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मुंगेर के इस गांव में होली खेलना है गुनाह:पूरे फागुन माह नहीं बनते हैं पुए-पकवान, कहते हैं ऐसा करने पर कोई न कोई विपदा आ जाती है

मुंगेरएक महीने पहलेलेखक: कृष्णा बल्लभ नारायण
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मुंगेर जिला से लगभग  55 किलोमीटर दूर असरगंज का साजुआ गांव। - Dainik Bhaskar
मुंगेर जिला से लगभग 55 किलोमीटर दूर असरगंज का साजुआ गांव।
  • पिछले 250 सालों से नहीं मनाई जाती है होली
  • लोग 14 अप्रैल को होलिका दहन मनाते हैं

जहां आज पूरा देश होली के रंग से सराबोर है, वहीं बिहार के मुंगेर जिला में एक ऐसा भी गांव है, जहां होली अभिशाप मानी जाती है। इस गांव में करीब 2000 लोग रहते हैं, लेकिन यहां होली कोई नहीं मनाता। आलम यह है कि पूरे फागुन में इस गांव के किसी घर में अगर पुआ या छानने वाला कोई पकवान बनता है या बनाने की कोशिश की जाती है तो उस परिवार पर कोई न कोई विपदा आ जाती है। ऐसा तब भी होता है, जब होली पर कोई रंग लगाता है या किसी को लगाने की कोशिश करता है। यह गांव है मुंगेर जिला से लगभग 55 किलोमीटर दूर असरगंज का साजुआ गांव। इस गांव को सती स्थान भी कहते हैं।

250 साल पहले की कहानी
कहते हैं कि इस गांव में लगभग 250 सालों से एक परंपरा चली आ रही है कि यहां होली खेलना किसी जुर्म से कम नहीं है। यहां के ग्रामीण बताते हैं कि लगभग 250 वर्ष पूर्व इसी गांव की सती नाम की एक महिला के पति का होलिका दहन के दिन निधन हो गया था। पति के निधन के बाद सती अपने पति के साथ जल कर सती होने की जिद करने लगी, लेकिन ग्रामीणों ने उसे इस बात की इजाजत नहीं दी। सती अपनी जिद पर अड़ी रही। मजबूरन लोग उसे घर के एक कमरे में बंद कर उसके पति के शव को श्मशान घाट ले जाने लगे। लेकिन, शव को श्मशान ले जाने के क्रम में भी एक घटना घट गई।
लोग चचरी पर लाद कर ज्योंहि आगे बढ़ते शव चचरी से नीचे गिर जाता। तब थक हार कर लोगों ने सती को भी श्मशान घाट तक ले जाने का फैसला किया। उसके बाद शव को श्मशान ले जाने में कोई दिक्कत नहीं हुई। श्मशान घाट पहुंचने पर चिता तैयार की गई। चिता पर बैठते ही सती की कनिष्ठ अंगुली से अचानक एक चिंगारी निकली और उससे चिता में आग लग गई। उस चिता में सती भी खाक हो गई। उसके बाद गांववालों ने गांव में सती का एक मंदिर बनवा दिया और सती को सती माता मानकर उनकी पूजा करने लगे। तब से आज तक इस गांव के लोग होली नहीं मनाते हैं।

पूर्वजों के समय से चली आ रही धारणा
इस गांव के लोग फागुन बीत जाने के बाद 14 अप्रैल को होलिका दहन मनाते हैं। यहां के ग्रामीण गोपाल सिंह ने बताया कि हम लोग होली नहीं मनाते हैं। हमारे पूर्वजों के समय से ही ऐसी रीत चली आ रही है। जो कोई भी इस पूरे माह में पुआ या छानकर बनाया जाने वाला पकवान बनाने की कोशिश करता है तो उसके घर में खुद ब खुद आग लग जाती है। इस तरह की घटनाएं कई बार हो चुकी हैं। वहीं ,कपिलेश्वर प्रसाद ने बताया कि हमारे गांव में कोई होली मनाने की जुर्रत नहीं करता। हमारे गांव में सभी जाति के लोग हैं लेकिन कोई होली नहीं मनाता। जो परंपरा चली आ रही है उसे सब मानते हैं।

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