आस्था:वैदिक मंत्रोच्चार से भगवान चित्रगुप्त की गई पूजा-अर्चना

बसंतपुरएक महीने पहले
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चित्रगुप्त पूजा में मौजूद समिति के सदस्य व अन्य - Dainik Bhaskar
चित्रगुप्त पूजा में मौजूद समिति के सदस्य व अन्य
  • ब्रह्मा सृष्टि के निर्माण के बाद 11 हजार वर्षों तक समाधि में रहे लीन, फिर कायस्थों की उत्पत्ति की

बसंतपुर में चित्रांश परिवार की ओर से शनिवार को आदि कलमकार तथा लेखन कला के आविष्कारक भगवान चित्रगुप्त महाराज की विधि पूर्वक एवं पूरी आस्था के साथ पूजा-अर्चना की गई। बसंतपुर के राजीव कुमार श्रीवास्तव के मकान परिसर में स्थित भगवान चित्रगुप्त की स्थापित प्रतिमा के सामने कायस्थ जाति के लोगों ने विधि विधान के साथ चित्रगुप्त की पूजा-अर्चना की गई। पंडित अमरनाथ पांडेय के वैदिक मंत्रोच्चार के साथ पूरे विधि-विधान एवं शंखध्वनि से पूरा क्षेत्र भक्तिमय हो गया। पूजा पर बैठे यजमान मनोज श्रीवास्तव द्वारा पूजा समाप्ति के बाद आरती की गई। उसके बाद प्रसाद वितरण किया गया। भगवान चित्रगुप्त के संबंध में मान्यता है कि ब्रह्मा जी की काया से उत्पत्ति होने की वजह से चित्रगुप्त को कायस्थ कहा जाता है। वह प्राणी समूह के शरीर में गुप्त भाव से व्याप्त हो कर शुभ व अशुभ कार्यों का निरीक्षण करते हैं और पाप व पुण्य का लेखा-जोखा के आधार पर उनका न्याय करते हैं। कायस्थों की उत्पत्ति के संबंध में बताया जाता है कि ब्रह्मा सृष्टि के निर्माण के बाद 11 हजार वर्षों तक समाधि में लीन रहे।इस दौरान उनकी काया से श्याम वर्ण, कमल नयन, चार भुजाधारी, एक हाथ में असी, दूसरे में कालदंड, तीसरे में लेखनी और चौथे में दावात धारण किये पुरुष को ब्रह्मा ने चित्रगुप्त का नाम दिया था और उन्हें धर्मराज पूरी में जीवों के शुभ अशुभ कार्यों का लेखा-जोखा रखने की जिम्मेवारी दी थी।

धूमधाम से मनाई गई चित्रगुप्त पूजा

दरौली| दराैली प्रखंड में चित्रगुप्त पूजा समिति के तत्वावधान में शनिवार को हनुमान मंदिर, राजा के बारी में चित्रगुप्त महाराज के पूजनोत्सव और कलम-दावत की पूजा का कार्यक्रम हर्षोल्लास के साथ मनाया गया। इसके बाद सांस्कृतिक कार्यक्रम का आयोजन हुआ। कायस्थ समाज के लोगों ने शनिवार को श्री चित्रगुप्त महाराज की पूजा-अर्चना की। इस अवसर पर कई स्थानों पर प्रतिमाएं स्थापित कर बड़े धूमधाम से चित्रगुप्त महाराज की पूजा-अर्चना की गई। वैदिक मंत्रोच्चारण के बीच श्री चित्रगुप्त पूजा संपन्न हुआ। पूजा के बाद श्रद्धालुओं के बीच प्रसाद बांटा गया। कायस्थ समाज के लोगों ने वैदिक मंत्रोच्चार के बीच कलम, दवात, कॉपी व पुस्तक की पूजा की गई। शास्त्रों के अनुसार ऐसा माना जाता है कि सृष्टि की रचना के बाद ब्रह्माजी चिंतातुर हो गए। चिंता का कारण था । सकल सृष्टि की देखरेख एवं लेखा-जोखा रखना। कोई उपाय न सूझने पर ब्रह्माजी 12 हजार वर्ष की अखंड समाधि में लीन हो गए। इसके बाद उनकी काया से एक तेजस्वी बालक का जन्म हुआ, जिनका नाम ब्रह्माजी ने कायस्थ रखा और कहा कि समस्त जीवों के कर्मों का लेखा-जोखा रखना ही तुम्हारा दायित्व है।

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