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बकरीद:घरों में पढ़ी गई ईद-उल-अजहा की नमाज, सजदे में झुके सिर, मांगी दुआ

कटिहार14 दिन पहले
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  • काेराेना से बचाव के लिए पिछले वर्ष की तरह इस बार भी ईदगाह व मस्जिदों में जमात के साथ नहीं पढ़ी गई नमाज

ईद उल अजहा (बकरीद) का पर्व बुधवार को जिले भर में कोरोना काल में सामजिक दूरी का पालन करते हुए अकीदत व सादगी के साथ मनाई गई। मौके पर घर घर सजदे में सिर झुके, कोरोना से मुक्ति व अमन चैन की दुआएं मांगी गई। नमाज पढ़ने के बाद लोगों ने मुबारकबाद देने को लेकर एक दूसरे से ना हाथ मिलाया और ना गले मिले। दूर से ही सलाम कर बधाई दी। पिछले वर्ष की तरह इस बार भी ईदगाह व मस्जिदों में जमात के साथ नमाज नहीं पढ़ी गई। कोरोना के खतरे को देखते हुए सामूहिक नमाज पर पाबंदी थी। इसके अनुपालन को लेकर जिला प्रशासन द्वारा मस्जिदों, ईदगाहों व जिले भर के विभिन्न संवेदनशील व महत्वपूर्ण चौक चौराहे सहित 326 पर दंडाधिकारी के साथ पुलिस बल की तैनाती की गई थी। वहीं जिले भर के आला अधिकारी भ्रमण कर विधि व्यवस्था का जायजा भी ले रहे थे।

घरों में नमाज पढ़ने के लिए 8 संगठनों ने की थी अपील
बकरीद की नमाज और कुर्बानी को लेकर जिला प्रशासन सहित मुस्लिम धर्म के 8 संगठनों ने अपील की थी की जिस तरह ईद की नमाज घर पर पढ़ी उसी तरह बकरीद की नमाज भी घर पर ही अदा करें। मस्जिद में नमाज पढ़ने ना पहुंचें। क्योंकि सीमित संख्या में ही वहां नमाज पढ़ने की इजाजत है। तीसरी लहर को देखते हुए एहतियात जरूरी है। साथ ही कुर्बानी करते वक्त सफाई और सामाजिक दूरी का पालन करने की भी नसीहत दी थी। मुस्लिम संगठनों ने कहा था कि कुर्बानी घर के अंदर और परदे में ही करें। खुले में कुर्बानी कतई ना करें। साथ ही अवशेष को इधर उधर ना फेंके। जिला प्रशासन और विभिन्न संगठनों की अपील को भी लोगों ने माना।

महामारी से निजात के लिए दुआ के साथ दवा की जरूरत : मौलाना अली रजा रहबर
अल मदद फाउंडेशन के मौलाना अली रजा रहबर ने कहा कि यह समय हमारे सामने मुश्किल की घड़ी है। जिसने इंसान से इंसान को जुदा कर दिया। अल्लाह से दुआ है कि हमारी गलतियों को माफ करें और इस महामारी का खात्मा करें। ‌ताकि वापस इंसान एक दूसरे के करीब आ सके। उन्होंने कहा कि यह एक बीमारी है। जिसे उबरने के लिए दुआ के साथ दवा की भी जरूरत है। उन्होंने कहा कि बकरीद का दिन फर्ज ए कुर्बान का दिन है। इस्लाम में गरीब, मजलूमों का खास ध्यान रखने की परंपरा है। इसी वजह से बकरीद पर भी गरीबों का विशेष ध्यान रखा जाता है। इस दिन कुर्बानी के बाद गोश्त के तीन हिस्से किए जाते हैं। इनमें से एक हिस्सा खुद के लिए और शेष दो हिस्से समाज के गरीब व जरूरतमंद लोगों में बांट दिए जाते हैं। ऐसा कर मुस्लिम इस बात का पैगाम देते हैं कि अपने दिल की गरीबी चीज भी हम दूसरों की बेहतरी के लिए अल्लाह की राह में कुर्बान कर देते हैं।

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