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हिन्दी दिवस:आनंद शंकर माधवन ने हिंदी सीखने के लिए छोड़ा था घर

बांका /गोड्‌डा13 दिन पहले
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  • 70 से अधिक हिंदी में किताबें लिखी, झारखंड - बिहार के सीमावर्ती क्षेत्र मंदार पर्वत के नीचे साहित्य साधना करते रहे
  • घर का अनाज, गाय तक बेच दिए और बनारस जाकर हिंदी सीखी

दक्षिण भारत जहां पर कभी हिंदी का विरोध होता था। वहीं से एक मद्रासी आनंद शंकर माधवन ने हिंदी सीखने के लिए अपने घर के अनाज, गाय तक बेच दिए और बनारस आकर हिंदी सीखी। फिर हिंदी के लिए यह यात्रा बनारस से पूर्व राष्ट्रपति जाकिर हुसैन के सानिध्य में जामिया- मिलिया इस्लामिया दिल्ली तक पहुंचा। दिल्ली से हिंदी में एमए करने के बाद आनंद शंकर माधवन ने सारे भारत का पदयात्रा किया और अंत में झारखंड और बिहार के सीमावर्ती क्षेत्र मंदार पर्वत के नीचे हिंदी साहित्य की साधना के लिए चुने और सबदिन वहीं का बनकर रह गये। हिंदी में इन्होंने 70 से अधिक किताबें लिखी।

मां बोली थीं... साहित्यिक पथ ही तुम्हारा वास्तविक साधना पथ है बेटा

आनंद शंकर माधवन ने अपनी जीवनी प्रथम याम में लिखे हैं कि मेरी कमाई के उनसठ रूपये और मां ने धान तथा गाय बेचकर बत्तीस रूपये ग्यारह आना ही जोड़ पाये। अंतत: हिंदी सीखने के लिए मां से बिदा होने का समय आ गया। अम्मा रोने लगी । हिंदी सीखे एक युवक के साथ काशी पहुंच गया। माधवन जी लिखते हैं कि घर छोड़ने वक्त मां ने आशीर्वाद दिया था कि जब तुम्हें मौका मिले तो लिखना जरूर। साहित्यिक पथ ही तुम्हारा वास्तविक साधना पथ है बेटा। 1931 में इसने गृह त्याग किया। 1932-33 में काशी विद्यापीठ से अंतरिम की परीक्षा पास की। साधना का यह पथ कलांतर में काशी से चलकर दिल्ली में डॉ जाकिर हुसैन के संरक्षण में जामिया मिलिया इस्लामिया तक पहुंच गया। वहीं से स्नातक और स्नातकोत्तर की परीक्षा पास किया। उसके बाद सारे भारत का पदयात्रा शुरू किया। अंत में मंथन गिरी मंदार ने माधवन जी का मन मोह लिया और अंत तक मंदार के ही हो कर रह गए।

हिंदी के लिए मंदार विद्यापीठ विश्वविद्यालय खोले
आनंद शंकर माधवन को सबलपुर के हरबल्ल्व बाबू जैसे जमींदारों ने काफी जमीन दान में दे दी। वे वहीं पर कुटिया बनाकर साहित्य साधना करने लगे। उनके मन में विचार था कि हिंदी के लिए एक विश्वविद्यालय बने। दिल्ली में पूर्व राज्यपाल एआर किदवई इनके सहपाठी तथा दोस्त थे। वे भी समय- समय पर मंदार आते। इन सबों की मदद से मंदार में ही मंदार विद्यापीठ नाम से विश्वविद्यालय खोले और यही से बीए और एम ए की डिग्री मिलने लगी। आनंद शंकर माधवन हिंदी साहित्य के विकास के लिए हर समय प्रयासरत रहे।
राज्यपाल का पद भी ठुकरा दिया था माधवन ने
कहा जाता है कि जब जाकिर हुसैन देश के राष्ट्रपति बने तो आनंद शंकर माधवन को राज्यपाल बनने का ऑफर दिए। तब माधवन जी ने बड़े ही शालीनता से जबाव दिया था कि गुरूदेव मेरी इच्छा है कि मैं व्यास देव जैसा लिखूं। राज्यपाल बनने के बाद शायद यह संभव नहीं हो पायेगा। मंदार की भावना अधूरी रह जायेगी। अनाथ बच्चों काे पढ़ाने का सपना भी अधूरा रह जायेगा। जाकिर हुसैन ने माधवन के मन की बात भांप ली और माधवन को मंदार की ओर ही छोड़ दिया।

70 से अधिक हिंदी में प्रकाशित हैं माधवन की पुस्तकें
माधवन जी ने वर्ष 1959 से लिखना शुरू किया। 1959 में बिखरे हीरे, हिंदी आंदोलन, 1961 में अनामंत्रित मेहमान, 1964 में दीपाराधना, वर्षा, 1965 में प्रथम याम, प्रसुन पंथ, 1967 में आरती, प्रसव वेदना भाग एक तथा प्रसव वेदना भाग दो। इसी तरह हर साल नई पुस्तक को अमलीजामा पहनाते रहे। मगध विश्वविद्यालय के मिथलेश कुमार सिंह सहित कई लोगों ने माधवन जी के जीवन और साहित्य पर पीएचडी किया। आगरा की एक लड़की ने भी माधवन जी के साहित्य पर पीएचडी किया। अंत में करीब 90 साल की उम्र में माधवन जी सबों ने दम तोड़ा और यही की जमीन में इनकी चिता जली।

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