मुंगेर में नमक बनाकर अंग्रेजों को ललकारा:ब्रिटिशर्स ने रोकना चाहा तो खौलती कड़ाही में लेट गए थे श्रीकृष्ण सिंह

बेगूसराय2 महीने पहलेलेखक: शंभू नाथ

बेगूसराय से 35 KM दूर एक गांव है गढ़पुरा। ये वही जगह है, जहां नोनिया मिट्‌टी से नमक बनाकर श्रीकृष्ण सिंह ने अंग्रेजों के नमक कानून का विरोध किया था। यहां एक इमारत है जिसकी बेरंग होती दीवारें खस्ताहाल बयां कर रही हैं। इस पर लिखा है श्रीकृष्ण स्मारक स्थल। मुंगेर से पहले हाइवे की सरपट सड़क और फिर गांव की उबड़-खाबड़ और संकरी सड़कों से लगभग 80 KM यात्रा कर दैनिक भास्कर यहां पहुंचा। पढ़िए किस हालत में है आजादी के दीवाने का स्मारक और उनका गांव...

स्मारक स्थल के मेन गेट से अंदर एंट्री करने पर श्रीकृष्ण सिंह की एक सफेद संगमरमर की आदमकद प्रतिमा है। इसके अलावा इस बिल्डिंग में एक मल्टीपरपज हॉल है। गांव से अलग खेत में बने इस भवन को देख कर कहीं से ऐसा प्रतीत नहीं होता है कि इसी जगह पर कभी देश की स्वाधीनता संग्राम की एक ऐतिहासिक घटना हुई थी। इमारत की बाउंड्री पर नमक बनाने की नक्काशी जरूर है लेकिन दूर-दूर तक इस स्मारक स्थल की जानकारी नहीं दी गई है।

स्मारक स्थल पर बनी श्रीकृष्ण सिंह प्रतिमा।
स्मारक स्थल पर बनी श्रीकृष्ण सिंह प्रतिमा।

श्रीकृष्ण सिंह के साथ नमक बनाने वाले एक ग्रामीण के वंशज रमेश महतो कहते हैं ये भवन बन तो जरूर गया है लेकिन यहां श्री बाबू अभी भी कैद में हैं। यहां हर किसी को एंट्री की अनुमति नहीं है। मुंगेर भवन निर्माण की तरफ से कहा जाता है कि भले इस भवन का उद्घाटन हो गया हो लेकिन इसका हैंडओवर तक नहीं किया गया है।' यह पूछने पर कि क्या आप लोगों ने कभी सरकार से इस संबंध में बात करने की कशिश की। इस पर वो कहते हैं बाबा (श्री बाबू) ताउम्र अपने चुनाव में प्रचार नहीं किए और चुनाव जीतते रहे। ऐसे में हम उनके आदर्शों का उल्लंघन कर उनके लिए सरकार से कुछ कैसे मांग सकते हैं।

डॉ. श्रीकृष्ण सिंह ने 17 अप्रैल 1930 में अपने सहयोगियों के साथ मुंगेर से गढ़पुरा की यात्रा की थी।
डॉ. श्रीकृष्ण सिंह ने 17 अप्रैल 1930 में अपने सहयोगियों के साथ मुंगेर से गढ़पुरा की यात्रा की थी।

नोनिया मिट्‌टी से नमक बनाना प्रारंभ किया था

दरअसल, स्वाधीनता की लड़ाई में एक अहम पड़ाव नमक आंदोलन है। जब महात्मा गांधी के आह्वान पर देश भर में फिरंगियों के नमक कानून को भंग किया गया था। महात्मा गांधी का यह आंदोलन दांडी के किनारे से निकलकर गांव-गांव तक पहुंच गया था। बिहार में इसका नेतृत्व बिहार केसरी डॉ. श्रीकृष्ण सिंह ने किया। उन्होंने 17 अप्रैल 1930 में अपने सहयोगियों के साथ मुंगेर से गढ़पुरा की यात्रा प्रारंभ की।

100 KM की पैदल यात्रा कर 20 अप्रैल 1930 को यहां पहुंचे और स्थानीय ग्रामीणों के साथ मिलकर नोनिया मिट्‌टी से नमक बनाना प्रारंभ कर दिया। जब अंग्रेज के सिपाही इस नमक को नष्ट करने आए तो उन्होंने खौलते कड़ाहे में अपना शरीर दे दिया। इस घटना के बाद महात्मा गांधी ने श्रीकृष्ण सिंह को बिहार का प्रथम सत्याग्रही का दर्जा दिया था।

श्री बाबू के परपोते निशांत सिन्हा के अनुसार, यहां देश के सभी बड़े नेता आ चुके हैं।
श्री बाबू के परपोते निशांत सिन्हा के अनुसार, यहां देश के सभी बड़े नेता आ चुके हैं।

80 साल तक किसी सरकार की नहीं गई नजर
पिछले 10 वर्षों से श्रीकृष्ण सिंह की तर्ज पर ही हर साल यात्रा निकालने वाले सत्याग्रह गौरव यात्रा समिति के राजीव कुमार ने बताया कि 2011 तक इस ऐतिहासिक स्थल पर सरकार की नजर नहीं पड़ी थी। हालात ये थे कि यहां पहुंचने का रास्ता तक नहीं था। ये बस गंदगी का ढेर था। समिति के प्रयास से इस धरोहर को पहचान मिल पाई है लेकिन अभी भी ये पूरी तरह उपेक्षित है।

यहां स्वतंत्रता सेनानी को जानने की नहीं है इजाजत
इस बिल्डिंग के फर्स्ट फ्लोर पर मीटिंग रूम, उसके फर्नीचर, किताबें सब कुछ आज भी वैसी जैसा श्री बाबू रखते थे, लेकिन बिहार के इस सेनानी के इस कमरे को देखने की इजाजत किन्हीं को नहीं है। इनसे जुड़े सामान यहां जरूर हैं, लेकिन उसे देखने वाला कोई नहीं है।

श्री कृष्ण सिंह सेवा सदन की स्थिति अब जर्जर होती जा रही है।
श्री कृष्ण सिंह सेवा सदन की स्थिति अब जर्जर होती जा रही है।

श्रीकृष्ण सिंह के पैतृक आवास पर भी नहीं गई है सरकार की नजर
इस सफर में आखिरी पड़ाव है श्री बाबू का पैतृक गांव माउर। शेखपुरा जिला मुख्यालय से 16 KM दूर हाईवे पर बसे इस गांव के शुरुआती हिस्से में श्री बाबू का घर है। वह घर जहां उन्होंने जन्म लिया और पले-बढ़े। प्राचीनता में आधुनिकता का टच लिए इस मकान में वो आंगन, जहां उन्होंने अपनी बहन का ब्याह किया था। उनकी ओर से बनाया गया पूजा घर। घर के अंदर का मीटिंग प्वाइंट।

उनका बेड रूम और उनके फर्नीचर सबकुछ आज भी संजोकर रखा गया है। श्री बाबू के कमरे से लेकर इस मकान में आज भी उनके परिजन रहते हैं। यहां हमारी मुलाकात श्री बाबू के परपोते निशांत सिन्हा से हुई। उन्होंने बताया कि इस घर को ऐतिहासिक धरोहर बनाने का कोई प्रयास सरकार की तरफ से अभी तक नहीं किया गया है। यहां देश के सभी बड़े नेता आ चुके हैं।

हर दल के नेता आते हैं माउर, राजीव गांधी भी देखने पहुंचे थे श्री बाबू का घर
निशांत सिन्हा ने बताया कि तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी जब बरबीघा आए थे, तब वे भी इस घर को देखने आए थे। जनता के लिए ये घर हमेशा खुला हुआ है। हर कोई यहां आते हैं और श्री बाबू की यादें अपने साथ लेकर जाते हैं। बस किसी की नजर नहीं जाती है तो वो सरकार की।

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