आस्था:पुत्र की दीर्घायु की कामना को लेकर 36 घंटे का निर्जला व्रत शुरू

नरपतगंज2 महीने पहले
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पूजा करती व्रती महिला। - Dainik Bhaskar
पूजा करती व्रती महिला।
  • गुरुवार शाम 5:04 के बाद होगा पारणा, बुधवार सुबह से रात तक एक अन्न का निवाला भी नहीं लेंगी व्रती

नरपतगंज में जीवित्पुत्रिका व्रत अर्थात जिउतिया की धूम है। पुत्र की लंबी आयु और समृद्धि की कामना को लेकर उनकी मां 36 घंटे की निर्जला व्रत पर है। बिहार, झारखंड, उत्तरप्रदेश, पश्चिम बंगाल और नेपाल के मिथिला और थरुहट में आश्विन माह में कृष्ण-पक्ष के सातवें से नौवें चंद्र दिवस तक तीन दिनों तक मनाये जाने वाले पर्व को लेकर बाजार में काफी चहल-पहल रही। खासकर मिठाई की दुकानों पर खाजा सहित अन्य पूजन सामग्री की खरीददारी के लिए बड़ी संख्या में बाजार में भीड़ रही। जिउतिया व्रत के पहले दिन आज महिलाएं सूर्योदय से पहले जागकर स्नान कर पूजा करते हुए एक बार भोजन ग्रहण की। जिसके बाद पूरा दिन निर्जला व्रत रखी। चूंकि इस बार 36 घंटे का संयोग लगा है, जिसके कारण व्रती 36 घंटे तक निर्जला रहेंगी। हालांकि अलग-अलग पंचांग के कारण दो दिन जिउतिया का संयोग है। जहां बड़ी संख्या में कल नहाय-खाय के साथ आज से निर्जला व्रत पर हैं। वहीं कई महिलाएं आज नहाय खाय के बाद कल से 36 घंटे के निर्जला व्रत पर रहेंगी। पहले दिन निर्जला व्रत के बाद दूसरे दिन बुधवार को सुबह-सवेरे स्नान के बाद महिलाएं पूजा-पाठ करेंगी और फिर पूरा दिन निर्जला व्रत रख व्रत के तीसरे दिन महिलाएं पारण करेंगी। सूर्य को अर्घ देने के बाद ही महिलाएं अन्न ग्रहण कर सकती हैं। मुख्य रूप से पर्व के तीसरे दिन झोर भात, मरुवा की रोटी और नोनी का साग खाया जाता है। अष्टमी को प्रदोषकाल में महिलाएं जीमूतवाहन की पूजा करती है। जीमूतवाहन की कुशा से निर्मित प्रतिमा को धूप-दीप, अक्षत, पुष्प, फल आदि अर्पित करके फिर पूजा की जाती है। इसके साथ ही मिट्टी और गाय के गोबर से सियारिन और चील की प्रतिमा बनाई जाती है।

गरुड़ का चारा बनने चले गए थे जीमूतवाहन

पौराणिक कथा के अनुसार एक बार एक गरुड़ और एक मादा लोमड़ी नर्मदा नदी के पास एक हिमालय के जंगल में रहते थे। दोनों ने कुछ महिलाओं को पूजा करते और उपवास करते देखा और खुद भी इसे देखने की कामना की। उनके उपवास के दौरान, लोमड़ी भूख के कारण बेहोश हो गई और चुपके से भोजन किया। दूसरी ओर, चील ने पूरे समर्पण के साथ व्रत का पालन किया और उसे पूरा किया। परिणामस्वरूप लोमड़ी से पैदा हुए सभी बच्चे जन्म के कुछ दिन बाद ही खत्म हो गए और चील की संतान लंबी आयु के लिए धन्य हो गई। वहीं दूसरी कथा के अनुसार जीमूतवाहन गंधर्व के बुद्धिमान और राजा थे। जीमूतवाहन शासक बनने से संतुष्ट नहीं थे और परिणामस्वरूप उन्होंने अपने भाइयों को अपने राज्य की सभी जिम्मेदारियां दीं और अपने पिता की सेवा के लिए जंगल चले गए। एक दिन जंगल में भटकते हुए उन्‍हें एक बुढ़िया विलाप करती हुई मिली। उन्‍होंने बुढ़िया से रोने का कारण पूछा। इसपर उसने उसे बताया कि वह सांप (नागवंशी) के परिवार से है और उसका एक ही बेटा है। एक शपथ के रूप में हर दिन एक सांप पक्षीराज गरुड़ को चढ़ाया जाता है।

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