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मेड इन इंडिया /कपड़ों पर बुनी नायाब कारीगरी की कहानियां, देश के कोने-कोने से 5 किस्से



Danik Bhaskar | Sep 14, 2018, 10:32 AM IST
  • काशीदा, जम्मू-कश्मीर : कबूतर से मिली इंस्पिरेशन, नीडिल और रंगीन रेशमी धागों से दिया रूप

    काशीदा, जम्मू-कश्मीर : कबूतर से मिली इंस्पिरेशन, नीडिल और रंगीन रेशमी धागों से दिया रूप

    • काशीदा कपड़ों पर की जाने वाली जम्मू-कश्मीर की खास तरह की कारीगरी है। इसे नीडिल की मदद और रंगीन रेशमी धागों से तैयार किया जाता है। हालांकि सबसे ज्यादा गोल्ड, सिल्वर और मैटेलिक रंगों का प्रयोग होता है।
    • इसका आगाज मुगल काल में हुआ थी। इसकी शुरुआत खूबसूरत वादियों से नहीं बल्कि एक कबूतर की डिजाइन से हुई थी। बाद में डिजाइन के रूप में फूल, पत्तियों और चिड़ियों को शामिल किया गया।
    • इस खास तरह की कढ़ाई से ज्यादातर शॉल और साड़ियां तैयार की जाती थीं। लेकिन अब जैकेट, स्टोल, कुशन कवर, बैग और परदों में काशीदा कारीगरी देखी जा रही है।
    • फिल्म कश्मीर की कली में इस कारीगरी से तैयार ड्रेसेस को काफी दिखाया था। यहां का हैंडीक्राफ्ट का कारोबार 1 हजार करोड़ से भी ज्यादा का है जिसे ढाई लाख कश्मीरी तैयार करते हैं।

  • पीपली, ओडिशा : धागों का नहीं, छोटो-छोटे कपड़ों का तालमेल

    पीपली, ओडिशा : धागों का नहीं, छोटो-छोटे कपड़ों का तालमेल

    • पीपली कारीगरी की शुरुआत ओडिशा के एक गांव पीपली में हुई थी, इस कारण इसका ये नाम रखा गया। यह गांव पुरी से 40 किलोमीटर दूर है। यह दूसरी तरह की कढ़ाई से काफी अलग है। इसमें छोटे-छोटे अलग-अलग तरह के फैब्रिक का इस्तेमाल किया जाता है। एक बड़े कपड़े पर इन छोटे-छोटे फैब्रिक को आकार देकर लगाया जाता है। इसके बाद इसे तय डिजाइन में फिट किया जाता है। 
    • इस कारीगरी में पुराने कपड़ों को रिसायकल भी करके नया रूप दिया जाता है। जिसे दूर से देखने पर एक प्रिंटेड कपड़े की तरह दिखता है। इसमें चमकदार बनाने के लिए शीशों का इस्तेमाल भी किया जाता है। 
    • इस ट्रेडिशनल आर्ट को कुछ डिजाइनरों ने मॉडर्न टच दिया और इसे लेंसेट, कुशन और वॉल हैंगिंग से निकालकर ग्लोबल प्लेटफॉर्म तक पहुंचाया। ऐसी ही फैशन डिजाइनर हैं शारदा महापात्रा जिन्होंने साडियों में इस कारीगरी का इस्तेमाल किया। वे पिछले 20 साल से इस पर काम कर रही हैं। 2004 में पीपली गांव में 54 मीटर क्राफ्ट वर्क तैयार किया गया था, जिसे लिम्का बुक ऑफ रिकॉर्ड्स में शामिल किया गया था।

  • रबरी, गुजरात : शीशों और धागों का काम्बिनेशन 

    रबरी, गुजरात : शीशों और धागों का काम्बिनेशन 

    • इसमें कांच और धागों का इस्तेमाल किया जाता है। यह कला सिर्फ कपड़ों तक ही नहीं सीमित है बल्कि इसकी डिजाइन घरों की दीवारों और हाथों पर बने टैटू पर भी दिखती है। इसकी डिजाइन धार्मिक दृश्यों और रेगिस्तान से प्रेरित है। इसके अलावा शीशों को अलग-अलग आकार को धागों के बीच लगाते हैं। 
    • इस डिजाइन से जुड़े कपड़ों में घाघरा, ब्लाउज, शर्ट, कुर्ता, बैग और बच्चों के कपड़े उपलब्ध कराए जाते हैं। रबरी कला से तैयार होने वाले कपड़ों का कारोबार करने वाली पाबीबेन के अनुसार पहले ये सिर्फ गांव तक सीमित थी लेकिन धीरे-धीरे इसमें गांव की औरतों को जोड़ा और इसे एक कारोबार में तब्दील किया। 
    • इस कला को रबरी नाम की कम्युनिटी तैयार करती है, जो गुजरात के कच्छ में निवास करती है। इनका पहनावा काफी अलग होता है जिसमें काले रंग के कपड़े अधिक शामिल होते हैं। हाथ, गले पर टैटू होने के अलावा खासतरह की ज्वैलरी पहनती हैं। 

  • तोड़ा, तमिलनाडु : ज्योमेट्रिकल आर्ट और गहरे रंग के धागों की छाप

    तोड़ा, तमिलनाडु : ज्योमेट्रिकल आर्ट और गहरे रंग के धागों की छाप

    • तमिलनाडु के दक्षिण भाग में नीलगिरी पहाड़ी है। यहां तोड़ा नाम की प्रजाति इस खास कला को तैयार करती है। तोड़ा कला के बारे में बहुत कम लोग ही जानते हैं। सिर्फ 200 महिलाएं ऐसी हैं जो इस कला को जानती हैं।
    • इस दुर्लभ कला को बनाए रखने और आगे बढ़ा का काम शीला अपने एनजीओ शेलोम की मदद से कर रही हैं।
    • इस कारीगरी में खास तरह के ज्योमेट्रिक डिजाइन बनाए जाते हैं। जिसे बनाने में काले और लाल जैसे गहरे रंगों का प्रयोग किया जाता है। तोड़ा कम्युनिटी कुशन कवर, बैग्स, शॉल में कारीगरी करके बेचती थी। शीला ने कला और गांव वालों को आर्थिक रूप से मजबूत बनाने के लिए मदद की।

  • हैंडलूम वर्क, असम

    हैंडलूम वर्क, असम

    • असम वाइल्डलाइफ, हरियाली और सिल्क के लिए भी प्रसिद्ध है। यहां के सुआलकुच्छी गांव को वीविंग टाउन कहा जाता है। यहां बड़ी संख्या में कुटीर उद्योग हैंडलूम में लगे हुए हैं, जिसके लिए इसे \"असम का मैनचेस्टर\" भी कहा जाता है। 
    • डिजाइनर संजुक्ता दत्ता के अनुसार यहां के हैंडलूम वर्क वाली एक साड़ी को तैयार करने में 25 दिन लग जाते हैं। यहां मलबरी और मूगा सिल्क से कपड़े तैयार किए जाते हैं। 
    • यहां कई जगह हथकरघा कारखाने मौजूद हैं। यहां रेशमकीट पालन एक रोजगार के तौर अपनाया गया है। जहां ज्यादातर महिलाएं रेशम निर्माण का काम करती हैं।