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लापरवाही:जिले में 35 वर्षों से बंद पड़ा है चूना पत्थर खदान, चुनाव में बन सकता है बड़ा मुद्दा

नौहट्टाएक महीने पहले
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  • कभी देश के दूसरे राज्यों के लोग रोजगार के खोज में यहां आते थे
  • केन्द्र सरकार द्वारा कैमूर पहाड़ी को वन्यप्राणी आश्रयणी क्षेत्र घोषित कर दिया गया है

कैमूर पहाड़ी क्षेत्र में लागू वन संरक्षण कानून इस इलाका के विकास में सबसे बड़ा बाधक है । राज्य एवम केन्द्र सरकार द्वारा कैमूर पहाड़ी को वन्यप्राणी आश्रयणी क्षेत्र घोषित कर दिया गया है। जिसके कारण खनन गतिविधियां बन्द है। कभी देश के दूसरे राज्यों के लोग रोजगार के खोज में यहां आते थे, लेकिन जब से वन संरक्षण कानून कैमूर पहाड़ी इलाके में लगा है।

इलाके का विकास पूरी तरह ठप हो गया है। जिला के कैमूर पहाड़ी क्षेत्र में सोन भेली सीमेंट कारखाना जपला के बौलिया चुनहट्टा व रोहतास उद्योग समूह के चुटिया डबुआ कल्याणपुर सीमेंट के बेकरी भुड़वा व अन्य दर्जनों चूना पत्थर खदान 35 वर्षों से बंद पड़ा है। ये चुना पत्थर खान किसी चुनाव में बड़ा चुनावी मुद्दा नहीं बन सका।

चुना पत्थर खदान बंद होने से इस इलाके के हजारों लोग प्रभावित हुए हैं। लेकिन इस ओर किसी भी जनप्रतिनिधि ने ध्यान नहीं दिया है। पाइराइट्स फॉस्फेट एंड केमिकल्स लिमिटेड सोन गंगा खाद कारखाना अमझोर व पाइराइट्स खदान के बंद होने से सरकार को सालाना करोड़ों रुपये की हानि हो रही है।
करोड़ों रुपए की चल रही योजना, लेकिन वन्य प्राणियों को शुद्ध जल भी नसीब नहीं: आश्रयणी क्षेत्र होने के कारण वन विभाग द्वारा करोड़ों रूपये की योजना चल रही है, लेकिन अधिकांश योजना केवल कागज पर ही चलती है। वन्य प्राणियों को शुद्ध जल भी नसीब नहीं है। जबकि इस नाम पर हर दिन दो ट्रैक्टर चल रहा है, लेकिन इस तरफ किसी वरीय वन अधिकारियों का ध्यान बिल्कुल नहीं है। केंद्र एवम राज्य सरकार यदि कैमूर पहाड़ी क्षेत्र में वन विभाग द्वारा चलाये गए विकास योजनाओं की ईमानदारी से जांच करा दे तो बड़ा घोटाला का पर्दाफाश हो जाएगा और कई वन अधिकारी जेल के भीतर नजर आएंगे ।

जब से खनन व कारखाना हुआ बंद क्षेत्र के लोग हो गए बेरोजगार
कैमूर पहाड़ी के अमझोर नामक स्थान पर एशिया के सबसे बड़ा पाइराइट्स का अकूत भंडार उपलब्ध है। विशेषज्ञों की माने तो इसकी भंडारण क्षमता 200 वर्ष तक बतायी गयी थी। अमझोर में एक बड़ा आवासीय परिसर था। इस कारखाने में काम करने वाले लोग रहते थे। आज आवासीय परिसर खंडहर में तब्दील हो गया है। इसी तरह तीन सीमेंट प्लांट को चलाने के लिए कैमुर पहाड़ी क्षेत्र के चूना पत्थर खदान सीमेंट कारखानों को मिला था। जिसमे हजारों लोगों को रोजगार मिलता था, लेकिन एक एक कर सीमेंट कारखाना और पत्थर खान बन्द होते चले गए।

अंग्रेजो के जमाने में स्थापित जपला सीमेंट कारखाना के समान रोपवे सब कबाड़ा के भाव में बिक गया। 1990 के दशक के पहले यह क्षेत्र काफी खुशहाल था। देश के दूसरे प्रदेश से लोग यहां रोजगार खोजने आते थे। लेकिन जब से कारखाना व खनन बन्द हुआ है। इस क्षेत्र के लोग देश के दूसरे प्रदेश में रोजगार खोजने के लिए मजबूर है। इस इलाके के अधिकांश युवा रोजगार के खोज में दूसरे प्रदेशों में पलायन कर गए है । कैमुर पहाड़ी क्षेत्र में लागू वन संरक्षण कानून इस इलाका के विकास में सबसे बड़ा बाधक है ।

1962 में अमझोर में पाइराइट्स खनन का कार्य हुआ था शुरू
बताते चलें कि 1962 के दशक में अमझोर में पाइराइट्स खनन का कार्य भारत सरकार द्वारा शुरू किया गया था। फिर वर्ष 1987 में केन्द्रीय रसायन एवम उर्वरक मंत्री आर प्रभु एवम राज्य के तत्कालीन मुख्य मंत्री विन्देश्वरी दुबे केंद्रीय मंत्री प्रो के के तिवारी की उपस्थिति में पाइराइट्स पर आधारित फास्फेटिक संयंत्र एवम सोन गंगा खाद कारखाना की स्थापना की गयी थी।

यह कारखाना तो समय सीमा के अन्दर बन कर चालू हो गया। लेकिन यह कारखाना अपने बाल अवस्था में ही मृत हो गया। भारत सरकार द्वारा इस कारखाने की भूमि व कारखाना को निजी कंपनियों के हाथ कारखाना लगाने के करार पर बेच दिया गया, परन्तु वर्षो बीत जाने के बाद भी सोन गंगा खाद कारखाना के जगह पर दूसरा कारखाना नहीं लगाया जा सका।

इस बीच सासाराम से 2004 और 2009 में मीरा कुमार सांसद चुनी गयी। फिर 2014 में छेदी पासवान सांसद बने दोनों की केन्द्र में सरकार रही, लेकिन इस ओर किसी सांसद ने कभी ध्यान नहीं दिया। कारखाना बन्द ही रह गया और कारखाने को एक दूसरे निजी कंपनियों के हाथों खरीद बिक्री का खेल चलते रहा।

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