ग्रहयोग:मिथिला पंचांग से आज, बनारसी पंचांग से मकर संक्रांति कल

किशनगंज11 दिन पहले
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  • मिथिला पंचांग से 14 जनवरी को दिन में 12 बजे के बाद पुण्यकाल, इसके बाद मना सकते हैं पर्व
  • बनारसी पंचांग के अनुसार 14 की रात में संक्रांति प्रवेश के बाद इसका पुण्यकाल 15 को, इसलिए 15 को चढ़ेगा गुड़ और तिल

मकर संक्रांति पर्व को लेकर इस बार पंचांग एकमत नहीं है। ऐसे में मकर संक्रांति का पर्व दो दिन 14 और 15 जनवरी दोनों दिन मनाया जाएगा। मिथिला पंचांग को मानने वाले 14 व बनारसी पंचांग को मानने वाले 15 जनवरी को मकर संक्रांति मनाएंगे। मिथिला पंचांग के अनुसार, 14 जनवरी शुक्रवार को दोपहर 12 बजे से संक्रांति का पुण्यकाल आरंभ हो जाएगा। इस कारण से मिथिला पंचांग को मानने वाले 14 जनवरी को मकर संक्रांति का पर्व मनाएंगे। पुरोहित सूरजभान उपाध्याय बताते हैं कि मिथिला पंचांग से 14 जनवरी को दिन में 12 बजे के बाद पुण्यकाल प्रवेश कर जाएगा। इस कारण 12 बजे के बाद मकर संक्रांति का पर्व मनाया जा सकता है। मिथिला पंचांग के अनुसार इस साल मकर संक्रांति की शुरुआत रोहिणी नक्षत्र में हो रही है। यह 14 जनवरी की रात 8:08 मिनट तक रहेगा। रोहिणी नक्षत्र को ज्योतिष शास्त्र में बेहद शुभ माना जाता है। बनारसी पंचांग के अनुसार 14 जनवरी को रात 8:14 से भगवान भास्कर मकर राशि में प्रवेश कर जाएंगे। मकर संक्रांति का पर्व पुण्यकाल में ही मनाना चाहिए। रात में संक्रांति लगने के कारण इसका पुण्य काल अगले दिन 15 जनवरी शनिवार को माना जाएगा। बनारसी और ऋषिकेश पंचांग को मानने वाले 15 जनवरी को मकर संक्रांति मनाएंगे। मकर संक्रांति के दिन से सूर्य दक्षिणायन से उत्तरायण हो जाएंगे। सूर्य के उत्तरायण होते ही मांगलिक कार्य आरंभ हो जाएंगे।

सूर्य के उत्तरायण होने से मकर संक्रांति से लंबा होने लगता है दिन
ज्योतिषशास्त्र के अनुसार मकर संक्रांति के दिन सूर्य के एक राशि से दूसरे राशि में हुए परिवर्तन को अंधकार से प्रकाश की ओर परिवर्तन माना जाता है। मकर संक्रांति के दिन से ही दिन बढ़ने लगता है और रात्रि की अवधि कम होती चली जाती है। सूर्य ऊर्जा का स्रोत है। इसके अधिक देर चमकने से प्राणि जगत में चेतना और उसकी कार्यशक्ति में वृद्धि हो जाती है, इसीलिए हमारी संस्कृति में मकर संक्रांति पर्व मनाने का विशेष महत्व है।

मकर संक्रांति में तिल, गुड़ और खिचड़ी का रहता है विशेष महत्व
मकर संक्रांति के दिन तिल व खिचड़ी का विशेष महत्व बताया गया है। मकर राशि के स्वामी शनि और सूर्य के विरोधी राहू होने के कारण दोनों के विपरीत फल के निवारण के लिए तिल का खास प्रयोग किया जाता है। उत्तरायण होने पर सूर्य की रोशनी और प्रखर हो जाती है। मान्यता है कि भगवान विष्णु को भी तिल अत्यंत प्रिय है। ठंड के मौसम में तिल का सेवन शरीर को गर्म रखता है।

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