पाएं अपने शहर की ताज़ा ख़बरें और फ्री ई-पेपर

डाउनलोड करें

शराबबंदी को झटका:जिले के 100 से अधिक गांवों में धड़ल्ले से किया जा रहा देसी शराब का निर्माण

परवाह13 दिन पहले
  • कॉपी लिंक
परवाहा में बनाई जा रही चुलाई शराब। - Dainik Bhaskar
परवाहा में बनाई जा रही चुलाई शराब।
  • बांस की झाड़ी और मकई का खेत बना है सेवन का अड्डा
  • महिलाओं के जिम्मे शराब बनाना तो पुरुषों ने संभाला ग्राहकों की जिम्मेदारी

शराबबंदी को लेकर सरकार लगातार कदम उठा रही है लेकिन अभी भी यह थमने का नाम नहीं ले रहा है। जिले के 100 से अधिक गांवों में देसी शराब का मिनी व्यापार चल रहा है। उत्पाद विभाग के साथ बिहार पुलिस की आंखे जहां अन्य प्रदेशों से आने वाली शराब पकड़ने पर ध्यान केंद्रित रहती है, वही गांव घरों में देशी शराब बनाने का धंधा परवान चढ़ा हुआ है। फारबिसगंज प्रखंड के परवाह में देसी शराब बनाने के धंधे की जब पड़ताल की गई तो कई चौंकाने वाली बातें सामने आई। शराब बनाने में शामिल कई महिलाएं बिना हिचक के कारोबार की हर एक पहलुओं को विस्तार से बताई। परवाहा के वार्ड एक, 05, 06, 07, 08 और 10 में धड़ल्ले से शराब बनाई जा रही थी। कहीं, शराब चुलाई के लिये चौके पर हड़िया टंगी मिली तो कहीं शराब सेवन की चौकड़ी। सूत्रों के मुताबिक उत्पाद विभाग जमीनी स्तर पर काम नहीं कर रही है। परवाहा में शराब के कारोबार से जुड़ी एक महिला ने बेहिचक बताया कि वे लोग परवाहा हाट से शराब बनाने की सामग्री खरीदते हैं। इसके लिए हाट में कई दुकानदार केवल शराब बनाने की सामग्री ही बेचते हैं। कारोबारी महिला ने बताया कि चुलाई शराब बनाने के शक्कर को पहले तीन से चार दिनों तक सड़ने के लिए छोड़ दिया जाता है। इसके बाद उसका चुलाई किया जाता है। महिला ने बताया कि अधिकांश लोग चुलाई शराब में यूरिया और संफिक्स का प्रयोग करते हैं। क्योंकि ये दोनों चीज के डालने से नशा ज्यादा होता है।

घरेलू निर्माण में ~110 से 125 लगाने पर बनता है छह लीटर देसी शराब
कारोबारी महिला ने बताया कि एक घानी में लगभग 110 से 125 रुपए की लागत आती है। जिससे 6 लीटर शराब बनती है। फिर इसमें पानी मिलाया जाता है। 60 से 80 रुपये बिक रहे शराब में लागत का दूना कमाई निकलता है। जिससे लगातार इस अवैध धंधे में वृद्धि हो रही है। ये शराब इसलिए भी ज्यादा खतरनाक है क्योंकि गुड़ को जब सड़ने के लिए रखा जाता है तो उसमें छिपकली, मकड़ी और अन्य जहरीले जीव के जाने का खतरा होता है। बांस की बाड़ी, मक्के की खेत और जंगल में रखी गयी शराब को पीने के लिए लोग लाइन लगाते हैं। शाम होते हीं इन अड्डों पर पियक्कड़ों की भीड़ लगने लगती है। इन अड्डों पर चखना के रूप में चिकन, मछली, अंडा के अलावा दालमोठ व अन्य नमकीन की व्यवस्था रहती है।

पुरुष साथी महिलाओं की सुरक्षा के साथ लाते ग्राहक
सबसे अहम बात यहां ये है कि इस अवैध धंधे में महिलाएं ज्यादा सक्रिय है। इनके पुरुष साथी इनकी सुरक्षा के साथ साथ ग्राहक लाने का काम भी करते हैं। कुछ पुरुष साथी क्षेत्र की सुरक्षा के लिए भी तैनात रहते हैं। यदि कही से कोई पुलिस आने की भनक लगती है तो उसके लिए अड्डे को पहले ही खाली करा दिया जाता है। अररिया प्रखंड के जय प्रकाश नगर, कोचगामा, रामपुर कोडकट्टी, बनगामा सहित एक दर्जन जगहों पर, फारबिसगंज के परवाहा, खवासपुर, हलहलिया, मानिकपुर, रानीगंज के काला बलुआ, नरपतगंज के सुरसर, फुलकाहा, भंगही सहित 100 से अधिक ऐसे गांव हैं जहां देसी शराब का धड़ल्ले से निर्माण किया जा रहा है।

अवैध शराब निर्माण की नहीं है कोई जानकारी
परवाहा पुलिस कैम्प प्रभारी विश्वमोहन पासवान ने बताया कि क्षेत्र में अवैध शराब बनने की जानकारी उन्हें नहीं है। यदि कही से ऐसी खबरें आती है तो कार्रवाई की जाती है।

खबरें और भी हैं...