मां का दरबार:सच्चे मन से आराधना करने पर मिलती है बांझपन से मुक्ति

बैद्यनाथ प्रसाद | कुमारखंड15 दिन पहले
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  • मंदिर खुदाई के समय निकला था ठोस पदार्थ, भक्तों ने मां स्वरूप में की पूजा

प्रखंड के लक्ष्मीपुर चंडीस्थान पंचायत स्थित मां चंडीस्थान मंदिर में सच्चे मन से पूजा करने वाले भक्तों की हर मुरादें माता पूरी करती है। सैकड़ों वर्ष पूर्व ग्रामीणों के द्वारा सार्वजनिक सहयोग से मंदिर का निर्माण कराया गया था। मंदिर परिसर में में चंडी के सेवक सह भक्त लोक देवता दो सगे भाई बुधाय एवं सुधाय और आशाराम महाराज के एक-एक प्रतिमा प्रतीक के रूप में स्थापित है। मंदिर में स्थापित मां दुर्गा के चंडी स्वरूप की ख्याति दूर-दूर तक रहने के कारण भारी संख्या में नवरात्र सहित अन्य दिनों में भी श्रद्धालु पूजा-अर्चना के लिए पहुंचते रहे हैं। मान्यता है कि सच्चे मन से आराधना करने वाले नि: संतान दंपति या फिर बांझ महिलाओं को संतान सुख की प्राप्ति होती है। माता चंडी स्थान को लेकर लक्ष्मीपुर चंडीस्थान के बुजुर्गों ने बताया कि जिस समय मंदिर का निर्माण करवाया जा रहा था। उक्त स्थल पर खुदाई के दौरान मजदूरों को एक ठोस पदार्थ टकराया। मजदूरों द्वारा जैसे ही उसे निकालने की कोशिश की गई तो वह ठोस पदार्थ स्वत: विकराल रूप धारण कर लिया। जिसकी सूचना ग्रामीणों को मिलते ही स्थिति से भयभीत होकर श्रद्धालुओं ने उसे माता का स्वरूप मानकर यथावत छोड़ दिया। साथ ही उक्त स्थल से ही मंदिर निर्माण कार्य को पूर्ण कराया। बुजुर्गों ने बताया, गांव में जब भी मवेशी के बीमार पड़ने या दुधारू पशु या फिर किसी महिलाओं का किसी कारणों से दूध गायब होने पर भक्त सच्चे मन से माता की पूजा कर भस्म लगा देते हैं, तो बीमारियां स्वत: दूर हो जाती है।

मां चंडी का आप रूपी मूर्ति । यहां दशहरा में प्रतिमा नहीं बनाया जाता है
मां चंडी का आप रूपी मूर्ति । यहां दशहरा में प्रतिमा नहीं बनाया जाता है

गेट के बाहर पत्थर की शक्ल में हैं चोर
बुजुर्गों ने बताया कि एक सौ वर्ष पूर्व मंदिर में आभूषण चुराने की नीयत से दो चोर रात को मां चंडी मंदिर में घुसे। लेकिन जब चोरी कर मंदिर से निकलने की कोशिश की, तो उनकी आंखों की रोशनी चली गई। जिसके बाद किसी तरह आभूषण छोड़कर वो बाहर निकले। मंदिर से बाहर आते ही चोर पत्थर स्वरूप में तब्दील हो गए। जो आज भी मंदिर के गेट के आगे में दो शिला के रूप में विद्यमान हैं। बुजुर्गों ने बताया, मान्यता रही है कि सती के 51 खंडों में विभाजित शव का कोई एक अंग उक्त स्थल पर भी गिरा था। जिस कारण उक्त स्थल का नाम चंडी स्थान पड़ा है।

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