कहानी / जीवन के रंग



special story on holi festival
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special story on holi festival

Dainik Bhaskar

Mar 20, 2019, 12:53 PM IST

पंकज सुबीर

इसमें तो समय लगेगा ही लगेगा, आप क्यों चाह रहे हैं कि बस एक दिन में ही सब कुछ ठीक हो जाए।’ रीमा ने सृजन की ओर देखते हुए कहा। सृजन उसका पेशेंट है। रीमा डेंटिस्ट है और यह उसका क्लीनिक है। ‘तीन दिन बाद होली है मैम और मैं सब कुछ छोड़ सकता हूं लेकिन होली की हुड़दंग, खाना- पीना, मौज-मस्ती नहीं छोड़ सकता।’ सृजन ने कुछ उत्साह के साथ उत्तर दिया। ‘नो नो नो, इस बार नो होली, नो खाना-पीना। आपकी रूट कैनाल थैरेपी हो रही है। अभी मैं परमीशन नहीं दूंगी इसकी।’ रीमा ने बहुत धीमे से मुस्कराते हुए कहा। ‘इसीलिए तो कह रहा हूं मैम, आप मुझे दो दिन में इतना तो कर ही दीजिए कि मैं होली पर जमकर खा-पी सकूं। दोस्तों के साथ हुड़दंग में शामिल हो सकूं’, सृजन ने कहा। रीमा ने सृजन को देखा। बाईस-तेईस साल का अच्छा-ख़ासा युवक, ख़ूबसूरत, ज़हीन और संस्कारित। मगर कैसे बच्चों की तरह बात कर रहा है। सोचते ही रीमा को हंसी आ गई। ‘अरे, आप तो हंस रही हैं, मैंने जोक थोड़े ही सुनाया है।’ 

सृजन ने मुस्कराते हुए कहा। ‘मैं तो इस पर हंस रही हूं कि आप कैसे बच्चों की तरह बातें कर रहे हैं। होली को लेकर कितना एक्साइट हो रहे हैं। लगता है कि आपका बचपन गया ही नहीं है। इतना एक्साइट तो आजकल के बच्चे भी नहीं होते फेस्टिवल को लेकर।’ हंसते हुए ही उत्तर दिया रीमा ने। ‘आजकल के बच्चे भी कोई बच्चे हैं मैम, वो तो एकदम से बड़े हो जाते हैं। बचपन के बाद सीधे बड़े होते हैं, बीच में कुछ नहीं। मैं तो इसे अपने लिए कॉम्प्लीमेंट समझता हूं कि आपने मुझे बच्चा कहा।’ सृजन ने मुस्कराते हुए ही उत्तर दिया। ‘आप तो शायद होली नहीं मनाती होंगी मैम।’ रीमा को चुपचाप अपने काम में जुटा देख सृजन ने कहा। ‘मैं....? अब कहां और किसके साथ मनाई जाए होली। ज़िंदगी बहुत आगे निकल आई है। अब तो बस काम, काम, काम। बस यही होली है और यही दिवाली है।’ रीमा ने उसी प्रकार अपने काम में लगे हुए उत्तर दिया। 

सृजन को उसके पास आते हुए एक-डेढ़ महीना हो गया है। दो-तीन दांतों में समस्या है, इसलिए बार-बार आना पड़ता है। इसी कारण वह थोड़ा खुल गया है रीमा के साथ। सृजन आख़िरी पेशेंट के रूप में आता है, बिलकुल क्लीनिक बंद होने के समय। सृजन का स्वभाव ऐसा है कि वो किसी के साथ भी बहुत जल्दी फ्रेंडली हो जाता है। ‘ये तो आपका ग़लत सोचना है मैम, ज़िंदगी कहीं आगे नहीं निकलती। हम ही उसे छोड़कर आगे निकल जाते हैं। ज़िंदगी उसी जगह खड़ी हमारी राह देखती रहती है कि हम लौटेंगे और उसे जिएंगे मगर हम व्यस्त होते जाते हैं और फिर कभी नहीं लौटते।’ 

सृजन ने दार्शनिक के अंदाज़ में कहा। ‘कभी-कभी हम व्यस्त ख़ुद नहीं होते, हमें होना पड़ता है। कुछ ऐसा जिसे भूलना हो, जो बारबार याद आकर हमें परेशान करता हो, उसके कारण हमें व्यस्त होना पड़ता है। अभी आपने ज़िंदगी को बहुत कम देखा है, इसलिए आप ये किताबी बातें कर सकते हैं।’ रीमा ने कुछ ठहरे हुए स्वर में उत्तर दिया। कम से कम दस साल तो छोटा है ही सृजन उससे। रीमा के कहते ही सृजन चुप हो गया। आंखें बंद करके कुशन पर सिर टिका दिया। कुछ देर के लिए ख़ामोशी छा गई। रीमा भी चुपचाप फिलिंग मटेरियल तैयार करती रही। ‘कौन था मैम?’ सृजन ने सिर टिकाए-टिकाए ही बहुत संक्षिप्त सा प्रश्न किया। ‘कौन...?’ रीमा ने प्रश्न के उत्तर में प्रश्न किया। ‘वही जिसे आप भूलना चाहती हैं, और इतना व्यस्त हो रही हैं कि अपनी ज़िंदगी भी नहीं जी पा रही हैं।’ सृजन ने बिना आंखें खोले ही अपने प्रश्न को थोड़ा खोलकर कहा। ‘होता है... कोई न कोई तो हम सबके जीवन में होता है, जिसे हम भूलना चाहते हैं।’ 

रीमा ने अपने बनाए दायरे में आ रहे सृजन को जान-बूझ कर थोड़ी लिबर्टी दी। ‘भूलना चाह रही हैं तो भूल क्यों नहीं पा रही हैं, ऐसा क्या मुश्किल हो रहा है। क्या जिसे भूलना चाह रही हैं, वह भूलने लायक़ नहीं है। अगर नहीं है तो उसे बिलकुल मत भुलाइए।’ सृजन ने बिना आंखें खोले कहा। ‘नहीं वो भूलने लायक़ ही है।’ रीमा ने संक्षिप्त सा उत्तर दिया। ‘तो फिर मुश्किल क्या है, भूलिए उसे और लौट आइए अपनी ज़िंदगी में। उसके चक्कर में इसे क्यों ख़राब कर रही हैं।’ सृजन ने कहा। रीमा ने कोई उत्तर नहीं दिया। ‘आप को देखकर लगता है कि आप बहुत शरारती रही हैं और आपने बहुत हंगामे के साथ होलियां खेली हैं।’ 

सृजन ने रीमा को चुप देखकर कहा। ‘अरे, आपको कैसे पता चला?’ रीमा हैरत में पड़ गई। ‘आपकी उंगलियां प्रकृति प्रेमी की उंगलियों जैसी हैं। और जो प्रकृति प्रेमी होते हैं, होली तो उनका ही त्योहार होता है।’ सृजन ने उत्तर दिया। ‘मैम, जब हम किसी के कारण परेशान होकर, दुखी होकर अपने आप को एक दायरे में बांध लेते हैं, तो असल में उल्टा करते हैं। हमें तो और ज़्यादा नाचना-कूदना चाहिए। ख़ूब मौज-मस्ती करनी चाहिए कि उस मनहूस से हमें छुटकारा मिला।’ सृजन ने रीमा को चुप देखा तो कहा। ‘इन्ट्रेस्टिंग...।’ रीमा ने ड्रिल को अपनी जगह पर रखते हुए कहा। ‘और ये जो होली का त्योहार आता है न, ये आता ही इसलिए है कि छोड़ो सब मनहूसियत और जी लो ज़िंदगी। मगर देखिए न आजकल तो सब इस त्योहार से भागते हैं। घर में घुसे रहते हैं।’ 

सृजन ने कुछ नाराज़गी के स्वर में कहा। ‘मैं उसको भूलना तो बहुत चाहती हूं, पर भुला नहीं पाती। उसने जो कुछ किया वो...’ रीमा ने बात को बीच में ही छोड़ दिया। ‘उसका तो दो तरफ़ा ही फ़ायदा है मैम, जब तक आपके साथ था, तब भी आपको दुखी रखता था और ख़ुद मज़ेकरता था। और अब जब आपका और उसका साथ छूट गया तब भी वो तो कहीं न कहीं ख़ुश ही होगा और आप यहां सूमड़ी बनी फिर रही हैं।’ सृजन ने कहा। ‘सूमड़ी... इसका क्या मतलब होता है?’ रीमा ने पूछा। ‘इसका मतलब होता है फीमेल मनहूस, मेल मनहूस को सूमड़ा कहा जाता है।’ 

सृजन ने कहा। ‘छोड़िए उस एक याद को और लौट आइए अपनी ज़िंदगी में। दो दिन बाद होली का त्योहार है, कूद पड़िए रंगों में, रंग आपका इंतज़ार कर रहे हैं। ज़िंदगी आपके लिए उसी मोड़ पर रुकी इंतज़ार कर रही है।’ ‘इच्छा तो मेरी भी यही होती है, लेकिन एक याद जैसे मन के किसी कोने में जम गई है। वहां से हट ही नहीं रही है। उसने जो कुछ किया, वो उसकी फ़ितरत थी, लेकिन सच ये है कि मैंने तो उसे बहुत चाहा था, बहुत टूटकर चाहा था।’ रीमा का स्वर एकदम उदास हो गया। सृजन चुप रहा। ‘कैसे अपने आप को निकालूं उस सब से बाहर? हर बार वही सब याद आता है और मन बहुत गहरे तक उदास हो जाता है। डूब जाता है।’ रीमा के स्वर में कंपन है और उदासी-सी गहरे तक घुल गई है उसकी आवाज़ में। ‘मैम, आप रूट कैनाल थैरेपी में क्या करती हैं? पहले ड्रिल करके दांत के क्राउन के बाहर के हार्ड इनेमल को तोड़ती हैं, फिर अंदर जो सड़ चुका पल्प जमा है उसे पानी की तेज़ धार से निकाल देती हैं। फिर उसके बाद वहां पर दूसरा फिलिंग मटेरियल भर देती हैं और फिर ऊपर से क्राउन पर कैप लगाकर सील कर देती हैं।’ सृजन ने आंखें बंद किए-किए ही कहा। ‘हां यहीं करती हूं...।’ रीमा ने उत्तर दिया। ‘यही जीवन में भी कीजिए। ड्रिल कीजिए, तोड़िए और फिर तेज़ धार से जो सड़ा हुआ पल्प जमा है उसे निकाल बाहर कीजिए। जब पूरा साफ़ हो जाए तो अंदर फिलिंग मटेरियल भरकर पैक कर दीजिए। और आख़िर में कैप लगा कर बंद कर दीजिए। आप ने ख़ुद यह प्रोसीजर मुझे समझाया था पहले दिन, और आप ख़ुद ही इसे समझ नहीं पा रही हैं। आप ही ने कहा था कि जो सड़ चुका है उसे निकालना ही पड़ेगा, उसके निकले बिना दर्द ठीक नहीं होगा। सड़े हुए पल्प से दर्द और इंफेक्शन दोनों का ख़तरा होता है।’ इस बार सृजन ने आंखें खोलकर रीमा की आंखों में आंखें डालकर कहा। रीमा आश्चर्य से देख रही थी सृजन को, जो कितनी आसानी से उसके ही पेशे की फ़िलॉसफ़ी उसे ही समझा रहा था। वह फ़िलॉसफ़ी जो वह आज तक समझ ही नहीं पाई थी। 

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