झारखंड / लिव इन रिलेशन का सच : गांव में अंतिम संस्कार पर भी पाबंदी, महिलाओं को कहा जाता है ‘ढुकनी’



मजबूरी देखिए... मां-बाप और बेटे-बहू ने साथ की शादी। मजबूरी देखिए... मां-बाप और बेटे-बहू ने साथ की शादी।
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मजबूरी देखिए... मां-बाप और बेटे-बहू ने साथ की शादी।मजबूरी देखिए... मां-बाप और बेटे-बहू ने साथ की शादी।

  • ग्राउंड रिपोर्ट : 3 महीने में 3 जिलों के 10 गांवों में 120 जोड़ों से मिली भास्कर टीम, 10 ने कैमरे पर सुनाई दर्द की कहानी
  • दावत नहीं दे सकते इसलिए 2 लाख से अधिक आदिवासी जोड़े लिव-इन में रहने को मजबूर
  • जनजातीय मामलों के केंद्रीय मंत्री अर्जुन मुंडा क्या ऐसे जोड़ों को अधिकार दिलाएंगे
  • बिनोदरी-वीरेंद्र उरांव : बिनोदरी-वीरेंद्र 4 साल से मनातू में हैं। जनवरी 2019 में शादी की
  • सहोदरी देवी : नितेश्वर की मां, जो 27 साल बाद रामलाल मुंडा से शादी की
  • अरुणा मुंडा-नितेश्वर मुंडा : नितेश्वर-अरुणा तीन साल साथ रहे अपने मां-पिता के साथ शादी रचाई
  • चेतू उरांव- करमी उरांव : मनातू के चेतूू- करमी पांच साल से साथ हैं, संस्था ने उनकी शादी कराई

Dainik Bhaskar

Jun 23, 2019, 11:46 AM IST

रांची. मेट्रो शहरों में लिव-इन रिलेशनशिप भले एक फैशन की तरह पनपा हो, मगर झारखंड के आदिवासी समाज में ये बरसों पहले से मौजूद है...हालांकि ये यहां प्रथा नहीं, एक सजा है। विडंबना ये है कि बड़े शहरों से शुरू हुई कानूनी लड़ाई में सुप्रीम कोर्ट ने तो लिव-इन रिलेशनशिप को वैधता दे दी, लेकिन राज्य के खूंटी, गुमला, सिमडेगा जैसे आदिवासी बहुल शहरों में लिव-इन रिलेशन में रह रहे जोड़े आज भी सामाजिक बहिष्कार का शिकार हैं। 


दरअसल, आदिवासी समाज का ये नियम है कि शादी के समय पूरे गांव व रिश्तेदारों को दो वक्त की दावत देनी होती है। मीट-भात खिलाना होता है, हंड़िया-दारू पिलानी पड़ती है। खर्च करीब एक लाख रुपए तक आता है...और जो जोड़े ये नियम पूरा नहीं कर पाते उनके विवाह को समाज मान्यता नहीं दे पाता। चौंकाने वाली ये रस्म नहीं, बल्कि इसके भुक्तभोगियों का आंकड़ा है। आदिवासी समाज के बीच काम करने वाली संस्थाओं के मुताबिक यहां ग्रामीण क्षेत्रों में रह रहे विवाहित जोड़ों का करी 6-7% यानी 2 लाख से ज्यादा जोड़े लिव-इन में ही रह रहे हैं। 


ऐसे जोड़ों का विवाह करने वाली संस्था निमित्त फाउंडेशन की सचिव निकिता सिन्हा को हमने इस रिपोर्ट के लिए बतौर एक्सपर्ट अपनी टीम में शामिल किया। उनके साथ हमारी टीम 3 जिलों के 10 गांवों में गई। ऐसे करीब 120 जोड़ों से बात की। समाज के डर से ज्यादातर जोड़े तो बात करने के लिए भी तैयार नहीं थे। 50 जोड़ों ने बात तो की, मगर सिर्फ 10 ही कैमरे के सामने बात करने को तैयार हुए। इन जोड़ों ने बताया कि सिर्फ शादी की दावत न दे पाने की वजह से इन्हें सामाजिक बहिष्कार झेलना पड़ता है। गांव में किसी कार्यक्रम में वे शामिल नहीं हो सकते, महिलाओं को मंुडारी-संथाली में ढुकू या ढुकनी कहा जाता है। ढुकनी का अर्थ है-बिना शादी के घर में पुरुष के साथ घुसना या रहना। 


ऐसे जोड़ों के बच्चों को पैतृक संपत्ति में अधिकार नहीं मिलता। मरने के बाद समाज के अंतिम संस्कार स्थल पर इन्हें दफनाने भी नहीं दिया जाता। आदिवासी बहुल जिले खूंटी से सांसद बने अर्जुन मुंडा को जनजातीय मामले का केंद्रीय मंत्री बनाए जाने के बाद से ऐसे जोड़ों में उम्मीद जगी है कि वे ‘ढुकनी’ बनी महिलाओं के आंसू पोछेंगे। पुरुषों को सम्मान और उनके बच्चों को अधिकार मिलेगा।

 

संस्था ने लिव-इन जोड़ों का विवाह करवाया...गांव ने किया अमान्य

गुमला के मनातू गांव में एक ऐसा परिवार है, जिसकी दो पीढ़ियां लिव इन में रही। मजबूरी में जकड़े बाप-बेटे को एक साथ शादी करनी पड़ी। रामलाल मुंडा कोलकाता नगरपालिका में काम करते हैं। 27 साल पहले उन्होंने सहोदरी देवी के साथ रहना शुरू किया था। गांव को भोज-भात नहीं करा सके तो पैसा कमाने कोलकाता चले गए। उनके तीन बेटे हैं। बच्चे बड़े हुए तो उनकी शादी में परेशानी आने लगी। ऐसे में बड़े बेटे नितेश्वर ने अरुणा मुंडा के साथ बिना शादी रहना शुरू कर दिया। वह तीन साल से लिव इन में था। रांची में 14 जनवरी 2019 को सामूहिक विवाह कार्यक्रम में पिता रामलाल ने सहोदरी देवी और बेटे नितेश्वर ने अरुणा से शादी की। ग्रामीणों ने उनकी शादी को नहीं माना। कहा-बिना मीट-भात, हंड़िया खिलाए-पिलाए मान्यता नहीं मिलेगी।

 

बिन पैसों के यहां प्यार गुनाह, सजा भी कठोर

महिलाओं को सजा : चूड़ी-सिंदूर की मनाही
सिंदूर नहीं लगा सकती हैं। लोहे या लाह की चूड़ियां नहीं पहन सकतीं। वे पूजा-पाठ में शामिल नहीं हो सकतीं। गांव के मर्द और महिलाएं उन्हें गिरी हुई नजरों से देखती हैं। गांव की अौरतों से हंसने-बोलने पर भी पाबंदी रहती है।

 

मर्दों की पीड़ा : गांव वालों का बहिष्कार
सामाजिक बहिष्कार का सामना करना पड़ता है। किसी के घर शादी-संस्कार, पूजा-त्योहार में नहीं जा सकते। अपने घर भी जाने पर रोक रहती है। भोज-भात दिए बिना शादी कर ली तो माता-पिता, भाई-बहन भी अलग कर देते हैं। 

 

बच्चों का दर्द : पैतृक संपत्ति से होते हैं बाहर  
बच्चों को पैतृक संपत्ति में हिस्सा नहीं मिलता है। बच्चियों की कानछेदनी की रस्म नहीं होती। बड़े होने पर बच्चों की शादी नहीं होती। गांव के बच्चे भी उन्हें ताना देते हैं। उनके संग खेल नहीं सकते। स्कूलों में पढ़ने-लिखने में दिक्कत होती है। 

 

अंत भी दुखद : मौत के बाद भी सम्मान नहीं
लिव इन में रहने के दौरान जोड़े में से किसी की मौत हो जाए तो उन्हें गांव में दो गज जमीन नहीं मिलती। शव को गांव के सार्वजनिक कब्रगाह से अलग बाहर दफनाया जाता है। कब्र पर पारंपरिक पत्थलगढ़ी करने की मनाही होती है। 

 

खूंटी, सिमडेगा व लोहरदगा के 10 गांवों में 358 जोड़े लिव-इन में रहने को मजबूर हैं। रांची में 2018-2019 में लिव इन में रहने वाले 175 जोड़ों की शादी कराई गई थी। मगर फिर भी समाज में इनकी शादी मान्य नहीं है। हमारी टीम 3 महीने में ऐसे 120 जोड़ों से मिली। समाज बहिष्कार का डर ऐसा कि कैमरे के सामने बात करने के लिए 10 जोड़े ही तैयार हुए।

 

09 गांवों में लिव-इन रिलेशन में रहने वाले जोड़ों की संख्या

बसिया 182
घाघरा 40
गुमला 25
पालकोट 25
मनातू 11
सिमडेगा 07
चटकपुर 24
तोरपा 24
खूंटी 20
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