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सफेद पत्थर का काला धंधा:चकाई में हर माह 400 टन सफेद पत्थर की तस्करी, जिसे गिरिडीह और दुर्गापुर की छड़ फैक्ट्रियों में भेजा जा रहा है

जमुई| मुरली दीक्षित​​​​​​​4 दिन पहले
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झारखंड के गिरिडिह स्थित रोलिंग प्लांट, यहां सफेद पत्थर भेजा जाता है। - Dainik Bhaskar
झारखंड के गिरिडिह स्थित रोलिंग प्लांट, यहां सफेद पत्थर भेजा जाता है।
  • नक्सल इलाके में तीन माह की पड़ताल से हुआ खुलासा
  • चकाई के बोंगी, बरमोरिया, पोझा, बामदह, नौवाडीह, चौफला, कल्याणपुर, दुल्लमपुर व कियाजोरी में हो रही खुदाई, हैरत है कि खनन पदाधिकारी को यह भी नहीं पता कि यहां सफेद पत्थर पाया जाता है...!

चकाई से हर माह 400 टन से अधिक रैमिंग मास(सफेद पत्थर) की तस्करी हो रही है। झारखंड के गिरिडीह और प. बंगाल के दुर्गापुर की छड़ फैक्ट्रियों में इस पत्थर भेजा जा रहा है। वहां की लोहे की फैक्ट्रियों का उत्पादन इसी पर निर्भर है। चकाई के बोंगी, बरमोरिया, पोझा, बामदह, नौवाडीह, चौफला, ठाढ़ी, कल्याणपुर, दुल्लमपुर और कियाजोरी में इस पत्थर की खुदाई बड़े पैमाने पर हो रही है। इसका खुलासा तब हुआ जब भास्कर टीम ने पिछले तीन माह तक पड़ताल की। तस्करी में प. बंगाल और झारखंड के माफिया शामिल हैं। चौकाने वाली बात यह है कि जिला खनन पदाधिकारी को पता नहीं है कि चकाई में सफेद पत्थर होता है। दिसंबर में भास्कर की टीम नारोदह झरना के इलाके में पहुंची। चकाई और बामदह के बीच जंगल की ओर जाने वाली रास्ते में एक किमी का सफर तय करने पर दोमुहान के समीप बड़ी मात्रा में रैमिंग मास जगह-जगह इकट्‌ठा था। आठ किमी दूर नारोदह तक ऐसा ही नजारा मिला। भास्कर की टीम ने फिर जनवरी में बिहार-झारखंड से सटे दुल्लमपुर के इलाके में रैमिंग मास की उपलब्धता की जानकारी ली। तो पता चला कि दुल्लमपुर इलाके में भी जेसीबी मशीन से खुदाई कर जमीन के अंदर से रैमिंग मास निकाली जा रही है।

रैमिंग के तस्करी की अबतक नहीं मिली शिकायत
चकाई में रैमिंग की उपलब्धता है इसकी मुझे जानकारी नहीं है। इसकी तस्करी की शिकायत अबतक संज्ञान में नहीं आया है।
-अनिल कुमार, जिला खनन पदाधिकारी, जमुई

चकाई के वनक्षेत्र में कराई जाएगी गश्ती, होगी कार्रवाई
चकाई से रैमिंग मास की उपलब्धता और इसके तस्करी के जुड़े मामले की पूरी पुष्टि कर वनरक्षियों से गश्ती कराई जाएगी। तस्करी से जुड़े लोगों पर भी कार्रवाई की जाएगी। -पीयूष वर्णवाल, वन प्रमंडल पदाधिकारी, जमुई

​​​​​​​भास्कर नॉलेज
मैग्निशियम सफेद पत्थर का प्रयोग छड़ बनाने के लिए जलाई गई भट्‌ठी में होता है। यह उच्च तापमान को स्थिरता प्रदान करता है। जिस कारण भट्‌ठी लंबे समय तक समान तापमान देता है। धातु, लौह अयस्क, सीमेंट फैक्ट्री, थर्मल पावरग्रिड में भी सफेद पत्थर का प्रयोग बड़े पैमाने पर होता है।

2017 में अंतरर्राष्ट्रीय तस्करी होती थी, पत्थर को भूटान भेजा जाता था
2017 में सफेद पत्थर की तस्करी भूटान के रास्ते चीन को भेजा जाता था। इसमें बड़े माफिया शामिल थे जो बंगाल के रास्ते भूटान पहुंचाते थे। 2018 से चीन से आयात-निर्यात पर कड़ाई और बार्डर पर तनाव के बाद तस्करी बंद हो गया। प. बंगाल के दुर्गापुर के एक फैक्ट्री मालिक जयप्रकाश सिंह ने बताया कि इस पत्थर के बिना छड़ व लोहे का सामान नहीं बनाया जा सकता। चकाई से कम कीमत में अच्छे गुणवत्ता वाले पत्थर मिल जाते हैं। दुर्गापुर के आधा दर्जन रोलिंग मील में चकाई से पत्थर जा रहा है। ​​​​​​​

लोगों ने कहा-एक ट्रैक्टर पत्थर देने पर 600 रुपए मजदूरी मिलती है​​​​​​​

लोगों ने बताया कि गिरिडीह के अजीत साह नाम के एक ठेकेदार खरीदारी करता है। सबसे ज्यादा बोंगी, बरमोरिया में होती है। फरवरी में पड़ताल की गई तो बोंगी के तालो हेम्ब्रम, शांति हेम्ब्रम, सुनील मुर्मू, हीरो किस्कू, जेठू हेम्ब्रम ने बताया कि एक ट्रैक्टर (चार टन) पत्थर देने पर उन्हें 600 रुपये मिलते हैं, जबकि मार्केट में इसकी कीमत प्रति टन 4 से 6000 रुपए है। यानि माफिया को प्रति माह 400 टन से 24 लाख रुपए की कमाई हो रही है। यहां के लोगाें को पत्थर की उपयोगिता के बारे में नहीं पता है। जिसका फायदा माफियाओं को मिल रहा है। ​​​​​​​

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