चार दशक पुरानी तकनीक से 200 फीसदी तक बढ़ा चावल का उत्पादन, कभी वैज्ञानिकों ने किया था खारिज

4 वर्ष पहले
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  • पायलट प्रोजेक्ट बॉन रैट्चथानी के तहत कंबोडिया बॉर्डर पर 3 हजार से ज्यादा किसानों ने की बंपर पैदावार
  • प्रोजेक्ट का लक्ष्य कम पानी में अधिक और उन्नत धान की पैदावार करना
  • भारत की कर्नेल यूनिवर्सिटी के रिसर्च पेपर में इस तकनीक को बताया गया है फायदेमंद

लाइफस्टाइल डेस्क. करीब 4 दशक पहले विकसित की गई खेती की तकनीक से जर्मनी और थाइलैंड के किसान चावल की बंपर पैदावार कर रहे हैं। इस तकनीक को कभी वैज्ञानिकों ने बेकार बताते हुए खारिज कर दिया था आज इसकी मदद से चावल के उत्पादन में 200 फीसदी तक बढ़ोतरी हुई है और ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में कमी आई है। जर्मन व थाईलैंड सरकार और कुछ उद्योगपति इसे तकनीक को पायलट प्रोजेक्ट ‘बॉन रैट्चथानी’ के तौर पर इस्तेमाल कर रहे हैं।

1) कैसे काम करती है तकनीक

  • इस तकनीक की खोज जेसुइट प्रीस्ट हेनरी डी लालनी ने की थी। वह फ्रांस के रहने वाले थे लेकिन 1961 में मेडागास्कर चले गए और वहां के किसानों के साथ मिलकर कृषि उपज बढ़ाने के लिए काम किया। 
  • खेती के दौरान उन्होंने पाया कि सामान्य से कम बीज का इस्तेमाल करके और जैविक खाद का प्रयोग करने पर धान की पैदावार में बढ़ोतरी हुई। 
  • उन्होंने धान के खेत को हरदम पानी से नहीं भरा रखा। बीच-बीच में उसे सूखने भी दिया और पानी के कुल उपयोग का घटाकर आधा कर दिया। उन्होंने पाया कि इतना करने पर धान की फसल में 20 से 200 फीसदी तक की बढ़ोतरी हुई। खेती के दौरान पौधों को ज्यादा ऑक्सीजन मिली। इसे द सिस्टम ऑफ राइस इंटेंसिफिकेशन नाम दिया गया। 
  • साल 2000 में इसे मेडागास्कर के बाहर लाया गया लेकिन कुछ कृषि विशेषज्ञों ने इसे बेकार बताया। इसके बाद दुनिया के अलग-अलग हिस्सों और विभिन्न जलवायु में इसको और विकसित किया गया।
  • थाईलैंड के एक किसान क्रेउकेरा जुनपेंग ने 5 एकड़ एरिया में धान की फसल लगाई है। उनकी फसल लहलहा रही है। हर पौधे में 15 से ज्यादा डंठल निकले हैं और दाने भी वजनी हैं। वह बताते हैं कि वह 30 साल से खेती कर रहे हैं लेकिन ऐसी फसल कभी नहीं दिखी। जुनपेंग पायलट प्रोजेक्ट बॉन रैट्चथानी (Ubon Ratchathani) का हिस्सा हैं।
  • इसके तहत यह पता किया जा रहा है कि क्या कम पानी का इस्तेमाल करके अधिक धान पैदा किया जा सकता है। जुनपेंग के अलावा 3000 दूसरे किसान भी थाईलैंड का राइस बास्केट कहे जाने वाले कंबोडिया बॉर्डर पर इस तकनीक का इस्तेमाल करके खेती कर रहे हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि धान के खेत में लगातार पानी भरे होने से बड़ी मात्रा में मेथेन गैस उत्पन्न होती है। वर्ल्ड रिसोर्स इंस्टीट्यूट के मुताबिक, दुनिया भर में उत्पन्न होने वाली कुल ग्रीन हाउस गैसों में 1.5 फीसदी धान के खेत से निकलती हैं। इस पद्धति से खेती करने पर मेथेन का कम उत्सर्जन होगा। अगर दुनिया भर के सभी किसान इसे अपना लेते हैं तो ग्रीन हाउस गैसों का प्रभाव काफी कम हो जाएगा।

कॉर्नेल यूनिवर्सिटी में स्थित एसआरआई इंफॉर्मेशन सेंटर के मुताबिक सैकड़ों रिसर्च पेपर ने इस तकनीक को सही करार दिया है। अब तक 61 देशों के 2 करोड़ से ज्यादा किसान इस तकनीक को अपना कर फायदा उठा रहे हैं। साल 2011 में बिहार के रहने वाले सुमंत कुमार ने एक हेक्टेयर खेत में 22.4 टन धान का उत्पादन करके विश्व रिकॉर्ड बना दिया था।

  • कॉर्नेल यूनिवर्सिटी में वैश्विक कृषि के प्रोफेसर नॉर्मन उफोह कहते हैं कि इस तकनीक से उत्पादन और आय में लगातार बढ़ोतरी हो रही है। यही नहीं उर्वरकों और पानी के इस्तेमाल में कमी भी हो रही है और इस वजह से किसानों की लागत भी कम हो रही है।
  • अमेरिका स्थित वर्ल्ड नेबर्स नाम के ऑर्गनाइजेशन के साथ मिल कर एसआरआई (SRI) को प्रमोट करने वाले सृजन कार्की कहते हैं कि पारंपरिक तौर पर यह माना जाता है कि धान की पैदावार के लिए बहुत ज्यादा पानी की आवश्यकता होती है लेकिन ये सही नहीं है। धान कम पानी में भी पैदा किया जा सकता है।