरे दिल की चिन्ता तुम मत करो. मैं तुम्हे देखने नहीं, तुमसे मिलने आ रहा हूँ, और जैसा कि तुमने कहा था, मैं आँखें बंद करके ही तुम्हे देखूँगा.' आँखें बंद करके देखने की बात दोनों के बीच पहले हुई थी संयोग से. एक बार मानसी ने किसी अन्तरंग क्षण में लिखा था, ' अनु, तुमने सचमुच मुझे हिप्नोताइज़ किया हुआ है. हर जगह, हर घडी सिर्फ तुम ही तुम. तुमसे अतिरिक्त तो मैं कुछ सोच ही नहीं पाती.'

' अच्छा ? तो मैं हर घडी, हर जगह कहाँ-कहाँ घूम रहा हूँ तुम्हारे साथ ? '

' कल मैं किसी रिश्तेदार के घर डिनर पर गई थी. हम बाहर के कमरे में बैठे थे. भीतर के कमरे में कुछ लोग ड्रिंक कर रहे थे. अचानक मुझे सुनाई पड़ा कि तुम भी हो वहाँ और बहुत बोल रहे हो, बहस पर बहस. कितना बोलते हो तुम. सच, मैं तुम्हारी आवाज़ पहचान सकती हूँ अब. मैंने तुम्हे वहाँ बाकायदा बोलते हुए सुना. अनु, मैं वहाँ तुम में ही डूबी रही. इतनी बेचैन हो उठी कि मन हुआ, पार्टी बीच में ही छोड़ कर घर लौट आऊँ. अब मैं तुम्हारे बिना कोई पार्टी कैसे अटेंड कर पाऊंगी ? मैं जहां भी जाती हूँ, तुम मेरे साथ होते हो. अब मैं तुम्हारे बिना क्या हूँ ? कुछ भी नहीं.'

' ओ माय डांसिंग क्वीन, ऐसी बातें करके तुम यहाँ मेरा जीना दुश्वार कर दोगी...... अच्छा बताओ, अगर तुम मुझे हिप्नोताइज़ करोगी तो क्या करोगी ? '

उसका जीना जैसे सच में दुश्वार हो गया हो. उसने अपने कार्यक्रम में भारी फेरबदल किया था ताकि वह जल्दी से जल्दी भारत आ सके, चाहे कुछ दिनों के लिए ही सही.

' मैं......? मैं तुमसे कहूँगी कि अपनी आँखें बंद करो और मुझे देखो.'

' ओह सिन्ड्रेला, यू आर सो ब्यूटीफुल...... माय आइज़ आर क्लोज्ड एंड आय'म सीइंग यू.' अनुपम ने तब लिखा था.

कैसे बौराए पगलाए से रहते थे वे दोनों. शब्दों में कितनी ताकत होती है ! शब्द किसी भी हथियार से ज्यादा घायल कर सकते हैं और किसी भी मरहम से ज्यादा दवा का काम कर सकते हैं. केवल शब्द, शब्द और सिर्फ शब्द. शब्दों में छुपे हैं केवल सपने, सपने और सिर्फ सपने.

पिछले दो महीनों से प्यार का ही मूड चल रहा था दोनों के बीच. हाँ, केवल दो महीने हुए थे उन्हें एक-दूसरे के संपर्क में आए पर लगता था जैसे वे बरसों से एक-दूसरे को जानते हों. अनुपम को भारत आना तो था ही पर उसने समय से पहले ही आने का कार्यक्रम बना लिया था.

मानसी ने कुछ नहीं लिखा.

' मेरी अनारकली. यह बताओ, अपने सलीम को लेने तुम एअरपोर्ट तो आओगी ना ? '

' औफकोर्स. फ्लाइट बुक हो जाने पर बता देना. पर देखो, तुम इस तरह के नामों से मुझे न बुलाया करो. मुझे शर्म आती है,' मनु ने लिखा.

' ओह हो, मेरी भारतीय कन्या...... ओके, बाय, साइन आउट करता हूँ.' अनुपम ने चैट बंद कर दिया.

यह पहली बार नहीं था जो वह इस देश में आ रहा था. बल्कि वह इस देश का ही था, बस नौकरी के चलते अमेरिका में बसा हुआ था. उसके माता पिता दिल्ली के अपने पुश्तैनी मकान में रहते थे. उसने बहुत चाहा था कि माँ-बाप उसके साथ अमेरिका में रहें. उन्हें बहुत समझाया, अनेक तर्क-वितर्क दिए परन्तु उनके लिए अपनी धरती को छोड़ कर जाना संभव न था. इसलिए भी कि उस दूर देश में अपनी भाषा बोलने समझने वाले उनके हमउम्र कहाँ मिलेंगे ? यहाँ चाहे वे रोज़ किसी से न बोलें पर एक तसल्ली तो है कि सारे अपने जैसे ही लोग हैं. उसकी विवशता थी नौकरी की, ज्यादा पैसा कमाने की या बस आदत पड़ गई थी वहाँ रहने की कि वह एक बार वहाँ गया तो बस वहीँ का हो कर रह गया. उसने सोचा ही नहीं कभी वापस अपने देश लौटने के बारे में.

बीच-बीच में वह आता रहता है. एक वर्ष में दो बार तो आता ही आता है.

बीस-पच्चीस दिन रहता है. और फिर वापस अपने देश. हाँ, कहने को अब वही उसका देश है. हालांकि वह ऐसा कहना नहीं चाहता, देशभक्ति की भावना आड़े आती है. पर करे क्या, सच तो यही है कि वह कुछ दिन यहाँ बिता कर अपने देश, देश नहीं, अपने घर वापस चला जाता है. अब तो अनेक वर्ष हो गए उसे वहाँ रहते. उसने वहाँ की नागरिकता भी प्राप्त कर ली है. अब उसका स्थायी रूप से भारत लौटने का तो सवाल ही पैदा नहीं होता.

उसकी ज़िन्दगी वहीं बनी और वहीं बिगड़ी, अगर इसे बिगड़ना कहा जाए तो. एक वर्ष नौकरी में गुज़ारने के बाद उसने वहीं की यानि विदेशी लड़की से शादी की थी और एक वर्ष बाद अलग भी हो गया था. कैसा दबदबा था उस गोरी लड़की का. यद्यपि उसका दिल और दिमाग भारतीय संस्कारों से लबालब भरे हुए थे, फिर भी बाहरी आकर्षण को वह नकार नहीं सका था. पारिवारिक असंतोष और हस्तक्षेप के बावजूद उसने अपने मन की राह चुनी थी लेकिन कोशिशें करने पर भी वह उस राह पर दूर तक नहीं चल पाया था. तलाक लेने के बाद घरवालों ने बहुत जोर दिया क़ि अपने देश लौट कर यहाँ की किसी लड़की से विवाह कर ले लेकिन किसी न किसी काम के चलते यह यूं ही टलता रहा. और अब तो इस बात को इतना समय गुज़र चुका था क़ि दोबारा शादी करना उसे झंझट जैसा लगने लगा था. वह खुश था, मस्त था. भागदौड़ भरी ज़िन्दगी में उसे शादी की गुंजाइश भी नज़र नहीं आती थी. जीना ही तो है, जैसे भी जीने की आदत पड़ जाए, आदमी जी लेता है. वह जिस भी हाल में था, संतुष्ट था. विवाह जैसी चीज़ से उसका भरोसा भी उठ गया था.

यह एक संयोग ही था कि इंटरनेट पर अनुपम और मानसी की बातचीत शुरू हुई.अपने खाली वक्त में वह कुछ कुछ लिख लेता था, बस शौकिया तौर पर. हैरानी की बात यह थी कि बरसों अमेरिका में रहने के बावजूद वह हिन्दी में लिखता था, कविता, कहानी या डायरीनुमा कुछ. वह इस लेखन को कहा करता था स्वान्तः सुखाय. कभी कभी अपने दो चार भारतीय मित्रों के साथ होने वाली बैठकों में उसने अपना लिखा हुआ सुनाया था और ' वाहवाही ' बटोरी थी. बाद में तो मित्र स्वयं उससे रचना सुनाने का आग्रह करने लगे थे. मित्रों को अच्छा लगता था, विदेश में रहते हुए अपनी भाषा से इस प्रकार जुड़ना. अनुपम की हिन्दी में लिखी रचनाओं में अपने देश की मिट्टी की सोंधी महक हो जैसे. विदेश में रहते हुए अपने देश की हर छोटी से छोटी चीज़ खींचती है अपनी ओर.

एक दिन अनुपम ने देखा कि उसके पास उसके लिखे हुए पन्नों का ढेर लग चुका है. एकाएक उसका मन हुआ कि क्यों न इन्हें पुस्तक रूप में छपवाया जाए. उसके मित्रों की भी यही राय थी कि वह अपनी सारी रचनाओं को पुस्तकाकार छपवाए. लेकिन अमेरिका में रहते हुए हिन्दी में पुस्तक छपवाने की बात उसे नाउम्मीदी ही लगी. यहाँ कौन सा प्रकाशक होगा ऐसा, इसकी अनुपम को कोई जानकारी नहीं थी. उसके मिलने जुलने वालों के दायरे में न कोई हिन्दी वालों के संपर्क में था, न हिन्दी लिखने वालों के. इसके लिए उसका अपने देश की ओर रुख करना स्वाभाविक था. भारत में माता पिता एवं रिश्तेदारों के सिवा उसके सारे संपर्क धुंधलाए हुए थे. पंद्रह वर्ष से अधिक होने को आए थे उसे यहाँ रहते हुए. उसे किसी ऐसे भारतीय मित्र, जानकार का नाम ध्यान नहीं आया जो इस मामले में उसकी मदद कर सके. माता पिता उस उम्र में थे कि उनके बस का नहीं था इस दिशा में कुछ करना. उसने इस सम्बन्ध में पूरी जानकारी हासिल करने के लिए भारतीय दूतावास से संपर्क साधना चाहा किन्तु समयाभाव के कारण वह ऐसा कुछ नहीं कर सका. समय उसके पास होता था केवल रात में. एक रात जब उसने अपना लैपटौप खोला, कुछ लिखने के लिए, तो उसे इंटरनेट पर प्रकाशकों के बारे में जानकारी प्राप्त करने का ख्याल आया. उसने इंटरनेट पर टटोलना शुरू किया.

यह क्या ? एक महिला प्रकाशक ? मानसी जोशी. आकर्षित तो वह ' महिला ' के कारण ज्यादा हुआ, प्रकाशक की तलाश उसे थी ही. सो यह बहाना बना उनके एक-दूसरे के संपर्क में आने का.

आरम्भ के कुछ दिनों तक वे केवल व्यवसायिक जानकारी लेते देते रहे. एक दो दिन के अंतराल में दोनों की तरफ से एक एक मेल इधर उधर होता था. कोई व्यक्तिगत बातचीत नहीं. कोई एक दूसरे के बारे में खुलासा नहीं. पर शब्दों में कुछ ऐसा जादू था कि दोनों एक दूसरे के मेल का इंतज़ार करते. आखिर एक दिन अनुपम ने मानसी को लिखा, ' और क्या करती हैं आप ? आपके क्या-क्या शौक हैं ? '

मानसी ने उत्तर लिखा, ' कुछ ख़ास नहीं. पढना-लिखना, बस.'

अनुपम पूछना चाहता था, आपके परिवार में कौन कौन हैं, पर पूछ नहीं पाया. सभ्यता का तकाजा था. मुंहफट होकर कैसे कोई व्यक्तिगत बात पूछ ले ? मानसी पूछना चाहती थी, आप हमेशा रात को मेल लिखते हैं, आपकी पत्नी कुछ नहीं कहती ? पर पूछ नहीं पाई. सीधा पत्नी के बारे में पूछना खराब लगता ना ? फिर, वहाँ रात होती है, तो यहाँ दिन होता है. यही कारण होगा. शायद.

एक दिन अनुपम ने लिखा, ' यदि आप अन्यथा न लें तो एक बात कहना चाहता हूँ.

मेरा एक भारतीय मित्र यहाँ कई वर्षों से है. वह एक भारतीय लड़की से शादी करना चाहता है. आप किसी को जानती हों तो....'

तो जनाब क्वारे हैं, मित्र के बहाने से अपने बारे में कह रहे हैं, मानसी ने सोचा.

लिखा यह, ' मैं ख़ास किसी को नहीं जानती पर आप यहाँ के अखबार में विज्ञापन दे सकते हैं, मतलब आपके मित्र विज्ञापन दे सकते हैं.'

' ठीक है, मैं कहूँगा उससे. ज़रूरत पड़ने पर आपका सहयोग तो मिलेगा ही.'

' अवश्य..... वैसे मेरी एक सहेली है लेकिन वह तलाकशुदा है......' मानसी ने लिखा बात आगे बढाने के लिए. उसकी पहचान में कोई न कोई तो तलाकशुदा होगी ही.

ओह हो, तो मैडम तलाकशुदा हैं, सहेली के बहाने से अपने बारे में कह रही हैं,

अनुपम ने सोचा और जवाब दिया, ' नो प्रॉब्लम, माय फ्रेंड इज ऑल्सो अ डिवोर्सी...... अपनी सहेली के बारे में विस्तार से बताएं, क्या करती हैं, उनके शौक वगैरा......'

तो जनाब क्वारे नहीं, तलाकशुदा हैं ? सीधे सीधे नहीं बता सकते क्या ? लिखा उसने यह,

' शीघ्र उसका प्रोफाइल भेज दूँगी.' लिखने को तो मानसी ने लिख दिया था पर किसका प्रोफाइल भेजेगी वह ?

अनुपम ने उसे ही वह लड़की समझ लिया था. उसने एकाध दिन के बाद प्रोफाइल भेजने का आग्रह किया. साथ ही वह अपने ऊपर काबू न रख सका और उसने लिख दिया. ' मानसी जी, आय एम मेकिंग इट क्लीअर दैट इफ यू आर द गर्ल, आय एम श्योरली,

कैटेगोरिकली, ऐब्सोल्युत्ली, सिंगुलरली, अनईक्विवोकली, स्त्रौन्ग्ली, सरेन्दरिन्ग्ली इंट्रेस्टेड इन प्रिंसिपल.'

मानसी अनुपम का यह मेल पढ कर हैरान रह गई. बिना देखे, बिना मिले इस तरह की वचनबद्धता ?

उसने तुरंत उत्तर दिया, ' नो, आय एम नौट दैट गर्ल. आय एम नौट अ डिवोर्सी.'

' सौरी, मैंने समझा था कि आपने अपने बारे में लिखा था......क्या आप अपने बारे में कभी कुछ नहीं बताएंगी ? '

' मैंने शादी नहीं की. स्टिल आय एम नौट इंटेरेस्टेड इन मैरेज. मैं जो भी हूँ, जिस हाल में हूँ, उसमें खुश और संतुष्ट हूँ. '

वह पूछना चाहता था कि मानसी ने शादी क्यों नहीं की ? कोई मिला नहीं या...... ऐसा कैसे हो सकता है कि इतनी बढ़िया मनमोहक बातें करने वाली को कोई मिला न हो. अनुपम ने अपने सवाल का जवाब भी खुद ही दे लिया. फिर ? किसी ने उसका दिल तोडा क्या ? इस बात की गुंजाइश हो सकती थी. ' मैं इस बारे में नहीं पूछूंगा.' उसने सोचा. झरा उसकी उँगलियों से सिर्फ यह, ' ओह ! '

' ओह जैसी कोई बात नहीं है. आय'म ओके.'

' इफ यू डोंट माइंड, क्या हम दोनों दोस्त बन सकते हैं ? ' अनुपम ने पूछा.

' व्हाय नॉट ? दोस्त तो हम बन ही चुके हैं. वी आर ऑन लाइन फ्रेंड्स.'

' ओह ! आय एम सो मच रिलैक्स्ड. आय एम ऑल्सो नौट इंटेरेस्टेड इन मैरेज....यू नो वॉट ? '

' वॉट ? '

' सच कहूं तो आय एम वेरी हैप्पी विद माय ऑन लाइन फ्रेंड.'

मानसी के मन में कुछ खट से बजा. उसने लिखा, ' शब्दों के आदान-प्रदान में एक फील गुड फैक्टर रहता है.'

' हाँ, मुझे इंतज़ार रहता है आपकी मेल का. मैं बार-बार अपना लैपटौप खोल कर देखता रहता हूँ.

मुझे आपसे बातें करना बहुत अच्छा लगता है, मानसी. फिर, आप तो मेरा भविष्य भी संवारने वाली हैं.'

' वह कैसे ? '

' मेरी किताबें छाप कर. क्या मैं आप को तुम बुला सकता हूँ ? '

' श्योर......'

' तुम्हे जान लेने भर से मेरा भविष्य जुड़ गया है, मानसी. तुम्हारी मित्रता मेरे लिए भगवान् की देन है. कोई पूर्व जन्म का पुण्य प्रताप......'

मानसी चुप.

' कुछ बोलो मानसी......'

अनुपम की बातें मानसी को भाव विभोर किए हुए थीं. उससे कुछ लिखा न गया.

' आज से मैं तुम्हे नया नाम देता हूँ, सिन्ड्रेला, माय ऑन लाइन फ्रेंड सिन्ड्रेला, माय पेन फ्रेंड सिन्ड्रेला......'

मानसी फिर चुप.

' सिन्ड्रेला, कुछ लिखोगी नहीं ? '

' मैं शायद तुमसे उम्र में बड़ी होऊँगी. मैंने हिसाब लगा कर देखा है.'

' अब यह उम्र कहाँ से आ गई बीच में ? '

मानसी चुप.

अनुपम चुप न रह सका. उसने लिखा, ' कुछ बोलो, सिन्ड्रेला.'

' फील गुड फैक्टर हैज़ मेड मी स्पीचलेस,' मानसी ने लिखा और जैसे दिल की पूरी किताब खोल कर रख दी अनुपम के सामने. चैट बंद हो गया.

बल्कि सचाई यह थी कि उसके बाद चैट कभी बंद ही नहीं हुआ. चौबीस घंटे कंप्यूटर खुला रहने लगा. धीरे-धीरे, जो कि बहुत ज्यादा जल्दी-जल्दी था, दोनों मानसिक धरातल पर नज़दीक आते गए और बातों के अंदाज़ स्पष्ट से स्पष्टतर होते गए. मानसी को हर रोज़ अपनी उम्र का भय सताता रहता. वे दोनों अपना स्वप्लोक टूटने के भय से अपनी असलियत सामने नहीं लाते.

न उन दोनों ने एक-दूसरे को कभी अपनी फोटो भेजी, न ही अपनी उम्र बताई. एक झूठ को जीते हुए खुश रहना कितना सरल है, यह उन दोनों की जैसे विवशता बन गया हो.

अनुपम ने एक बार उसे लिखा, ' मुझे नहीं लगता कि तुम मुझ से बड़ी होंगी. अगर होंगी भी तो इसमें तुम्हारा क्या कसूर ? '

' लेकिन......'

' लेकिन-वेकिन कुछ नहीं. मैंने तुम्हे छोटा करने का एक उपाय सोचा है......'

' तुम्हारे किए क्या मैं छोटी हो जाऊंगी ? '

' हाँ, मैं तुम्हारी जन्म-तिथि बदल रहा हूँ. अब तुम्हारी जन्म-तिथि है 29 फरवरी. हर चार साल में से तीन साल कम हो गए.'

' इस तरह तो मैं शून्य हो जाऊंगी.'

' नहीं, इसका मतलब यह हुआ कि यदि मैं चार साल का हूँ तो तुम एक साल की यानि तुम मुझसे तीन साल छोटी रहोगी अब हमेशा. '

' यानि तुम मुझे अपने बराबर लाकर ही छोड़ोगे ? '

' अब समझी, मेरी ट्यूब लाइट. नाओ यू आर एन एन्लाइतेन्द सोल.'

' वेरी स्मार्ट...... हा हा हा...... हो हो हो......'

उसके बाद अनुपम काम में कुछ ऐसा व्यस्त हुआ कि मेल लिखने का उसे वक़्त न मिला. मानसी के मन में संशय जागा, कहीं उम्र के कारण तो पीछे नहीं हट रहा ? मैंने यह लिख दिया कि मैं सुन्दर नहीं हूँ, कहीं इस कारण तो पीछे हट रहा ? मानसी ने स्वतः लिखना उचित नहीं समझा. आखिर तीन दिन के बाद अनुपम का मेल आया, वैसा ही हँसता-खिलखिलाता, ' ओ माय सिनोरिता, हाओ इज लाइफ ? '

' इतने दिन कहाँ थे ? मैंने तुम्हारा एक नया नाम रखा है.... पत्थरदिल......'

' लिसेन सिनोरिता, यह नाम रखने की टेरिटरी मेरी है. रौयल्टी देनी पड़ेगी......'

' दे दूँगी पर पहले यह बताओ कि मेरा पत्थरदिल दोस्त कहाँ था इतने दिन ? '

' तुम्हारे पास आने की भागदौड़ में लगा था.'

' ओह, मैं समझी, किसी शूर्पनखा के चक्कर में तो नहीं पड़ गए ? '

' ओह नो सीते, तुम्हारा राम एकदम एकव्रती है, मर्यादा पुरुषोत्तम......'

' हाय मेरे राम, यह तुमने क्या लिख दिया ? ' घबरा के मानसी ने चैट बंद कर दिया.

अनुपम ने उसे पुनः चैट पर आमंत्रित किया.

' यू आर क्रेजी मैन......' मानसी ने लिखा.

' येस, आय एम क्रेजी. मैं सच में तुमसे मिलने के लिए बहुत उतावला हो रहा हूँ. पता नहीं, मैं क्या कर दूंगा ? '

' अपने को संभालो अनु......'

' अच्छा बताओ, मुझसे मिल कर सबसे पहले तुम क्या करोगी ? '

' क्या करोगी, मतलब ? तुम बताओ......'

' आय'ल गिव यू अ स्मूच......

' गंदे कहीं के......'

' आय'ल गिव एनादर वन......'

' ओके बाय.' और मानसी ने चैट बंद कर दिया.

अनुपम को लेने के लिए एअरपोर्ट नहीं जा सकी मानसी. अनुपम ने खुद मना कर दिया, एक तो इतनी दूर, ऊपर से आधी रात की फ्लाइट. तय यह हुआ कि अनुपम एअरपोर्ट से सीधा अपने घर यानि अपने माता-पिता के पास जाएगा और अगले दिन शाम को वो मिलेंगे, किसी रेस्तरों में.

अनुपम के दिल में बेसब्री थी और मानसी के दिल में उथल पुथल. क्या होगा, क्या होने वाला है, यह दोनों के ही दिल में था.अगला दिन भर जेट लेग के कारण अनुपम सोया रहा. आखिर प्रतीक्षा की घड़ियाँ समाप्त हुईं और अगले दिन की शाम आई. पहचानना मुश्किल नहीं हुआ. जब अनुपम रेस्तौरैंट पहुंचा, मानसी वहाँ पहले से ही मौजूद थी, दरवाज़े की तरफ पीठ करके बैठी हुई. यही होगी. किसी के इंतज़ार में बैठी दिखती है. मेंरे ही. ' कहीं से मोटी नहीं है लड़की,' अनुपम ने सोचा और सामने जा खडा हुआ. उसके सामने आते ही मानसी को लगा, यही है, और बिना कुछ पूछे दोनों ने एक-दूसरे को पहचान लिया. अब दोनों आमने-सामने बैठे थे.

मानसी ने देखा, एकदम चिट्टा-बुर्राक, जैसे कोई अँगरेज़ हो, छरहरा, हंसमुख, ओजस्वी, तेजस्वी...... ओह, वह बुझ गई.

उसके आगे क्या लगेगी वह ? सूरज की तीखी रोशनी के आगे जैसे रात का अँधेरा. अनुपम ने गौर से न देखने का बहाना करते हुए भी उसे गौर से देखा.

बड़ी तो है पर चलेगी. लेकिन उसका रंग ? यह तो सचमुच काली है, एकदम काली स्याह, जिसे छूने भर से अपने हाथ काले होने का डर हो. नैन-नक्श ठीक-ठाक. मोटी तो नहीं पर स्वस्थ है. उम्र...... चलो ठीक है, चला लेंगे. पर काली इतनी जिसका अनुमान वह लगा ही न सका था. उसने सोचा था, हम भारतीय तो अपने आप को काला कहते ही हैं, तो ऐसी ही कुछ होगी वह, सांवली. पर उसने सच लिखा था, वह सच में काली है. शायद इसीलिए इसका विवाह न हो पाया हो, कौन जाने. ' नहीं... नहीं... ऐसी बात नहीं सोचनी चाहिए मुझे, इंसान की पहचान उसके गुणों से होती है......' अनुपम ने अपने सिर को झटका.

उसे अपने रखे प्यार के इतने नामों में से कोई नाम ध्यान न आया. ' तुम ' कहना भी वह भूल गया. निकला उसके मुंह से यह, ' कैसी हैं आप ? ' कहते हुए हंसा वह. हंसना ज़रूरी था. मानसी को कुछ पता न चले...... पर पता कैसे न चलता ? वह कोई बच्ची तो थी नहीं. ज़िन्दगी के उतार-चढ़ाव देखे थे. आज पहली बार किसी लड़के से नहीं मिल रही थी. जब भी मिली थी, प्रतिक्रिया समान ही होती थी. कहा उसने यह, ' पुस्तक की पांडुलिपि लाए है आप ? '

' कौन सी पुस्तक ? ' उसके बुझे मन में पुस्तक छपवाने के सारे अरमान जैसे जल चुके थे. उसे एकाएक ध्यान न आया.

' अपनी किताब छपवाना चाहते थे न आप ? '

' ओ हाँ, इस समय तो नहीं लाया. कल दे दूंगा. फोन करके मिलूंगा आपसे.'

वह ' कल ' कभी नहीं आया. और न ही फोन. जिस स्वप्नलोक को वो वास्तविकता में बदलने के लिए बेचैन थे, वह चूर-चूर हो गया था.

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