पाएं अपने शहर की ताज़ा ख़बरें और फ्री ई-पेपर

डाउनलोड करें

धर्म-आध्यात्म:प्रकृति की चेतावनी है काेरोना, संयम से ही हरा सकते

किशनगंज8 दिन पहले
  • कॉपी लिंक
प्रवचन स्थल पर अंतिम सत्र में प्रवचन करते स्वामी ओमानंद महाराज। - Dainik Bhaskar
प्रवचन स्थल पर अंतिम सत्र में प्रवचन करते स्वामी ओमानंद महाराज।
  • डे मार्केट में बाबा शाहीधाम दानापुर अाए स्वामी ओमानंद महाराज ने दिया प्रवचन, बोले-

स्वामी ओमानंद महाराज ने वैश्विक महामारी कोरोना को प्रकृति प्रदत्त चेतावनी बताया है। बुधवार को डे मार्केट स्थित दो दिवसीय संतमत सत्संग के दूसरे और अंतिम सत्र में बाबा शाहीधाम दानापुर पटना से पधारे महर्षि मेंहीं परमहंस के शिष्य शाही स्वामी के सेवक स्वामी ओमानंद जी महाराज मानव शरीर क्यों? विषय पर प्रकाश डाला। कहा 84 लाख प्रकार के शरीर का वर्णन धर्मशास्त्रों में किया गया है। इसमें मानव शरीर को सबसे उत्तम बताया गया है। मनुष्य चाहे तो इस दुनियां में इस शरीर के माध्यम से कुछ भी बन सकता है। डॉक्टर, इंजीनियर, मंत्री, राष्ट्रपति यहां तक कि अगर वो ईश्वर भी बनना चाहे तो बन सकता है। इसलिए भगवान श्रीराम ने अपनी प्रजा को समझाया था कि बड़े भाग्य मानुष तन पावा। अगर, मनुष्य शरीर पाकर हम परमात्मा को नहीं प्राप्त कर लेते हैं तो अंत में पछताना पड़ेगा।

मन को शांत करने के लिए बिंदु व नाद की उपासना सर्वश्रेष्ठ
अशांत मन को शांत करने के लिए हमारे संतों ने बिन्दु और नाद की उपासना को सर्वश्रेष्ठ बताया है। इन्हीं साधना को कर अपने अंदर की शक्ति पैदा कर इस कोरोना से विजय पा सकते हैं। जब हम साधना करेंगे तो स्वत: संयमित हो जाएंगे। सब कुछ संयमित हो जाएगा तो कोरोना रुपी बीमारी अपने आप दूर हो जाएगी। मानव को संयमित होना जरुरी है। संयमित साधना से होता है और साधना संतों के सान्निध्य से प्राप्त होता है।

‘काम, क्रोध, लोभ, मोह, ईर्ष्या रूपी वायरस को मारने की वैक्सीन नहीं’
दुनिया में सभी देशवासी कोरोना महामारी के प्रकोप से त्रस्त हैं। यह कोरोना जो पूरे विश्व में फैला है इसका वैक्सीन तो कई देशों ने बना लिया लेकिन सबसे बड़ा कोरोना मनुष्य के अंदर में है जिसे षडविकार कहते हैं। अर्थात काम, क्रोध, लोभ, मोह, इर्ष्या, डाह यह जो छह प्रकार का महाकाेरोना है इसको मारने के लिए किसी भी देश के पास कोई वैक्सीन नहीं है। इस षडविकार कोरोना को मारने के लिए एक मात्र संतों की युक्ति-रुपी वैक्सीन से ही इसका नाश हो सकता है। जो कोई मनुष्य शरीर पा कर संतों से युक्ति जानकर अपने अंतर में इसका अभ्यास नहीं करेगा अर्थात ध्यान नहीं करेगा वह जन्म-जन्म तक इस महाकोरोना के प्रकोप से तड़पता रहेगा। आज कोरोना के इस प्रकोप को देखकर मनुष्य को चेतना चाहिए।

खबरें और भी हैं...