दिव्यांग दिवस / ये रुके नहीं, थके नहीं और दुनिया को बताया दिव्यांगता आगे बढ़ने से नहीं रोक सकती

Dainik Bhaskar

Dec 03, 2018, 11:35 AM IST



world disabled day 2018 achiever and inspirational divyang
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लाइफस्टाइल डेस्क. आज दिव्यांग दिवस (वर्ल्ड डिसेबिलिटी डे) है। साल 1992 से संयुक्त राष्ट्र द्वारा शुरू हुए इस दिवस का लक्ष्य दिव्यांगता को सामाजिक कलंक मानने की धारणा से लोगों को दूर करने के साथ उनके अधिकारों की रक्षा करना है। असल जिंदगी के कुछ ऐसे हीरो भी हमारे बीच हैं जो दिव्यांग होने के बाद भी थके नहीं, हारे नहीं। उन्होंने ऐसे उदाहरण पेश किए जो सामान्य इंसान के लिए भी नामुमकिन सा है। दिव्यांग दिवस के मौके पर जानिए ऐसी ही शख्सियतों के बारे में जिन्होंने खुद को संभाला, लक्ष्य हासिल किया और दूसरों के लिए प्रेरणा बने।


 

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स्मीनू जिंदल : 11 साल में खोए पैर, आज अपनी कंपनी की MD हैं 

  • जिंदल फैमिली से रिश्ता रखने वाली स्मीनू उन दिव्यांगों के लिए आदर्श हैं जो जिंदगी अपनी तरह से जीना चाहते हैं। स्मीनू ने अपनी विकलांगता को अवसर माना और अपनी ऐसी पहचान बनाई कि आज उनकी व्हीलचेयर खुद को लाचार समझती है। 
  • आज स्मीनू जिंदल ग्रुप की कंपनी जिंदल सॉ लिमिटेड की एमडी हैं। उनका ‘स्वयं’ एनजीओ भी है। स्मीनू जब 11 साल की थीं, तब जयपुर के महारानी गायत्री देवी स्कूल में पढ़ती थीं। छुट्टियों में दिल्ली वापस आ रही थीं, तभी कार एक्सीडेंट हुआ और वह गंभीर स्पाइनल इंजरी की शिकार हो गई। हादसे के बाद उनके पैरों ने काम करना बंद कर दिया और व्हीलचेयर का सहारा लेना पड़ा। 
  • स्मीनू बताती हैं, अपने रिहेबिलटेशन के बाद जब मैं इंडिया वापस आई तो काफी कुछ बदल चुका था। लोग बेचारगी की नजर से देखते थे। मैंने मायूस होकर पिताजी से कहा था कि मैं स्कूल नहीं जाऊंगी, पर पिताजी ने जोर देकर मुझसे कहा कि तुम्हें अपने बहनों की तरह ही स्कूल जाना पड़ेगा। आज मेरे पति और बच्चों के लिए भी मेरी विकलांगता कोई मायने नहीं रखती। 
  • स्मीनू कहती है- आपको आपका काम स्पेशल बनाता है न कि आपकी स्पेशल कंडीशन। मेरे जैसे जो भी लोग हैं, उन्हें यही कहूंगी- खुद की अलग पहचान बनाने के लिए अपनी कमी को आड़े न आने दें, यही कमी आगे चलकर आपकी बड़ी खासियत बन जाएगी। स्मीनू का एनजीओ ‘स्वयं’ आज NDMC, ASI, DTC और दिल्ली शिक्षा विभाग के साथ मिलकर कई काम कर रहा है।
     
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जेसिका कोक्स : हाथों से नहीं, पैरों से हवा में उड़ान भरती हैं

  • अमेरिका के एरिज़ोना में जन्मी और वहीं रहने वाली जेसिका कोक्स (32) जन्म से अपंग हैं। उनके दोनों हाथ नहीं थे, इसके बावजूद वह पायलट है। बिना हाथों वाली वह दुनिया की पहली पायलट है, जो हाथों से नहीं, पैरों से प्लेन उड़ाती हैं। 
  • लेकिन यह कमजोरी ही उनकी ताकत बनी। आज जेसिका वो सभी काम कर सकती हैं और करती हैं, जो आम लोग भी नहीं कर पाते। उनके पास ‘नो रिस्टिक्शन’ ड्राइविंग लाइसेंस है। जिस विमान को जेसिका उड़ाती है उसका नाम ‘एरकूप’ है। जेसिका के पास 89 घंटे विमान उड़ाने का एक्सपीरियंस है।
  • जेसिका डांसर भी रह चुकी हैं और ताइक्वांडो में ब्लैक बेल्ट भी हैं। वे 25 शब्द प्रति मिनट से टाइपिंग भी कर सकती हैं। जेसिका पर एक डॉक्युमेंटरी भी बन चुकी हैं ‘राइट फुटेड’ जिसे डायरेक्ट किया है एमी अवार्ड विनर ‘निक स्पार्क’ ने।

 

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ली जुहोंग  : बचपन में पैर खोए, फिर भी डॉक्टर बनीं, अब इलाज करने रोज करती है पहाड़ पार

  • चीन के चांगक्वींग की रहने वाली ली जुहोंग जब 4 साल की थीं तो एक रोड एक्सीडेंट दोनों पैर गंवाने पड़े। बावजूद इसके उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। पढ़ाई पूरी की और डॉक्टर बन कर आज पहाड़ी गांव में क्लीनिक खोलकर लोगों की सेवा कर रही है। 

  • 1983 में एक ट्रक ने ली को टक्कर मार दी। दोनों पैर बुरी तरह जख्मी हो गए थे।

  • डॉक्टरों ने ऑपरेशन कर जूहोंग के दोनों पैर घुटने के ऊपर से काट दिए। ठीक होने के बाद होंगजू ने लकड़ी के स्टूल के सहारे चलना सीखा। शुरुआत में उन्हें काफी दर्द हुआ।  एक बार लगा कि वह चल नहीं पाएंगी। मगर जुहोंग ने हिम्मत नहीं हारी। आठ साल की उम्र में चलना सीख लिया। इसके बाद फिर से स्कूल जाना शुरू किया। 2000 में स्पेशल वोकेशनल स्कूल में मेडिकल स्टडी के लिए एडमिशन लिया और डिग्री हासिल की। इसके बाद गांव वालडियन में क्लीनिक खोलकर ग्रामीणों का इलाज शुरू किया।  जुहोंग इमरजेंसी कॉल आने पर मरीज को घर पर भी देखने जाती हैं। उन्हें अक्सर ऊंचे-नीचे रास्तों से जाना होता है।
  • क्लीनिक खोलने के कुछ दिनों बाद ही होंगजू की शिंजियान से मुलाकात हुई। दोनों में प्यार हुआ और फिर शादी कर ली। शिंजियान ने नौकरी छोड़कर घर की पूरी जिम्मेदारी संभाली। शिंजियान पीठ पर बैठाकर जुहोंग को क्लीनिक तक छोड़ने जाते हैं। ली अब तक 1000 से अधिक लोगों का इलाज कर चुकी हैं।

 

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अरुणिमा सिंहा: पहली महिला दिव्यांग पर्वतारोही

  • आंबेडकर नगर के एक छोटे से मकान में रहने वाली अरुणिमा का एक ही लक्ष्य था, भारत को वॉलीबॉल में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाना। छठी कक्षा से ही वे इसी जूनून के साथ पढ़ाई कर रही थीं। समाजशास्त्र में स्नातकोत्तर और कानून की डिग्री लेने के साथ अरुणिमा राष्ट्रीय स्तर की वॉलीबॉल खिलाड़ी के रूप में पहचान बनाने की कोशिशों के बीच एक घटना ने इनकी जिंदगी बदल दी। 

  • 11 अप्रैल, 2011 को पद्मावत एक्सप्रेस से लखनऊ से नई दिल्ली जा रही थीं कि बरेली के पास कुछ लुटेरों ने लूटपाट में नाकाम रहने पर उन्हें चलती गाड़ी से नीचे फेंक दिया। इस हादसे में अरुणिमा का बायां पैर ट्रेन के पहियों के नीचे आ गया। इस घटना ने अरुणिमा को शारीरिक और मानसिक तौर पर तोड़ कर रख दिया  था  लेकिन हार नहीं मानी। 

  • चार माह एम्स में इलाज के बाद अस्पताल से बाहर निकलीं और लक्ष्य तय किया विश्व की सबसे ऊंची चोटी एवरेस्ट को फतह करने का। कटा हुआ बायां पैर, दाएं पैर की हड्डियों में पड़ी लोहे की छड़ और शरीर पर जख्मों के निशान के साथ एवरेस्ट पर चढ़ने वाली पहली भारतीय महिला पर्वतारोही बछेंद्री पॉल से मिलने जमशेदपुर जा पहुंचीं। 
  • पॉल ने पहले तो अरुणिमा की हालत देखते हुए उन्हें आराम करने की सलाह दी लेकिन उनके बुलंद हौसलों के आगे आखिर वे भी हार मान गईं। अरुणिमा ने पॉल की निगरानी में नेपाल से लेकर लेह, लद्दाख में पर्वतारोहण के गुर सीखे और 1 अप्रैल, 2013 को उन्होंने एवरेस्ट की चढ़ाई शुरू की। 53 दिनों की बेहद दुश्वार पहाड़ी चढ़ाई के बाद आखिरकार 21 मई को वे एवरेस्ट की चोटी फतह करने वाली विश्व की पहली महिला विकलांग पर्वतारोही बन गईं।  
  • वे अब तक अफ्रीका की किलिमंजारो और यूरोप की एलब्रुस चोटी पर तिरंगा फहरा चुकी हैं। अरुणिमा ने केवल पर्वतारोहण ही नहीं, आर्टीफीशियल ब्लेड रनिंग में भी अपनी धाक जमाई है। वे उन्नाव के बेथर गांव में शहीद चंद्रशेखर आजाद खेल अकादमी और प्रोस्थेटिक लिंब रिसर्च सेंटर के रूप में अपने सपने को आकार देने में भी जुटी हैं। इस असाधारण काम के लिए उन्हें भारत सरकार ने पदमश्री अवॉर्ड से नवाजा।
     

 

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