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होली का विज्ञान / होलिका की परिक्रमा करने से खत्म होते हैं बैक्टीरिया और रंगों को देखने से दूर होते हैं राेग

Dainik Bhaskar

Mar 19, 2019, 03:23 PM IST


holi 2019 science behind holika dahan and parikrama and science of colors
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holi 2019 science behind holika dahan and parikrama and science of colors
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  • वैज्ञानिकों के मुताबिक, रंग मूड बूस्टर की तरह काम करते हैं, इजिप्ट और चीन में प्राचीन काल से रंगों से किया जाता रहा है इलाज
  • रंगों में हल्दी और नीम की पत्तियों का प्रयोग शरीर के लिए ब्यूटी पैक का करता है काम

लाइफस्टाइल डेस्क. बेशक होली रंगों और मस्ती का त्योहार है लेकिन इसका उतना ही जुड़ाव सेहत से भी है। होली परंपराओं पर विज्ञान कहता है कि यह त्योहार शरीर को स्वस्थ रखने के साथ वातावरण से मच्छर, बैक्टीरिया और कीटों को खत्म करने का काम करता है। होलिका दहन के दौरान परिक्रमा करने पर शरीर में मौजूद बैक्टीरिया का दम घुटने लगता है और अधिक तापमान के संपर्क में आने से ये खत्म होने लगती हैं। होली की परंपराओं और रंगों से सेहत का सीधा जुड़ाव है। जानिए क्या है इसका विज्ञान....

अबीर-गुलाल का स्किन से कनेक्शन

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    जीव वैज्ञानिकों के मुताबिक, प्राचीनकाल से अबीर-गुलाल को कुदरती चीजों से तैयार किया जाता रहा है। इसमें फूलों से लेकर मसालों का प्रयोग किया गया है। फूलों की प्रकृति और मसालों की एंटीसेप्टिक खूबी खासतौर पर स्किन के लिए फायदेमंद है। अबीर-गुलाल जब स्किन के रोमछिद्रों से शरीर में पहुंचता है तो त्वचा के रंग में इजाफा करने के साथ बेजान पर्त को हटाता है। नेचुरोपैथी विशेषज्ञ डॉ. किरन गुप्ता के मुताबिक, प्राकृतिक रंगों में प्रयोग हल्दी, पलास के फूल, नीम की पत्तियां, मक्के का आटा, चुकंदर का रस फेसपैक और स्क्रब की तरह काम करता है और शरीर में निखार आता है।

  2. होलिका दहन से बैक्टीरिया और कीटों का सफाया

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    वैज्ञानिकों के मुताबिक, होली के समय मौसम में बदलाव हो रहा होता है। धीरे-धीरे खत्म होती सर्दी और बढ़ती गर्मी के कारण वातावरण में बैक्टीरिया, कीट और मच्छरों की संख्या बढ़ती है। होलिका दहन के कारण अचानक वातावरण का तापमान तेजी से बढ़ने पर बैक्टीरिया और कीटों का दम घुटने लगता है। इनकी संख्या में तेजी से कमी आती है। होलिका दहन के दौरान परिक्रमा करने से बॉडी में मौजूद जीवाणु खत्म होने लगते हैं।

  3. रंगों का विज्ञान : लाल रंग से दर्द और नारंगी से अस्थमा का इलाज

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    वैज्ञानिकों का कहना है होली में इस्तेमाल होने वाले अलग-अलग रंग एक थैरेपी की तरह काम करते हैं। कई तरह के रंग शरीर और दिमाग को संतुलित रखते हैं। साथ ही यह आपके दिमाग को बूस्ट करते हैं। इसे देखने पर शरीर में हार्मोन और रसायन रिलीज होते हैं जो रोगों से राहत दिलाते हैं। वर्तमान में रोगों को खत्म करने वाली कलर थैरेपी भी इसी खूबी का ही हिस्सा है वहीं इजिप्ट और चीन में इसका इस्तेमाल प्राचीन समय से इलाज के तौर पर किया जा रहा है। जैसे…

    • लाल : यह रंग गर्म प्रकृति का होने के कारण दर्द के इलाज के लिए बेहतर माना गया है। यह एड्रिनेलिन हार्मोन को बढ़ावा देता है। अनिद्रा, कमजोरी और रक्त से जुड़े रोगों में राहत देता है। 
    • पीला : यह रंग मानसिक उत्तेजना के साथ नर्वस सिस्टम को मजबूत बनाता है। यह पेट और स्किन के साथ मांसपेशियों को भी स्ट्रेंथ देता है। पेट खराब होने और खाज खुजली के मामलों में पीला रंग फायदा पहुंचाता है।
    • हरा : यह प्रकृति के बेहद करीब होता है और आंखों को सुकून पहुंचाता है। हार्मोन को संतुलित रखने के साथ शरीर रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाता है। 
    • नीला : इसे ठंडा रंग माना जाता है और उच्च रक्तचाप को कम करने में मदद करता है। कलर थैरेपी में इसका इस्तेमाल सिरदर्द, सूजन, सर्दी और खांसी के उपचार में किया जाता है। 
    • नारंगी : यह रंग उत्साह को बढ़ाकर फेफड़ों को मजबूत बनाता है। इसलिए नारंगी रंग अस्थमा, ब्रॉन्काइटिस और किडनी इंफेक्शन के मामलों में उपयोगी साबित होता है। 
       

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