लोकतंत्र:4 पंचायतों के मुखिया को एक से अधिक बार ग्राम प्रधान बनने का मौका

अनुपम कुमार| लक्ष्मीपुर2 महीने पहले
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  • 1978में सूबे की पहली महिला मुखिया बनी थी करूणा देवी, क्षेत्र में अपनी काम के बदौलत बनाई पहचान, आज का लोकप्रिय हैं

त्रिस्तरीय पंचायती राज व्यवस्था के लागू होने के समय से अबतक चार पंचवर्षीय कार्यकाल यानि 20 वर्षों के सफर में जिले के लक्ष्मीपुर प्रखंड में ग्राम पंचायतों के गठन में कई दिलचस्प पहलू जुड़ा है। 20 वर्षों के सफर में प्रखंड के 13 पंचायतों में से चार पंचायतों के सिर्फ 5 मुखिया को ही एक से अधिक ग्राम प्रधान बनने का मौका मिला है। इनमें आनंदपुर पंचायत के दशरथ यादव, खिलार पंचायत के राजकुमार यादव व रेणु देवी, चिनवेरिया पंचायत के गणेश दास व काला पंचायत के सुनील यादव के नाम शामिल हैं। इससे इतर मडैया पंचायत की मुखिया रही करुणा देवी भले ही त्रिस्तरीय पंचायती राज व्यवस्था के बाद दोबारा मुखिया नहीं बन सकी, लेकिन 2001 के पूर्व 1978 में हुए चुनाव में जीत हासिल करके सूबे में पहली महिला मुखिया होने का गौरव हासिल किया था। शेष पंचायतों के 36 मुखिया को आगामी चुनाव में जनता ने सिरे से खारिज कर दिया। ये ऐसे मुखिया हैं जिन्हें एक से अधिक बार पंचायत सरकार चलाने का मौका नहीं मिल सका। ऐसा नहीं है कि पूर्व के मुखिया ने दोबारा भाग्य नहीं अजमाया। खिलार से दो बार मुखिया रहे राजकुमार यादव हैट्रिक नहीं मार सके। गौरा से महेश तांती को सुमित्रा देवी ने भारी मतों से शिकस्त दी थी। इस मामले में आदर्श पंचायत मटिया का प्रदर्शन सबसे खराब रहा है। चार पंचवर्षीय में अन्य पंचायतों की तुलना में चार मुखिया के बदले पांच मुखिया का मुंह देखने वाले मटिया पंचायत के भी किसी मुखिया को एक से अधिक बार मुखिया होने का गाैरव हासिल नहीं हो सका। वर्ष 2001 में त्रिस्तरीय पंचायती राज व्यवस्था के लागू होने के बाद मटिया के पहले मुखिया बने अजय मरांडी को अगले चुनाव में हार का मुंह देखना पड़ा। कुछ ऐसी ही स्थिति सुरेन्द्र हेम्ब्रम की थी। एक बार मुखिया रहने के बाद अगले चुनाव में अरुण हांसदा लोगों के चहेते बन गए और जीत हासिल की लेकिन अरुण हांसदा के बाद एस सी सीट की घोषणा के बाद अरुण हांसदा बतौर मुखिया तो भाग्य नहीं आजमा सके। लेकिन पंचायत समिति सदस्य के रूप में चुनाव मैदान में इन्हें शिकस्त खाना पड़ा। वर्ष 2016 में मुखिया बनीं मूर्ति देवी के निधन के बाद मटिया के लोगों ने फिर से जुगल मांझी की दूसरी पत्नी को बतौर मुखिया मौका नहीं दिया और महेश दास जीत हासिल की। हालांकि प्रखंड में कुछ ऐसे भी पंचायत हैं जहां मुखिया के रूप में निर्वाचित एक व्यक्ति को दोबारा उक्त पंचायत का मुखिया होने का भले ही गौरव प्राप्त नहीं हुआ हो लेकिन यह भी सच है कि उसी परिवार के व्यक्ति ने जीत दर्ज कराई। ऐसे पंचायतों में पिडरौन आनंदपुर व दिग्घी के नाम शामिल किए जा सकते हैं। पिडरौन पंचायत के पहले मुखिया रहे नागेश्वर यादव को दोबारा मौका नहीं मिला लेकिन चौथी पंचवर्षीय में उनके पोते प्रदीप कुमार टुन्नी ने अपनी जीत दर्ज कराके परिवार की विरासत को बरकरार रखा। ऐसी ही स्थिति दिग्घी पंचायत की है। दिग्घी पंचायत मे पहली बार नागेश्वर यादव, तीसरी बार उनके बेटे सुनील यादव व चौथी बार सुनील यादव की पत्नी अंजू देवी ने मुखिया बनने का गौरव हासिल किया।

पंचायत चुनाव में 14 महिलाओं ने मुखिया पद को किया सुशोभित
त्रिस्तरीय पंचायती राज व्यवस्था के सफर में प्रखंड के 13 पंचायतों में 14 महिलाओं ने मुखिया पद को सुशोभित किया है। सूबे के नीतीश सरकार के नारी सशक्तीकरण व राजनीति में महिलाओं को आरक्षण देने की सरकार की योजना का प्रखंड में सकारात्मक प्रभाव पड़ा है। लिहाजा वर्ष 2001 में हुए त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव में जहां एक भी महिला को मुखिया का पद नहीं मिल सका। वहीं वर्ष2016 में हुए पंचायत चुनाव में 13 पंचायतों में से 9 पंचायत की मुखिया महिला निर्वाचित हुई।

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