बिहार में रची गई थी गांधीजी को मारने की साजिश:दूध में जहर मिलाकर दिया गया था, बत्तख मियां के इशारे से बची जान

पटना2 महीने पहलेलेखक: चंपारण से संजीव चौबे

बत्तख मियां। यह नाम ज्यादा चर्चित तो नहीं है लेकिन इसी ने महात्मा गांधी की जान बचाई थी। बात 1917 की है। महात्मा गांधी चंपारण यात्रा पर आए थे। यहां अंग्रेजों ने उनकी हत्या की साजिश रची थी। वो कामयाब भी हो जाते अगर बत्तख मियां वहां मौजूद ना होते। महात्मा गांधी की जान बचाने की वजह से उन्हें अंग्रेजों के जुल्म का शिकार भी होना पड़ा। आंखों के सामने घर जला दिया गया। जेल भेज गए, पर देश को गुलामी की जंजीर से मुक्त कराने से पीछे नहीं हटे।

बत्तख मियां का गांव एकवा परसौनी पटना से 300 किलोमीटर दूर पूर्वी चंपारण जिले में है। दैनिक भास्कर की टीम बत्तख मियां का घर का पता पूछते-पूछते पहुंची। सड़क ऐसी कि कुछ दूरी तक पैदल ही जाना पड़ा। कुछ दूर चलने पर घने जंगल के पास मौजूद एक झोपड़ीनुमा घर। इसी में रहता है बत्तख मियां का परिवार। आवाज देने पर 45 साल के एक शख्स घर बाहर निकलते हैं। कहते हैं कि हां मैं ही हूं बत्तख मियां का पोता कलाम अंसारी। उन्हीं से सुनिए बत्तख मियां की कहानी... आज परिवार किस हाल में है।

बत्तख मियां के पोते कलाम अंसारी।
बत्तख मियां के पोते कलाम अंसारी।

भीड़ इतनी कि महात्मा गांधी की ट्रेन स्टेशन पर पहुंच ही नहीं पाई
कलाम अंसारी ने अपने पिता जान मियां से दादा बत्तख मियां से जुड़ी पूरी कहानी सुनी थी। कलाम ने बताया, 'पंडित राजकुमार शुक्ल जी के बुलाने पर महात्मा गांधी 1917 में पहली बार चंपारण आए थे। उस वक्त उनके आने की बात जंगल में आग की तरह फैल गई।

बेतिया स्टेशन पर लाखों भीड़ जुट गई। भीड़ इतनी कि महात्मा गांधी की ट्रेन स्टेशन पर पहुंच ही नहीं पाई। इधर, महात्मा गांधी की लोकप्रियता और चंपारण पहुंचने की बात ने अंग्रेजी हुकूमत को परेशान कर दिया। फिर उन्होंने महात्मा गांधी की हत्या की साजिश रची।'

बत्तख मियां के कहने पर डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने गांधीजी को दूध पीने से किया मना
कलाम अंसारी कहते हैं- 'तात्कालिक मोतिहारी के अंग्रेज कलेक्टर हिकॉक ने महात्मा गांधी से मोतिहारी आने का आग्रह किया। गांधी जी ने आग्रह स्वीकार कर लिया और डॉ. राजेंद्र प्रसाद के साथ वहां गए। उस समय अंग्रेजों के रसोइए से मेरे दादा बत्तख मियां को अंग्रेजों ने गांधी जी को दूध देने को कहा।

इस दूध में जहर था। दादा को यह बात पता थी। इसलिए जब उन्होंने महात्मा गांधी को दूध दिया तो उनके पास बैठे डॉ. राजेंद्र प्रसाद को इशारों में ये बात बता दी। डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने गांधीजी को दूध पीने से मना कर दिया और उनकी जान बची।'

सरकारी खजाना में दिए गहनों की रसीद।
सरकारी खजाना में दिए गहनों की रसीद।

बहू और मेरी मां से उन्होंने सरकारी खजाना खाली होने की बात बताई
कलाम मियां बताते हैं-'इतना ही नहीं, जब डॉ. राजेंद्र प्रसाद भारत के प्रथम राष्ट्रपति बने तो चंपारण पहुंचे और दादा बत्तख मियां के घर पहुंचे। दादा का तो निधन हो चुका था पर उनकी बहू और मेरी मां से उन्होंने सरकारी खजाना खाली होने की बात बताई। इसके बाद दोनों ने उन्हें अपने गहने सरकारी खजाने में जमा करने के लिए दिए। इसकी रसीद अभी भी हमारे पास है।'

35 बीघा जमीन में हमें सिर्फ 6 एकड़ जमीन ही मिली
कलाम मियां के अनुसार, डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने हमें जीवन यापन करने के लिए 35 बीघा जमीन दी, पर अफसोस हमें सिर्फ 6 एकड़ जमीन ही मिली। नदी के किनारे होने से वो भी पानी में मिल गई और अब केवल 10 कट्ठा जमीन ही बची है। इसी पर घर है और बाकी की जमीन पर खेती करते हैं।

मुसीबत ये है कि हम लोग जंगल के किनारे हैं। जंगली जानवरों का हमेशा डर बना रहता है। शाम होते ही हम अपने घर में छुपने को मजबूर हो जाते हैं। बारिश और बाढ़ के समय घर के बहने का डर रहता है। ना हम अच्छे से खेती कर पाते हैं और ना ही रह पाते हैं।

बत्तख मियां के परिजनों का मिट्‌टी का घर।
बत्तख मियां के परिजनों का मिट्‌टी का घर।

'सरकार ऐसा नहीं करती तो हमें मजबूरी में आत्महत्या करनी पड़ेगी'
कलाम मियां बताते हैं- 'मैं जंगल प्रहरी का काम करता था। मेरी तबीयत अब खराब रहती है। मैंने अपने लड़के को इस काम पर लगा दिया, लेकिन मौजूदा स्थिति ये है कि मेरे लड़के को काम से निकाल दिया। किए हुए काम का पैसा भी नहीं दिया।

वन विभाग के अधिकारियों से बात करने पर वो डांट कर भगा देते हैं। हमें सरकार यहां के बदले कहीं और काम लायक और सुरक्षित जमीन दें ताकि हम अपना घर बना कर सुकून से रह सके। खेती बारी कर सकें। अगर सरकार ऐसा नहीं करती तो हमें मजबूरी में आत्महत्या करना पड़ेगा।'