लॉकडाउन के नुकसान से 600 किसानों ने नहीं मानी हार:रेतीली जमीन पर उगाए तरबूज-ककड़ी; अब दिल्ली, मेरठ, गाजियाबाद, कोलकाता तक जाएंगी सुपौल की फल-सब्जियां

किसनपुर4 महीने पहलेलेखक: धर्मेंद्र कुमार धीरज
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कोसी दियारा में रेतीली जमीन पर लगाई गई लत्तीदार फल-सब्जियां। - Dainik Bhaskar
कोसी दियारा में रेतीली जमीन पर लगाई गई लत्तीदार फल-सब्जियां।

बीते दो साल में कोरोना के कारण हुए लॉकडाउन से नुकसान झेल चुके किसानों ने हार नहीं मानी है। किसानों ने अपने बुलंद हौसले का परिचय देते हुए इस साल भी कोसी की रेतीली जमीन पर उम्मीदों की फसल लगाई है। उत्तरप्रदेश के शामली जिले से आए करीब 600 किसान प्रखंड अंतर्गत कोसी महासेतु के समीप से लेकर नौआबाखर, बौराहा, मौजहा एवं दुबियाही पंचायत में रेतीली भूमि पर मौसमी फल एवं सब्जियों की खेती कर रहे हैं। इन किसानों में शामिल परिवार की महिलाएं भी पुरुषों के साथ कदम से कदम मिला कर सहयोग कर रही हैं।

खेती कर रहे किसान मो. मुश्ताक, मो. हाशिम, मो. नौशाद सहित अन्य ने कहा कि कोसी के बालू पर उपजने वाले मौसमी फल में तरबूज, ककड़ी काफी मीठा एवं स्वादिष्ट होते हैं। इस कारण इन फलों एवं सब्जियों की दिल्ली, मेरठ, कोलकाता सहित बिहार के मधुबनी, दरभंगा, समस्तीपुर, मुजफ्फरपुर, पटना, फारबिसगंज, सहरसा में भी काफी डिमांड रहती है। इस बार भी कोरोना की तीसरी लहर शुरू है। उम्मीद है कि मार्च से पहले कोरोना पर नियंत्रण हो जाएगा एवं इस बार हमलोगों को प्रति एकड़ करीब डेढ़ लाख रुपए का मुनाफा होगा।

नवंबर और दिसंबर में लगती है फसल, मार्च में होती है उपज
मार्च के अंतिम सप्ताह से मौसमी फल व सब्जी तोड़ बाजार में बेचना शुरू कर देंगे। इसके लिए नवबंर-दिसंबर में फल एवं सब्जी का बीज बोए हैं। करीब 20 दिनों के बाद बीज अंकुरित होकर सतह दिखने लगा है। जमीन से फल एवं सब्जियों को अलग रखने के लिए सूखी खरपतवार बिछाया है। फरवरी से खेतों में लगे पौधे में फल लगना शुरू हो जाएगा। खेत में ढाई फीट गड्‌ढा खोद कर गोबर, दो किलो खाद व जिंक डाला है। ताकि बीज को ताकत मिले। प्रत्येक गड्‌ढे में 4 से 5 बीज बोया है। जिस गड्ढे के चारों तरफ करीब 5 फीट की दूरी पर वृत्ताकार क्यारी बनाकर उसमें बराबर पानी डाल कर सिंचाई कर रहे हैं।

खेत में दिखने लगे हैं पौधे, लत्ती बचाने के लिए 24 घंटे किसान रहते हैं मुस्तैद
गर्मी के मौसमी फल के लिए कोसी, गंगा सहित अन्य नदियों के दियारा इलाके में रेतीली सैकड़ों एकड़ जमीन पर खेती करते हैं। इसके लिए इस वर्ष भू-स्वामी से 06 महीने के लिए 1500-2000 रुपए प्रति एकड़ के हिसाब से लीज पर जमीन पर लेकर खेती की है। जमीन की साफ-सफाई के बाद समतल बना कर खेत में 3 गुना 30 फीट के आकार की डेढ़ से दो फुट गहरी बड़ी-बड़ी नालियां बना कर उसमें बीज बोए हैं। नन्हें पौधों को तेज धूप या पाले से बचाने के लिए बीजों की नालियों को प्लास्टिक की छतरी से ढंक दिया है।

अब पौधे जमीन की सतह पर दिखने भी लगे हैं। बोए गए पौधे को बचाने के लिए सभी किसान 24 घंटे खेत में छोटी-छोटी झोपड़ी बनाकर मुस्तैद हैं। रेतीली भूमि पर उगने वाले मौसमी फल तरबूज, ककड़ी एवं खीरा को हमलोग हरा सोना कहते हैं। यूपी से यहां आकर बीते करीब 7 वर्ष से कोसी की रेतीली जमीन पर मीठे फल व सब्जियों की खेती कर रहे हैं।