अंतराष्ट्रीय परिवार दिवस आज:सलैया गांव में चार पीढ़ियों से एक साथ है 75 सदस्यों का परिवार

औरंगाबाद10 दिन पहलेलेखक: ओम प्रकाश सिंह
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एक साथ घर की महिलाएं व बच्चे । - Dainik Bhaskar
एक साथ घर की महिलाएं व बच्चे ।

इस आर्थिक युग में रिश्ते दरक रहे हैं। मां-बेटा, भाई-भाई और यहां तक की पति-पत्नी भी अब आपस में अलग हो रहे हैं, लेकिन एक परिवार ऐसा है, जो चार पीढ़ियों से एक छत के नीचे रह रहा है। सदस्यों की संख्या एक-दो नहीं, बल्कि चौंकाने वाला 75 है। साथ में खाना खाते हैं। साथ में दुख-सुख साझा करते हैं और साथ मिलकर समाज में समृद्धि की परिभाषा गढ़ रहे हैं।

पढ़कर आप हैरान हो रहे होंगे, लेकिन ये हकीकत है। ये चौंकने वाला यह परिवार जिले के सलैया गांव का है। भूतपूर्व एमएलसी शंकर दयाल सिंह के परिवार में बुजूर्ग से लेकर बच्चे तक आपस में खूब खेलते हैं। मजाक करते हैं और पढ़ाई से लेकर परिवार की तरक्की तक पर साथ में चर्चा करते हैं। परिवार में 10 महिला-पुरूष सरकारी नौकरियों में हैं।

जिनमें अधिकांश शिक्षा विभाग से जुड़े हैं। जबकि एक बैंक अधिकारी, एक झारखंड विधानसभा में प्रशाखा पदाधिकारी व हेल्थ विभाग के अधिकारी हैं। बाकी सदस्य व्यवसायी व राजनीति में अच्छे ओहदों पर हैं और समाज में अपनी सेवा दे रहे हैं। परिवार में सभी का सम्मान एक बराबर है। कोई बड़ा और कोई छोटा नहीं।

बजट के हिसाब से परिवार में प्यार नहीं मिलता। आपस में सभी एक हैं और यही इस परिवार की सबसे बड़ी ताकत। भूतपूर्व एमएलसी की पत्नी रिटायर्ड प्रिसंपल बुजूर्ग विजया देवी का कंट्रोल है। उनके एक इशारे पर पूरा परिवार खड़ा हो जाता है। चंद समय के लिए परिवार में मन-मुटाव भी हुआ ताे वे तत्काल दूर कराकर सभी को मिलवाती हैं।

एक साथ परिवार के पुरूष सदस्य,
एक साथ परिवार के पुरूष सदस्य,

इस घर में बारात के तरह रोजाना खाना पकता है
75 सदस्यों का बड़ा परिवार एक साथ रहता है। 40 से ज्यादा लोगों का खाना शहर में तो 20 से ज्यादा लोगों का खाना गांव में पकता है। इसमें भी अतिथि और नौकरों की संख्या अलग से बढ़ जाती है। इस घर में बारात के तरह रोजाना खाना पकता है। काम के लिए महिलाओं का अलग-अलग शिफ्ट तय है। जो महिलाएं नौकरी में हैं, वह रात में खाना पकाती हैं। जो घर पर रहती हैं, वह सुबह में। कुछ का दोपहर में शिफ्ट तय है। हर माह में कोई न कोई आयोजन होता है। शादी की सालगिरह या बर्थडे।

हर माह में एक दो आयोजन जरूर होता है। ऐसे मौकों पर महिलाओं का तय शिफ्ट रद्द हो जाता है। आयोजन के दिन सभी मिलकर समय से पहले काम निपटाती हैं। फिर जमकर पार्टी करती हैं।आपस में खुशियां बांटती हैं। यह परिवार समाज के लिए एक मिसाल की तरह है।

सीखने लायक- घर में सबका सम्मान बराबर, बजट मायने नहीं रखता
75 सदस्यों के इस परिवार में सबका सम्मान बराबर है। चाहे किसी की कमाई कितनी भी क्यों न हो? लेकिन वह घर में एक सदस्य के तरह है। परिवार में सम्मान के लिए बजट मायने नहीं रखता। राशन हो या सब्जी, या बच्चों की पढ़ाई या किसी सामान की खरीदारी। सब मिलकर खरीदते हैं। जिसके पास जितना फंड रहा, वह दे देता है।

हां, लेकिन परिवार के तरक्की और खर्च के लिए मासिक समीक्षा जरूर होता है। आमदनी को कैसे बढ़ाया जाए और परिवार के सुख सुविधा की कौन सी चीजों को खरीदा जाए, यह राय तय होती है। इसके बाद ही इसपर फैसला किया जाता है। जो परिवार काम नहीं करता है।

उसे आपसी राय मशविरा से उसको काम की जिम्मेवारी दी जाती है। फिलहाल घर में कोई भी सदस्य बिना काम का नहीं है। हालांकि शुरूआत से ऐसा कोई नहीं था।

परिवार में 45 बेडरूम का दो बड़ा मकान, काम के लिए 10 नौकर
भूतपूर्व एमएलसी शंकर दयाल सिंह का परिवार पैतृक गांव सलैया और शहर के बराटपुर में रहता है। पैतृक गांव में 20 लोगों का खाना पकता है। जबकिशहर में एक साथ 40 लोगों का खाना पकता है। अन्य 15 सदस्य देश के अलग-अलग शहरों में नौकरी और व्यवसाय के लिए रहते हैं। परिवारों के पास 45 बेडरूम का दो बड़ा मकान है। पैतृक गांव पर 25 बेडरूम का मकान है। जबकि औरंगाबाद शहर में 20 बेडरूम का घर है। घर के कामकाज और सफाई के लिए 10 नौकर हैं।

आने-जाने के लिए घर में 10 लग्जरी गाड़िया हैं। परिवार के सदस्य सह जदयू संगठन के रोहतास प्रभारी प्रभात रंजन उर्फ दीपक बताते हैं कि गाड़ियां अलग-अलग नहीं है। जो गाड़ी खाली रहता है। वह परिवार के कोई भी सदस्य लेकर जाता है। परिवार के छोटे सदस्य मदनपुर व्यापार मंडल अध्यक्ष पियूष रंजन उर्फ रिषु ने बताया कि घर में हर मेम्बर का पूरा सहयोग होता है। बजट मायने नहीं रखता। इसी परिवार से ताल्लुक रखने वाले शिक्षक अजिताभ रंजन उर्फ मनीष ने बताया कि सभी एक साथ बैठकर घर के सारी कार्य योजनाओं पर चर्चा करते हैं और फिर उसके हिसाब से कार्य किया जाता है।

परिवार की नींव शंकर दयाल सिंह ने मजबूत की
भूतपूर्व एमएलसी शंकर दयाल सिंह पूरे परिवार को एक सूत्र में बांधे। परिवार की महत्व को समझाया। वे शहर के गेट स्कूल में प्रिंसिपल थे। सिद्धांत के पक्के। डीएम को भी बिना अनुमति स्कूल में प्रवेश करने से रोका था। समझिए अनुशासन के कितने कड़े थे। 1996 में वे छोटा नागपुर से निर्दलीय एमएलसी रहे। आठ साल तक समाज की सेवा की, लेकिन परिवार के लिए अकूत दौलत नहीं खड़ा की। क्योंकि वे परिवार को ही पूंजी मानते थे।

2014 में उनका निधन हो गया। उनकी पत्नी विजया देवी रिटायर्ड प्रिंसिपल हैं। वो बताती हैं कि पति के पिता दो भाई थे। वे दोनों अपने जीवन में नहीं बंटे। शंकर दयाल सिंह चार भाई थे। जबकि उनके चाचा के दो लड़के थे। सभी भाईयों को भूतपूर्व एमएलसी ने समझाया कि जब पिता नहीं बंटे तो हम क्यों बंटेंगे। उनका गांव नक्सलियों की गढ़ में थी। गांव में नक्सलियों का आतंक था।

यह परिवार मजबूती के साथ एकजुट रहा। जिसके कारण नक्सली उनका कुछ बिगाड़ नहीं पाए। उनकी अगली पीढ़ी में भी उनके बच्चे साथ रह रहे हैं। पूरे परिवार का कंट्राेल भूतपूर्व एमएलसी के पत्नी विजया देवी के पास है। घर के सारे सदस्य उनका आदर करते हैं। अगर किसी में जरा सा खटपट हो तो तत्काल घर में ही पंचायत लगाकर समझाती हैं और गला लगाकर मिलाती हैं। वो बताती हैं कि मेरे घर में 15 बहुए हैं।

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