इंजीनियर्स डे / इंजीनियरिंग से सीखकर दूसरे प्रोफेशन में करिअर बनाने का ट्रेंड, छात्रों को चाहिए इनोवेशन की आजादी



Engineers Day 2019 why engineering student leaving iit and joining other field
X
Engineers Day 2019 why engineering student leaving iit and joining other field

  • युवाओं का जवाब : कुछ नया करना चाहते हैं थे, बंधकर काम नहीं करना चाहते
  • प्रोफेसर्स का तर्क : हम चार साल उन्हें तैयार करते हैं ताकि वे अपने फैसले खुद ले सकें, ये उनकी चॉइस

Dainik Bhaskar

Sep 20, 2019, 04:14 PM IST

स्वाति चौधरी (एजुकेशन डेस्क). क्या देश के युवाओं का इंजीनियरिंग से मोह भंग हो रहा है। रिपोर्ट्स, सर्वे और आंकड़े तो इसी ओर इशारा करते हैं। इसे तीन तरह से समझा जा सकता है। पहला, आईआईटी एंट्रेस में बैठने वाले छात्रों की संख्या साल दर साल घट रही है। दूसरा, इंस्टीट्यूट में हर साल सीट्स खाली छूट रही हैं और तीसरा, इंजीनियरिंग पढ़कर निकलने वाले छात्र दूसरे प्रोफेशन की ओर रुख कर रहे हैं। आज इंजीनियर्स डे है, इस मौके पर भास्कर ने आईआईटी के प्रोफेसर्स, आईआईटीएन और वर्तमान में इंजीनियरिंग की पढ़ाई करा रहे स्टूडेंस से ज्यादा इसकी वजह….पढ़िए रिपोर्ट-

80% इंजीनियर जॉब के लिए अनफिट : सर्वे

  1. एनुअल एम्प्लॉयबिलिटी सर्वे 2019 कहता है, 80 फीसदी भारतीय इंजीनियर जॉब के मुताबिक तैयार नहीं हैं। केवल 2.5 फीसदी इंजीनियरों में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की बेहतर नॉलेज है जो इंडस्ट्री के मानकों के मुताबिक हैं। जॉब के लिए अप्लाई करने वालों में सिर्फ 4.6 फीसदी की कोडिंग स्किल बेहतर है। सर्वे में कहा गया है भारतीय शिक्षा व्यवस्था में बड़ा बदलाव करने की जरूरत है ताकि बेरोजगारी को कम किया जा सके।

     

    ''

     

  2. इंजीनियरिंग के बाद दूसरे क्षेत्र में क्यों करियर बना रहे स्टूडेंट्स

    इंजीनियरिंग छोड़कर दूसरी फील्ड में करियर बनाने वाले ज्यादातर स्टूडेंट्स का कहना है वह हमेशा से कुछ नया करना चाहते हैं थे। वह बंधकर काम नहीं करना चाहते क्योंकि इससे वे बहुत कुछ सीख नहीं पाते है।

     

    केस-1 : बेकार नहीं जाती आईआईटी की लर्निंग
    आईआईटी दिल्ली से पासआउट सूरज कुमार इंजीनियरिंग की जॉब छोड़कर अपनी कैंपेन कंसल्टेंसी में काम कर रहे हैं। दूसरी फील्ड में कॅरियर बनाने के सवाल पर सूरज कहते हैं कि बेशक मैंने देश के बेहतरीन इंजीनियरिंग कॉलेज से पढ़ाई की है लेकिन मुझे नई चीजें करने का शौक है। हमेशा से करियर में कुछ नया करना भी चाहता था जब मैंने जब मैंने कैंपेन कंसल्टेंसी के बारे में सुना और ये आइडिया मुझे नया और चैलेंजिंग लगा। और इसी में कॅरियर बनाया।

    प्रोफेशन बदलने का फैसला कितना सही रहा, इस सवाल पर सूरज का कहना है, मैं नहीं जानता कि फैसला सही है या नहीं। लेकिन मुझे लगता है कि मैं जो कर रहा हूं उसका समाज में अच्छा प्रभाव पड़ रहा है और मैं उसे देख पा रहा हूं। चैलेंज कितना है यह आपके ऊपर निर्भर है। अगर आप किसी भी चीज को लेकर उत्सुक हैं तो समस्या का हल ढूंढ ही लेते हैं। यही मैंने आईआईटी में सीखा है। मैं अपने काम में आने वाली हर समस्या का समाधान निकालता हूं क्योंकि मैं जानता है कि परेशानियां कभी खत्म नहीं होती हैं।


    केसर-2 : पसंद नहीं 9 से 5 की नौकरी
    IIT दिल्ली से केमिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर चुके सार्थक का कहना है, जब स्टूडेंट आईआईटी या दूसरे इंजीनियरिंग कॉलेज का हिस्सा बनते हैं तो यहां उन्हें कई अवसर मिलते हैं? यहीं से वो अपनी पसंद और नापसंद की तय करते हैं और चुनाव करते हैं कि उन्हें किस दिशा में जाना है। आईआईटी कैंपस में सीनियर्स से बहुत कुछ सीखने का मौका मिलता है क्योंकि वो अलग अलग फील्ड में बेहतरीन काम कर रहे होते हैं। मैं कॉलेज की शुरुआत से की स्टार्टअप्स की ओर आकर्षित था। मैं 9 से 5 की नौकरी कभी नहीं चाहता था क्योंकि यह बोरिंग है और आप नौकरी के शुरुआती दौर में ज्यादा कुछ नहीं सीख सकते हैं।

    सार्थक कहते हैं, ऐसा नहीं है कि प्राइवेट सेक्टर में नौकरियां नहीं हैं। MNCs में आईटी, कंसल्टिंग, मैनेजमेंट, एनालिस्ट जैसे अलग-अलग तरह के कई जॉब्स हैं, मैं किसी और के लिए नहीं हमेशा अपने पैशन के लिए काम करना चाहता था। दो साल पहले हमने 4 लोगों के साथ शुरुआत की और अब 50 लोग काम करते हैं। हम दुनिया भर में ग्राहकों के साथ काम कर रहे हैं। मेरा निर्णय सही साबित हुआ है। आप अपने जुनून के साथ खा सकते हैं और सो सकते हैं लेकिन अपनी नौकरी के साथ नहीं।

    सार्थक के मुताबिक, नया व्यवसाय शुरू करना ये एक वक्त पर काफी रोमांचक और चुनौतीपूर्ण होता है। आपके हर दिन नई चुनौतियां का सामना करते हैं। सबसे पहले, आपको माता-पिता को राजी करना होता है, जो आसान काम नहीं है। फ्रेशर के रूप में आपको बाजार को समझने के लिए सैकड़ों उद्योग विशेषज्ञों से बात करनी होगी और फिर उसी के अनुसार समाधान तैयार करना होगा। एक बार जब आप एक प्रोडक्ट बनाते हैं, तो आपको अपने उत्पाद को अपने ग्राहकों को बेचना होता है, ताकि वे उस प्रोडक्ट का उपयोग करने के लिए आकर्षित हो सकें जो एक और कठिन काम है। फिर एक 4 लोगों की टीम को 50 तक के स्केल पर ले जाना भी चुनौतीपूर्ण है, क्योंकि आपको ऐसे लोग ढूंढने होते हैं जो आपकी ही तरह जूनूनी हों और आप पर विश्वास करें और आपके पैशन को समझकर काम कर सकें।

     

    ''

     

  3. क्या कहते हैं प्रोफेसर्स

    इंजीनियरिंग की पढ़ाई के बाद स्टूडेंट्स फील्ड क्यों बदल रहे हैं, इस सवाल आईआईटी बॉम्बे के असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. बी हनुमंथा राओ का कहना है हम चार साल तक उन्हें पढ़ाते और ग्रूम करते हैं ताकि वे तय कर सकें कि ग्रेजुएशन के बाद क्या करना है। अगर भारतीय इंजीनियर्स टॉप आईटी कंपनीज में काम नहीं कर रहे हैं तो ये नहीं कहा जा सकता कि इसमें इंस्टीट्यूट्स और पढ़ाई में कमी रह गई है। ज्यादातर मामलों में स्टूडेंट्स खुद चुनते हैं कि उन्हें कहां काम करना है देश में या विदेश में। अब देश में कई आईटी कंपनियां हैं जो अच्छा पैसा भी दे रही है। इसलिए वे विदेश नहीं जा रहे।

    राजीव गांधी टेक्निकल यूनिवर्सिटी भोपाल की प्रोफेसर शिखा अग्रवाल बताती हैं, संख्या नहीं गुणवत्ता में फर्क आया है। पहले के स्टूडेंट्स विषयों को आसानी से समझ लेते थे और उनके नॉलेज का स्तर बेहतर हो जाता था। अब ऐसा नहीं हैं, अब स्टूडेंट्स को विषय समझने में ज्यादा वक्त लगता है।
    प्रोफेसर शिखा अग्रवाल का कहना है, आज भी कई स्टूडेंट्स का झुकाव आईटी (इंफॉर्मेशन टेक्नोलॉजी) और सीएस (कम्प्यूटर साइंस) में हैं। लेकिन मैकेनिकल, सिविल इंजीनियरिंग और ईसी (इलेक्ट्रॉनिक एंड कम्युनिकेशन) की तरफ कम हुआ है। क्योंकि इन ब्रांचेस में प्राइवेट सेक्टर में नौकरियां लगभग ना के बराबर हैं। सरकरी नौकरी के लिए मेहनत और वक्त दोनों ही देना पड़ता है। इन दिनों नई ब्रांचेज जोड़ी जा रही हैं जैसे आर्टिफीशियलल इंटेलिजेंस। इस सेक्टर में अगले कुछ सालों में हजारों नौकरियां होंगी। इस वजह से बच्चों का रूझान इस ओर बढ़ा है।

  4. कितना बदलाव होना चाहिए

    प्रोफेसर डॉ. बी हनुमंथा राओ का कहना है आईआईटी में स्टूडेंट्स को कई अपॉर्चुनिटी मिलती है ताकि वे खुद को ग्रूम कर सकते हैं। अगर वो खुद कैंपस में होने वाली एक्टीविटीज में शामिल नहीं होते तो उन्हें ग्रूम करना मुश्किल हैं। कैंपस में हर स्टूडेंट्स को बेहतर से बेहतर फैसीलिटी मुहैया कराई जाती है। प्रेशर जैसी कोई चीज नहीं होती है। हम उन्हें यहां इंजीनियर बनाते हैं बाकी उन्हें यह बात समझने की जरूरत है कि वो खुद यहां क्यों हैं। आज युवा स्टार्टअप शुरू करना पसंद करते हैं जो अच्छी ही बात है। इंस्टीट्यूट में उन्हें इस तरह का माहौल मिलता है कि अपनी लाइफ में आराम की नौकरी करने की बजाए रिस्क लेना पसंद करते हैं।
    प्रोफेसर डॉ. बी हनुमंथा राओ कहते हैं, आज देश में कई सेक्टर्स हैं जहां अच्छे मौके मिल रहे हैं इसलिए वे अलग क्षेत्र में जा रहे हैं। लेकिन जिनका लक्ष्य इंजीनियर बनना है वो आज भी इंजीनिरिंग ही कर रहे हैं।

  5. इंजीनियरिंग लीडर पैदा करती है टेक्नोक्रेट नहीं

    सॉफ्टवेयर इंजीनियर शशांक रावत का कहना है, देश में ज्यादातर स्टूडेंट्स इंजीनियरिंग में एडमिशन तो ले लेते हैं लेकिन उस समय तक उन्हें सेलेबस तक की जानकारी नहीं होती। क्या बनना है ये तय करना जरूरी है। जैसे प्रोग्रामर बनना चाहते हैं तो बीसीए  या एमसीए करना जरूरी है। इंजीनियरिंग लीडर पैदा करती है टेक्नोक्रेट नहीं।
    मैकेनिकल इंजीनियर कार्तिकेय पांडेय का कहना है क्या बनना है पहले खुद से पूछें क्योंकि यह खुद से बेहतर कोई नहीं बता सकता। इंजीनियरिंग कोई युद्ध का मैदान नहीं जिसे छोड़कर नहीं जा सकते। करियर हमेशा अपनी पसंद का चुनना चाहिए।

COMMENT

आज का राशिफल

पाएं अपना तीनों तरह का राशिफल, रोजाना